चालीस


यह कहानी मैंने नहीं लिखी । यह कहानी मुझसे लिखवाई गई । एक मित्र ने एक दिन कहा आपकी कहानी “First Person Narrative ” में ज्यादा होती हैं । आपको कोई एक कहानी तो लिखनी चाहिए जहां लेखक नेपथ्य में हो और संवाद के सहारे कहानी आगे बढ़े । मैंने कहानी लिखनी शुरू की इसी मकसद से । फिर कहानी को बनावट मिली निधि (दोस्त ज्यादा पत्नी बहुत कम ) के साथ शायद ५-१० बैठकों में इस कहानी के बारे में बात करते हुए । 

कहानी में वर्तनी की बहुत सी गलतियाँ मिलेंगी । उसको सुधारना मुझे मेरा काम नहीं लगता। अगर कभी छपने के लिए किसी पत्रिका को भेजूँगा तो शायद कर लूँगा । यह टायपिंग की गलती है मेरी नहीं । और एक बात और; मुझे ‘की’ और ‘कि’ के बीच का फर्क पता है लेकिन टायपिंग करते यह गलती सबसे ज्यादा बार होती है । 

  • इस कहानी के पूरा होने का श्रेय जाता है निधि मनन को 
  • इस कहानी को शुरू करवाने का श्रेय जाता है अर्चना शर्मा जी को ।

अब कहानी 

 

(1)

“महीने का किराया क्या होगा?” उसने अपार्टमेंट के गेट पर ही पूछ लिया

“वो बाद की बात है मैडम, पहले आप घर तो देख लो” ब्रोकर जानता था किराये की बात माल दिखने के बाद ही करनी चाहिए

“यह लिफ्ट नहीं चलती क्या?” वैसे लिफ्ट वो शायद ही इस्तेमाल करती। कॉलेज में पांचवे फ्लोर पर उसका लेक्चर हुआ करता था और अपने डेस्क तक वो सीढ़ियों से ही जाय करती थी। कमाल की फिटनेस थी उसकी और इसी के चलते अपनी उम्र के मुकाबले वो ८-१० साल छोटी ही लगती थी। कई बार उसने सुना था लगता नहीं है की आपके इतनी बड़ी लड़की होगी . उसका बेटी बाहरवीं में थी और बेटा हैदराबाद में हाल ही में नौकरी पर लगा था

“चलती क्यों नहीं है मैडम. चलती है. रिपेयर का काम चल रहा है. ८ मंजिला टावर है और इस सोसाइटी मैं १००० फ्लैट हैं. लिफ्ट के बिना क्या चलेगा यहाँ?” ब्रोकर ने सीढ़ियों चढ़ते हुए कहा

“किस मंजिल तक जाना है?”

“तीसरी”

हर मंजिल तक २४ सीढ़ियां थीं. कुल मिलकर ५०वीं सीढ़ी तक पहुंची तो शालू ने एक बार रूककर सांस लेना ठीक समझा. ब्रोकर उससे पीछे रह गया था. जैसे ही वो उस तक पहुंचा, शालू ने आगे चलना शुरू कर दिया

“आप चलो मैडम. मैं सांस लेकर आता हूँ. फ्लैट की चाबी है मेरे पास”

ऊपर पहुंचकर उसने फ्लैट का दरवाजा खोला। शालू ने नजर दौड़ाई “बालकनी नहीं है क्या फ्लैट में?”

“क्या बात कर दी मैडम, आपने कहा था बालकनी वाला फ्लैट चाहिए. इधर आईये, इस तरफ, यह एक यहाँ है; सीधे सामने पार्क की तरफ खुलती है. इलाके का सबसे बड़ा पार्क है यह. तीसरी मंजिल से तो क्या दिखेगा. लेकिन अगर आप ७वी मंजिल से देखेंगी तो बहुत खूबसूरत नज़ारा है. लिफ्ट तो है ही मैडम. किराया भी कम होगा. बोलो बात करूँ”

“नहीं, तीसरी ही ठीक है.”

“इस तरफ एक और छोटी बालकनी है. टू साइड ओपनिंग है फ्लैट में.”

“किराया क्या होगा?”

“मैडम किराये की भी बात होती रहेगी, किचन देखिये. किचन में गैस की पाइपलाइन आ रही है. सिलिंडर का चक्कर ही ख़तम मैडम. और बैडरूम के साथ एक अटैच्ड टॉयलेट. वैसे कितना बड़ा परिवार है आपका”

“बड़ा है. लेकिन फ्लैट में मैं अकेले ही रहूंगी”

“क्यों मैडम. बाकि परिवार? “ब्रोकर ने पूछा

“वो नहीं आएंगे. क्यों? कोई परेशानी है?” शालू ने जवाब देते हुए ब्रोकर की आंखों में आँखे डालकर देखा।

“नहीं मैडम, हमको क्या परेशानी होगी. लेकिन मालिक तो पूछेगा न की अकेले क्यों रहना है आपको. परिवार क्यों नहीं आ रहा?” ब्रोकर ने एक कित्रिम हंसी के साथ पूछा

“वो सब मुंबई में हैं. मेरी सरकारी नौकरी है यहाँ. मैं अकेले ही रहूंगी”

शालू ने झूठ बोला था. उसको फ्लैट चाहिए था. परिवार उसका यहीं दिल्ली में ही था लेकिन वो अपने परिवार से अलग हो रही थी. न कोई लड़ाई झगड़ा, न ही कोई कलह कलेश फिर भी अलग हो रही थी

“ठीक! ठीक!. किस डिपार्टमेंट में काम करती हैं आप?” ब्रोकर ने थोड़ी सी जानकारी, मकानमालिक के किये बटोर लेना ठीक समझा

“असिस्टेंट प्रोफेसर हूँ दिल्ली यूनिवर्सिटी में. साइकोलॉजी पढ़ाती हूँ पिछले १५ सालों से” बालकनी से बहार की तरफ देखते हुए उसने जवाब दिया

“तो परिवार कब शिफ्ट हुआ मुंबई. कौन कौन है परिवार में”

मुड़कर ब्रोकर की तरफ देखकर उसने कहा “परिवार शुरू से ही मुंबई में है. मेरे हस्बैंड जीवन बीमा में हैं. लड़का आजकल हैदराबाद में है और लड़की हस्बैंड के साथ है मुंबई में. पढ़ती है अभी”

“तो आप कब आयीं दिल्ली?”

“मै दिल्ली में ही हूँ शुरू से. जॉब है न यहाँ”

ब्रोकर को कुछ अटपटा लगा. हजम होने लायक बात भी नहीं थी। कैसा परिवार हुआ भला जहाँ औरत शादी के बाद से ही अलग शहर में रहती हो। लेकिन उसको अपनी ब्रोकरेज की शायद ज्यादा चिंता थी. उसने बात का रुख मोड़ दिया, “मेरी कमीशन १ महीने का रेंट है मैडम”

“१५ दिन” शालू  ने दो-टूक उत्तर दिया

“ठीक है जी जैसी आपकी मर्जी. हम लोग तो वैसे भी सेवा का काम करते हैं” ब्रोकर को सौदा पटता दिखाई दिया

“किराया क्या है ?”

“सस्ता ही है, १२ हज़ार महीना; ३ महीने का एडवांस लेगा”

“मुझे फ्लैट सिर्फ ६ महीने के लिए चाहिए. एडवांस १ महीने का दे सकती हूँ. ट्रांसफर होने के चांस हैं इसलिए ६ महीने से ज्यादा का वादा नहीं करती”

“मैडम मालिक तो लम्बे समय के लिए किरायेदार ढूंढ रहा है. आप एक काम करो उसको यह सब मत बोलो. खली करना होगा कर देना. अभी से क्यों बोलना है मैडम. और २ महीने का एडवांस के लिए मै मनवा लेता हूँ”

“ठीक है और किराया ११ हज़ार. मै इतवार को शिफ्ट कर जाऊंगी”

“वो तो ठीक है मैडम. लेकिन किराया १२ हज़ार. प्लीज. अब आप जिद न करें”

“ठीक है”

 

 

(2)

“मै संडे को शिफ्ट हो रही हूँ. यहाँ से थोड़ा दूर है।  थोड़ा दूर होना भी चाहिए ; यहाँ तो सब जानते हैं।  एक रूम सेट है. १२ हज़ार महीने का. ४-६ महीने रहूंगी. ठीक लगा तो आगे भी रहूंगी नहीं तो हो सकता है लौट आऊं” शालू  ने रात के खाने के बाद बर्तन समेटते हुए कहा

“अब यह क्या बचपना है. कुछ बताओगी की यह सब क्यों कर रही हो?” उसके हस्बैंड ने पुछा

“मैंने ब्रोकर को बोला है की मेरा पूरा परिवार मुंबई रहता है. बेटा हैदराबाद में है और बेटी तुम्हारे साथ मुंबई में. इसलिए भूलकर भी तुम मुझसे मिलने नहीं आ जाना.” शालू उसकी सुने बिना अपनी हिदायतें देती जा रही थी

“मै क्या पूछ रहा हूँ और तुम क्या बोल रही हो. आखिर यह सब क्यों कर रही हो?”

“अच्छा सुनो, मम्मी पापा को तुम बताओगे. और कल सुबह सुबह बता देना. मुझे पता है वो बिना मतलब का इशू क्रिएट करेंगे. उसको संभालना तुम्हारा काम. बोलो क्या बोलोगे?”

“तुम वापस तो आओगी न?” ऐसा नहीं था की शालू और उसके पति के बीच इस बारे में पहले बात नहीं हुई थी।  कई महीनों से शालू कह रही थी की वो ४-६ महीने के लिए अलग रहना चाहती है लेकिन कार्तिक कोई कभी नहीं लगा की एक दिन शालू सचमुच जाएगी।  उसको पता था की अब जब उसने फैसला कर लिया है और घर किराये पर ले लिया है तो कुछ नहीं बदलने वाला

“अभी तो लगता है की आउंगी. ४-६ महीने बाद का अभी से नहीं कह सकती. रहकर देखती हूँ. क्या पता न भी आऊं”

“शालू यह क्या चल रहा है. अगर माँ पापा को कुछ बताना भी है तो पता तो हो की बताना क्या है. एक काम करते हैं उन्हें कहते हैं की तुम ऑफिस की पोस्टिंग पर ६ महीने के लिए जा रही हो. इसके इलावा कोई और तरीका मुझे नहीं पता”

“नहीं, झूठ मत बोलो. मुझे नहीं पता की ४-६ महीने बाद मै लौटूंगी या नहीं. सीधे सीधे बोलो की मै शिफ्ट हो रही हूँ. अकेले”

“और कारन क्या बताऊँ?”

“बोलो की तुम्हे नहीं पता क्योंकि तुम्हे नहीं पता”

“फिर वो तुमसे नहीं पूछेंगे?”

“हाँ तो उसका जवाब है. मेरा मन नहीं लगता यहाँ. शायद ४-६ महीने अकेली रहूं तो लौट आऊं”

“शालू  तुम यह सब क्या कर रही हो? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा”

“मैंने तुम्हे महीना भर पहले बता दिया था न की मै अकेले रहना चाहती हूँ, ४-६ महीने. अब हम फिर से यह सब क्यों शुरू कर रहे हैं?”

“यार इतना आसान है क्या? लोग क्या कहेंगे? माँ पापा हैं; बच्चे हैं. अच्छा एक बात बताओ, बच्चों से क्या कहेंगे?”

“यही की मुझे अकेले रहना है ४-६ महीने. बच्चे बच्चे तो नहीं हैं अब ”

“यह क्या बात हुई. यार सब पूछेंगे हुआ क्या है .. .समझेंगे की कोई न कोई लड़ाई हुई है. तुम क्या नहीं जानती यह सब?”

“वो सब मैनेज करना तुम्हारा काम है. मै संडे को शिफ्ट हो रही हूँ.”

बातें तो चलती रहीं इसके बाद भी लेकिन निचोड़ इतना ही की शालू संडे को शिफ्ट होने वाली है. अकेले. किराये के मकान में. उसी शहर में जहाँ उसका अपना एक घर है. परिवार है. कोई कलह कलेश नहीं. कोई लड़ाई नहीं. न सास से परेशानी, न ससुर से कोई खटपट. पति कमाता है .ठीक ठाक कमाता है. घर पर कोई कमी नहीं. बच्चे ठीक हैं. सब कुशल मंगल. लेकिन शालू संडे को शिफ्ट हो रही है

 

(3)

“तू पागल हो गयी है बेटा?” माँ को चलने में तकलीफ होती थी; “जा कहाँ रही हो?”

“यहीं इसी शहर में ही हूँ।  लेकिन यहाँ से थोड़ा दूर ” संडे का दिन, शालू  अपना जरूरी सामन पैक कर रही थी।

“पापा पूछ रहे हैं कोई लड़ाई झगड़ा हुआ है क्या ?”

“नहीं माँ।  आपको पता है हम लड़ते नहीं हैं।  कुछ नहीं हुआ है माँ – सच में।  मैं आती रहूंगी।  और फिर ४-६ महीने की ही तो बात है ” शालू  ने फ्रिज से दही निकलकर एक कटोरी में अपने लिए डाला और तवे से परांठा उठाकर सामने ही कुर्सी टेबल पर बैठ खाने लगी

“अब तुझे क्या हुआ है ?” शालू  ने अपनी बेटी की तरफ देखकर कहा

“क्यों जा रही हो माँ ?” बेटी ने भी वही सवाल किया जो सब कर रहे थे

“कहीं नहीं जा रही; आती रहूंगी बीच बीच में।  क्यों का कोई जवाब नहीं है मेरे पास ” परांठा खाते खाते शालू  ने उत्तर दिया “तू कब प्लान कर रही है भाई के पास जाने का ? छुट्टियां होने वाली हैं तेरी ”

“देखूंगी।  शायद अगले महीने ”

“बस तो तू जबतक वापस आएगी शायद में भी आ जाऊं ” शालू कोशिश में थी की माहौल जितना कम भारी हो उतना अच्छा। उसको आशा थी की उसके ससुर कुछ कहेंगे। लेकिन उनहोंने कुछ नहीं पूछा। वो चुपचाप सोफे पर बैठे थे और टी वी को म्यूट करके देख रहे थे।

“सुनो गाडी आ गयी है मैं चलती हूँ; एक काम करो जरा यह २-३ अटैचियाँ रखवा दो गाडी में” शालू ने पति की तरफ देखकर कहा

शालू अटैचियाँ गाडी में रखवाकर वहां से निकल गयी

 

(4)

“मैं अलग घर जा रही हूँ। किराये पर लिया है। ४-६ महीने के लिए?” शालू ने फ़ोन पर कहा

“ओह तेरी! सच में?” दूसरी तरफ से आवाज आयी

“तू पहली है जिसने यह नहीं कहा की पागल हो गयी है, क्या हुआ, वगहैर – वगहैर।    सीरियसली बोल रही हूँ। अदिति से शुरू किया था अल्फाबेटिकल आर्डर में। और कनिका तक से पहले ३० नंबर डायल कर चुकी हूँ। मुझे सबसे पहले तुझे ही करना चाहिए था ” शालू ने जवाब दिया

“कहाँ लिया है मकान।” कनिका ने पूछा

“यहीं इसी शहर में।घर से ३०-४० किलोमीटर दूर है। आज शिफ्ट हो रही हूँ।  तू आएगी – आ पायेगी ?” उसने पूछा

“कब आऊं ?” कनिका ने जवाब में सवाल किया और फिर बोली “सुन अगले फ्राइडे आती हूँ। एक मिनट रुक, देखती हूँ टिकट कब की सस्ती है ”

“और रवि?”

“छोड़ न।  वो तो वैसे ही नॉएडा में है – सालों से।  एक काम करती हूँ थर्सडे आती हूँ – टिकट सस्ती है।  आएगी एयरपोर्ट लेने?”

“हाँ, रखती हूँ फिर।घर आ गया है। सामन सेट करना है।  बाद में बात करेंगे ”

घर के मालिक ने शालू  को घर की चाबी देते हुए पूछा “सामान बस इतना ही है ?”

“जी, यहाँ हमेशा से पी जी में ही रहती रही हूँ।  कभी अपना सामन बनाया ही नहीं।  आसानी होती है।  आपका घर भी फर्निश्ड था इसलिए ज्यादा किराये पर भी ले लिया ” शालू  ने जवाब दिया

“नहीं किराया तो ज्यादा नहीं है।  ब्रोकर बता रहा था आपके हस्बैंड मुंबई में हैं?”

“जी हाँ। यहाँ आना जाना होता है उनका महीने दो महीने में एक आध बार।  अगली बार आएंगे तो मिलवंगु आपसे ” शालू  ने मालिक मकान को आश्वस्त करने के लिए यूँ ही कह दिया

घर फर्निश्ड था लेकिन फिर भी संडे का बाकी बचा दिन धुल मिटटी झड़ने में ही चला गया।  ३-४ घंटे तक यह कार्यकर्म चलता रहा और इस दौरान मेहँदी हसन से जगजीत और जगजीत से जाने कौन कौन यू टूयब पर चलते रहे।  बीच में कनिका का फ़ोन आया “टिकट बुक कर लिए हैं मैंने, वीरवार आ रही हूँ सुबह १० बजे लैंड करुँगी।  रवि से बात हुई , लेकिन थर्सडे वो बिजी है।  टू आएगी लेने ?”

“हाँ।  लेकिन फिर मेरा लेक्चर है ११ बजे।  छुट्टी नहीं लूंगी ”

“ठीक , कोई हर्ज नहीं।  सुन क्या कर रही है अभी ?”

“पिछले तीन घंटे से अपने मन के गाने सुन रही हूँ।  किसी ने कुछ नहीं कहा , किसी ने कुछ नहीं माँगा, किसी ने एक बार भी नहीं पुकारा , किसी को मेरी चॉइस से कोई तकलीफ नहीं हुई। ” उसने उत्तर दिया

“सही है।  चल थर्सडे बात करते हैं ” कहते हुए कनिका ने फ़ोन रख दिया

पहली रात उसने कुछ नहीं बनाया।  एक अकेली के लिए फिर बनाती भी क्या।  नीचे उतारकर अप्पार्टमेन्ट के सामने वाली दूकान से एक ब्रेड और बटर ले आयी थी।  चाय के साथ वही खाया और सो गयी।  सोने से पहले उसने जब आखरी बार देखा तो पति की मिस्ड कॉल का काउंट १२ था।  उसने सिर्फ एक मैसेज किया “ठीक हूँ।  आल सेटल्ड।  चिंता मत करो।  मैं फ़ोन करुँगी – जब भी करुँगी।” मैसेज करके फ़ोन स्विच ऑफ किया और सो गयी

 

(5)

कनिका ने कैब में बैठते ही कहा, “सुन तू कॉलेज से कब फ्री होगी?”

“मैंने लेक्चर कैंसिल कर दिया आज। छुट्टी ले ली। कहाँ चलें?” शालू ने पूछा

“घर।  या एक काम करते हैं ब्रेकफास्ट करते हुए चलते हैं ” कनिका ने कहकर ड्राइवर से कहा “एक काम करो सी पी छोड़ दो ” और फिर शालू  से पूछा “किया कैसे ?”

“तू पहली है जो क्यों की जगह कैसे पूछ रही है”

“क्यों का क्या है – और जो भी कारण हो उसका करना क्या है – लेकिन कैसे किया? मैं पिछले १० साल से कैसे करूँ से जूझ रही हूँ मुझसे तो नहीं हुआ। इसलिए मेरी लिए कैसे ज्यादा बड़ा सवाल है”

शालू और कनिका कॉलेज के दिनों की दोस्त थीं – जब कॉलेज में थीं तो करीब थीं फिर कॉलेज के बाद काफी अरसे तक कांटेक्ट नहीं रहा और फिर फेसबुक ने अचानक दोबारा मिला दिया। दोबारा जब कांटेक्ट हुआ तब तक १५ सालों का फासला पड़ गया था। १५ साल के अरसे ने और चाहे कुछ भी बदला हो दोनों के बीच की मित्रता नहीं बदली थी

शालू जब १५ साल बाद कनिका से मिली थी तो उसने पहला सवाल किया था, “रवि कैसा है?” कनिका और रवि सालों से साथ साथ थे।  इतने सालों से साथ साथ की  जब उनकी शादी हुई तो लोगों को छोड़ो उन दोनों को भी शादी को लेकर कोई उत्साह नहीं था। कनिका ने शालू  से कहा था “क्या शादी – वैसे कौन सी शादी नहीं हो रखी।  हर वीकेंड तो इसके ही घर होती हूँ।  आंटी को तो वीकेंड पर ब्रेकफास्ट के लिए मेरा इंतज़ार होता है।  और जब शालू  ने बोला की अब तो आंटी कहना छोड़ दे तो कनिका ने हंसकर कहा ठीक है – माँ सही।

कनिका ने “रवि कैसा है?” के उत्तर में कहा था “छोड़ न उसका, वो ठीक है। तेरे शहर दिल्ली में ही है आजकल। पिछले कई सालों से शहर शहर घूम रहा है। उसकी जॉब ही ऐसी है। और मेरी जॉब ने मुझे यहाँ रोक रक्खा है”

“आता रहता है तेरे पास?”

“हाँ! आता है कभी कभी।२-४ महीने में एक आध बार। ऐसा ही चल रहा है। कभी मैं भी चली जाती हूँ।

“तू दिल्ली ही क्यों नहीं आ जाती?”

“नहीं होगा शालू । मुश्किल है। शुरू शुरू में कोशिश की थी; एक नहीं दो-दो शहर बदले थे उसके साथ लेकिन अब लगता है उसको अलग रहना ही ज्यादा अच्छा लगता है। ठीक है न, उसका दिल्ली में चल रहा है – मैं भी अब डिसट्रब नहीं करती ” कनिका की बात सुनकर शालू ने फिर कोई सवाल नहीं किया

आज फिर मिले तो औपचारिकता निभाते हुए उसने फिर रवि का हाल चाल पूछा

“चलता रहता है उसका – आजकल गिल्ट में है”

“किस बात का गिल्ट”

“हम दोनों के साथ चलता रहता है शालू ।  कभी मुझे लगता है क्या बिना मतलब की भसड़ डाल रक्खी है लाइफ में और कभी उसको लगने लगता है की वो अपनी फॅमिली को नेग्लेक्ट कर रहा है” कनिका ने कहा, “आसान नहीं है समझ पाना।”

शालू ने महसूस किया की रवि का जिक्र आते ही कनिका थोड़ी असामान्य हो गयी थी।  सामान्य से क्षण भर ज्यादा देर चुप्पी रही दोनों के बीच।  इतने भर में ही शालू ने भांप लिया था की रवि को लेकर कनिका वैसी नहीं रही जैसी कॉलेज के दिनों में थी।  मित्रता के भाव से प्रेरित ही होगा की उसने पूछ लिया, “सब ठीक है न कनिका ?”

“लम्बे समय से जो चल रहा हो उन स्थितियों के साथ खुद को घसीटते रहो तो सबकुछ ठीक ही लगने लगता है शालू। यह एहसास नहीं रहता की इससे अलग भी कुछ हो सकता है किया जा सकता है।   इसलिए तेरे सवाल का जवाब तो यही है की सबकुछ ठीक है।  क्योंकि अगर मैंने कहा की ठीक नहीं तो फिर क्या ठीक नहीं यह बताना होगा और क्या ठीक नहीं यह नहीं बता सकती।  जानती ही नहीं की क्या ठीक नहीं। तू बता तेरे से पूछूँ की क्या सब ठीक है तो तू क्या यह कहेगी की नहीं कुछ ठीक नहीं। ” फिर अगला निवाला मुहं में डालने से पहले रूककर उसने अपनी बात पूरी की “रवि के बारे में क्या बात करूँ ? ४-६ महीने में एक वीकेंड पर आता है; हफ्ते में ३-४ बार फ़ोन पर बात हो जाती है। ऐसी मुलाकातों और बातों में जितना भर जरूरी है उतना भर ही निपटता है। और रिश्तों की गर्माहट तो जरूरी के निपटने के बाद के पलों , बाद की बातों में होती है।  वो सब नहीं है बहुत सालों से।   इसलिए मुझे नहीं पता की वो कैसा है – अब और क्या कहूं इसके सिवा की ठीक ही होगा ? ”

माहौल झटके में ही भारी हो गया।  दोनों ने खाना खत्म करके एक कप कॉफ़ी आर्डर की। शालू ने कनिका की बात का एक सिरा पकड़कर उसमे अपना सिरा बांधते हुए कहा, “कॉलेज में कभी सोचा था की ऐसे हो जायेंगे ?”

“कैसे?” शालू ने कॉफ़ी का एक सिप खींचते हुए पूछा।  वो कॉफ़ी ऐसे पीती थी जैसे सिगरेट का छोटा कश खींच रही हो

“जैसे हैं आजकल। तू सोच कनु यह तमाशा जब शुरू हुआ था तो कैसे रंगबिरंगे कपडे पहनकर स्टेज पर पहुंची थी हम।  क्या पता था की कुछ अदृश्य डोरियाँ हैं जो हमको चलाती रहेंगी”

“और सच मान शालू कभी कभी तो लगता है की अपनी आवाज़ ही नहीं है ; कोई और है जो हमारे अंदर आवाज़ें भरता जा रहा है और हम उगलते जा रहे हैं। मैं तो  किसी किसी दिन शाम को खुद को साइड पर खड़ी करके खुद को देखती हूँ तो पूरा जीवन एक कठपुतली का जीवन लगता है; क्यों नाचे और किसके लिए नाचे क्या पता ? और पूरे शो की दौरान यही लगता रहा की परफेक्ट शो होना चाहिए। ” कनिका ने  शालू की बात को पूरा करते हुए कहा

शालू परफेक्ट शो वाली बात पर मुस्कुरा दी।  कनिका ने उसकी तरफ देखा तो धीरे से गाली देते हुए कहा, “बड़ी भेनचोद है जिंदगी यार।  और सबको परफेक्ट शो देना है इस एक जिंदगी में ; किसका शो ? कौन चूतिया देख रहा है ? किस चूतिये की पास टाइम है मेरा शो देखने का ? लेकिन लगे हैं परफेक्ट शो प्रस्तुत करने की लिए।  मराओ फिर ”

और शालू खिलखिलाकर हसने लगी।  “आराम से आराम से । इतनी भावुक मत हो मेरी जान  ” शालू ने पर्स से अपना क्रेडिट कार्ड निकाला और वेटर को बिल ले आने का इशारा किया। “रवि को पता है तू आयी है दिल्ली या उसको बताया ही नहीं ?”

“बताया तो है।  लेकिन आज तो बिजी है – शायद वीकेंड पर उसके पास जाउंगी ” कनिका ने कहा।

शालू ने कैब में  बैठकर ड्राइवर को  ओ टी पी दिया और दोनों कैब में बैठकर घर की ओर चल दी। “सुबह जल्दी उठी होगी ?” शालू ने कहा

“हम्म ३ बजे की आसपास।  फ्लाइट ५:३० की थी”

“तू घर चलकर थोड़ा आराम कर ले। ”

“हम्म ” कनिका गाडी में ही शीशे पर सर रखकर सो गयी।

(6)

घर पहुँचते पहुँचते दोपहर का १ बज गया था।  कनिका जब सोकर उठी तो सादे पांच बज रहे थे।   शालू ने पूछा , “पहले फ्रेश होगी या चाय पीयेगी ?”

“कॉफ़ी, चाय नहीं पीती अब। टेस्ट बदल लिया है मैंने।  तू बना मैं फ्रेश होकर आती हूँ ” कनिका ने अपने बालों का बन बनाते हुए कहा , “शाम का क्या प्रोग्राम है ?”

“अभी तो कुछ नहीं। तू बता, कहीं चलें बाहर?”

“देखते हैं, तू कॉफ़ी बना , फिर बात करते हैं ” कहते हुए कनिका फ्रेश होने चली और जाते जाते बोली , “मौसम कैसा है बाहर?”

“गर्मी है। चहलक़दमी लायक नहीं है।  लेकिन किसी मॉल में चल सकते हैं ” शालू ने कॉफ़ी मेकर का स्विच ऑन किया

“घर फर्निश्ड ही लिया या कुछ सामन लायी है अपने साथ ?”

“नहीं कुछ लायी नही।  फर्निश्ड है। सब मालिक मकान का है। ”

“अच्छा है।  ज्यादा झंझट नहीं है।  चल आती हूँ १० मिनट में ” कनिका ने बाथरूम का दरवाजा बंद करते हुए कहा

अभी कनिका फ्रेश होकर बाहर आयी ही थी की डोरबेल बजी।  शालू किचन में थी इसलिए कनिका ने उठकर दरवाजा खोला

“जी?”

“प्रोफेसर साहिबा हैं ?”

“जी हैं; आप कौन ?” कनिका ने पूछा

“कनु दिब्येंदु है क्या ? ” अंदर से शालू की आवाज़ आयी और दरवाजे पर खड़े व्यक्ति ने कहा, “दिब्येंदु ही हूँ ” धीमे से मुस्कुराते हुए उसने पूछा “अंदर आ जाऊं ?”

“हाँ वही हैं ” कनिका ने फिर दरवाजे से हटते हुए कहा, “आइये ”

“अपना परिचय मैं खुद दूँ या मेरा परिचय आपको मिल चुका है?” दिब्येंदु मुस्कुराते हुए बैठक में दाखिल हुआ और पीछे मुड़कर कनिका को अपना परिचय दिया, “पि एस के साथ उनके कॉलेज में हिंदी पढ़ता हूँ ”

“पी एस कौन ?” कनिका ने अपना सवाल पूरा भी नहीं किया था की शालू ने अंदर से कहा, “कनु मुझे प्रोफेसर साहिबा कहकर बुलाते हैं, पी एस – प्रोफेसर साहिबा ”

“आइये बैठिये।  जब तक पी एस चाय बनातीं हैं तब तक हम औपचारिकताएं पूरी कर लेते हैं।”सोफे पर बैठते हुए दिब्येंदु ने कहा

कनिका को दिब्येंदु कुछ अल्हड लगा लेकिन उसकी शख्सियत हलकी नहीं थी।  हिंदी का प्रोफेसर सुनकर जैसी छवि बनती है – झोला उठाये कुर्ता पहने हलकी दाढ़ी बढ़ाये – उससे अलग था दिब्येंदु।  उसकी आँखें बोलती थीं और उसकी आवाज़ खासी गाढ़ी थी।  उसकी हर बात में कविता का मजा था जैसे हर शब्द उसने वर्षों की मेहनत से माँझ कर जुबान पर तरतीब से रखा हुआ हो – न एक शब्द ज्यादा और न एक शब्द कम।

जितनी देर में शालू चाय के साथ बैठक में आयी उतनी देर में दिब्येंदु और कनिका ने संवाद की आरंभिक औपचारिकताएं पूरी कर ली थीं। शालू को मण्डली में शामिल होने के लिए बस इतना भर जोड़ना पड़ा, “दिब्येंदु हौसला नहीं देता तो शायद मैं यह कदम नहीं उठा पाती”

इसके बाद बातों ने एक मोड़ काटकर दूसरा ही रास्ता पकड़ लिया।

“जितने शोर में थीं कहाँ इनको अपना मौन सुनाई देना था। आदमी ३६० डिग्री शोर से घिरा हो तो फिर क्या करे।  मैंने कहा आप मौन सुनने को घर से निकल आईये।  गलत कहा ?”

कनिका पर दिब्येंदु की बातों का रंग चढ़ने लगा था।

“हम सबने यही करना है आखिर में। सब निकल आएंगे शोर से मौन में और जो नहीं निकल पाएंगे, जिस भी पी एस को दिब्येंदु नहीं मिलेगा वो धीरे धीरे चिड़चिड़ा हो जायेगा।  पहले हम चिड़चिड़े होने लगते हैं और फिर यकायक बूढ़े हो जाते हैं।  क्यों ? मानती हो ?”

“हर सवाल का जवाब देने की मत सोचना कनु।  इस आदमी की आदत है हर बात के आखिर में सवाल छोड़ने की ” शालू ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा

“मौन बूढ़ा नहीं करता ?”

“एकाकीपन करता है मौन नहीं करता।  पी एस अब मौन में हैं एकाकी नहीं। और फिर मौन से शोर में लौटना तो इनके अपने हाथ में है।  जब चाहें लौट जाएँ ”

“इतना आसान होगा लौटना ? जब चाहें लौट जाएँ ? वक्त तो ठहरेगा नहीं। अब जब लौटेगी तो सबकुछ वहीँ तो नहीं होगा जहाँ छोड़ कर आयी थीं। और फिर जब लौटना ही है तो क्या फायदा। ”

“फायदा सिर्फ इतना की जब तक मौन में हैं अपनी मर्ज़ी से जीवन गवायाँ, जब शोर में हैं तो अपनी मर्जी नहीं थी। आखिर में तो सब गंवाना ही है।  नहीं क्या ?”

“सब गवां देना है ? सही में ?”

“क्यों तुमने सुना नहीं क्या लेकर आये हो क्या लेकर जाओगे।” और फिर मुस्कुरा दिए “हम सब मक्कार हैं दोस्त।  तुम मुझको और मैं तुमको बार बार यह यकीन दिलवाएंगे की हम खर्च नहीं हो रहे बल्कि जोड़ रहे हैं।  और दूसरे के इस जोड़ से परेशां होकर फिर खुद को और खर्च करेंगे लेकिन कहते यही रहेंगे की जोड़ रहे हैं।  फिर इतना खर्च हो जायेंगे की लगने लगेगा क्या पाया ? तो जब आखिर में खर्च हो जाने का रोना ही हैं तो अभी ही क्यों सा संभल जाएँ ?  क्या कहती हो ?”

शाम देर तक  बातें होती रहीं।

“कार्तिक का साथ होना मेरे अकेलेपन का इलाज़ तो नहीं”  किसी तर्क के तर्क पर शालू ने कहा

“क्यों?”

“क्योंकि हम कभी एक नहीं होते हम हमेशा दो होते हैं।  हमारा एक हम साझा करते हैं और हमारा दूसरा हम दबा लेते हैं।  पी एस का कहना है की कार्तिक के होने पर भी उसका दूसरा अकेला है ” कहते हुए दिब्येंदु ने जॉन ऐलिया को कोट किया “तुम तो मेरे साथ रहोगी मैं तनहा रह जाऊँगा ”

“तो यह तो हमारी गलती हुई।  किसने रोका है की दूसरा दबाये रखते हो ?”

“किसी ने नहीं।  लेकिन हम एक नहीं दो हैं यह एहसास कभी भी दोनों को एक साथ नहीं होता।  अब पी एस की ही बात देख लो।  उनको एहसास हो गया की उनमे कोई एक और भी है लेकिन अभी कार्तिक को नहीं हुआ।  जब उसको होगा तब तक हो सकता है मामला ही बिगड़ गया हो।  और अभी पी एस कार्तिक को समझाने की कोशिश भी करेगी तो कार्तिक को समझ आने वाला नहीं ” दिब्येंदु ने जवाब दिया और यकायक खड़ा हो गया, “चलता हूँ।  अब भी नहीं निकला तो घरवाले कहेंगे रात भर कहाँ थे। रात के ढलने से पहले अगर घर पहुँच जाओ तो बहुत से लांछनों से बच जाते हैं ” और फिर मुस्कुरा दिया

दिब्येंदु के रुखसत कर शालू ने दरवाजा बंद किया और टेबल पर पड़े खाली गिलास उठाकर किचन की तरफ ले जाते हुए कहा, “कॉफ़ी पीयेगी ?”

“हाँ बना ले।  तुझे सोने वोने की जल्दी तो नहीं है न ?” कनिका ने पूछा और फिर साथ ही बोली “यह इंटरेस्टिंग आदमी है शालू।  किस्सा क्या है यार ?”

“किस्सा तो इतना सा है की मेरी पसंद बदल रही है।”

कनिका को इतने बेबाक जवाब ने अचंभित कर दिया। “पसंद बदल रही है ? मतलब ?”

शालू ने बिना किसी हिचकिचाहट के पूछा “पसंद बदलनी गलत है क्या? नहीं बदल सकती ?”

“और कार्तिक ” कनिका ने सहसा पूछ लिया

“कार्तिक क्या? कार्तिक की तो इसमें कोई बात ही नहीं है। बात तो मेरी पसंद बदलने की है न। नहीं हुआ तेरे साथ कभी ? ”

इस जवाब के बाद दोनों की बातें पेंडुलम के एक छोर जहाँ नैतिकता, शील और पुण्यशीलता जैसे तर्क होते हैं से झूलकर दूसरे  छोर जहाँ  स्वछंदता, स्वावलम्बन, सोच और जीने की आजादी जैसी शह होती हैं आती जाती रहीं।

“रवि के साथ तेरा सम्बन्ध भी तो बदला है ?”

“बदला तो है शालू। बदला तो है। लेकिन हम अलग नहीं हुए ”

“मैं भी नहीं।  सिर्फ सबाटिकल पर हूँ।  तेरे लिए सबाटिकल आसान था।  रवि वैसे ही दूसरे शहर में रहता है।  मेरे लिए कोई चारा नहीं था।  सबाटिकल ख़तम होगा वापस चली जाउंगी। ”

“और दिब्येंदु ?”

“वो भी वापस चला जायेगे। शायद।”

“और इस बीच जो सब बिगड़ जायेगा उसका क्या ?”

“तेरे और रवि के बीच जो बिगड़ गया उसका क्या? और तुमने तो कभी सबाटिकल अन्नोउंस भी नहीं किया।  फिर भी रिश्ता बदल गया न ? रिश्ते बदलने से पहले अनाउंसमेंट नहीं मांगते कनिका। बस बदल जाते हैं।  फिर हम रिश्तों को निभाने का तरीका भी बदलते जाते हैं।  अब देख पहले कार्तिक की टूर वाली नौकरी नहीं थी, फिर महीने में ५-७ दिन टूर पर रहने लगा। फिर १० दिन।  जब टूर शुरू हुए थे तो हम हर शाम लम्बी लम्बी बात करते थे और हर बात के अंत में दोनों एक दूसरे से कहते थे की बस यह टूर ख़तम हो जल्दी से जल्दी।  फिर एडजस्ट हो  गया।  अब वो १० -१० दिन बैंगलोर रहता है और कभी कभी तो एक भी दिन बात नहीं होती।  हो गया न सब एडजस्ट ? हो जायेगा।  कुछ नहीं बिगड़ेगा ”

कनिका चुप रही फिर कुछ देर बाद किसी कड़ी को पकड़कर फिर बातें चल निकलीं।  बातों का उतना ही वजन था जितना समय भरने के लिए बातों का होता है।

फिर कुछ देर बाद बातें ऐसी हो गयीं की शालू कुछ कहती तो कनिका अपने दिमाग में जवाब तैयार करती रहती  है और कनिका जवाब देती तो शालू प्रतिउत्तर तैयार कर रही होती  – कोई किसी की सुन नहीं रहा होता। फिर जैसा अमूमन ऐसी स्तिथि में होता है दोनों आखिरकार थक गयीं और तय किया कि अब सो जाना चाहिए।

(7)

शालू की नींद कच्ची थी।  हलकी सी आहट से उसकी नींद उचट जाती थी। कनिका के फ़ोन पर एक के बाद एक मैसेज गिर रहे थे और हर मैसेज के साथ एक तीखी आवाज हो रही थी।  शालू ने लेटे लेटे ही उसका मोबाइल साइलेंट पर करने को उठाया।  कुल ३० मैसेज।  और आखरी मैसेज के पहले ५-७ शब्द जो स्क्रीन पर दिख रहे थे, “फिर तुमने कुछ कहा तो नहीं “।  नंबर पहचाना था।  कार्तिक का।  शालू ने फ़ोन पर ऊँगली फेरी , अनलॉक करने के लिए।  फ़ोन पर कोई पासकोड नहीं था, फ़ोन खुल गया।  कार्तिक के मैसेज थे – कनिका के फ़ोन पर।

“शायद ”

“सो गयीं क्या?”

“जवाब क्यों नहीं दे रही ?”

“अब जो दलेही में हो तो क्या रवि से मिलोगी

 

कार्तिक के मैसेज पढ़े।  जब समझ नहीं आया तो फिर ऊपर स्क्रॉल करके सिलसिलेवार चैट को पढ़ा

“दिब्येंदु है – उसके साथ कॉलेज में ”

“वो हिंदी प्रोफेसर? ”

“हम्म ”

“वो क्या कर रहा था वहां ”

“दोनों में बातचीत है।  इंटरेस्टिंग करैक्टर है दिब्येंदु। तुम यूँ ही परेशां थे कार्तिक।  हमारे बारे में शालू को कुछ नहीं पता।”

“लेकिन तुमने कहा उसने बैंगलोर के टूर का जिक्र किया था ”

“मैंने कुरेदा था उसे, जानने को की कहीं उसको कुछ पता तो नहीं।  लेकिन मुझे नहीं लगता उसे पता है ”

“और क्या कहा उसने ?”

“वही जो हम हर बार कहते हैं जब मिलते हैं।  यही की चालीस के आसपास क्या सबकी पसंद बदल जाती है ”

“उसने यह कहा ?”

“ऐसा सा ही कुछ।  तुम्हे उससे कभी कोई शिकायत नहीं रही।  मुझे रवि से शिकायत नहीं रही।  उसको तुमसे शिकायत नहीं रही। लेकिन हम सब अपनी अपनी वजह से एक दूसरे से दूर तो होते ही गए।  एक से दूर हुए और उसी पल में किसी एक के पास भी ”

“और ?”

“वो सबाटिकल पर है।  वापस आ जाएगी ”

“शायद ”

“सो गयीं क्या?”

“जवाब क्यों नहीं दे रही ?”

“अब जो दलेही में हो तो क्या रवि से मिलोगी

शालू ने चुपचाप फ़ोन साइलेंट पर कर दिया और कमरे से बाहर निकलकर बालकनी में आकर बैठ गयीं।  ठंडी हवा सबाटिकल की दूसरी सुबह उसको अच्छी लग रही थी

 

 

नासिरा शर्मा की कहानी जोड़ा


‘लॉक डाउन राइटर और उसके दोस्त सीरीज’ – सुभान असद


लॉक डाउन राइटर और उसके दोस्त सीरीज – अलका सरावगी – आपकी हँसी


नोटबंदी – 3 छोटे किस्से


लॉक डाउन राइटर के दोस्त सीरीज में आज – बाल कहानी – एक छोटी सी कोशिश


गुलाब और मनहारी का प्यार – Part 3


गुलाब और मनहारी का प्यार – Part 2


गुलाब और मनहारी का प्यार


दस दिन पार्ट 5 ऑफ़ 5


दस दिन पार्ट 4 ऑफ़ 5


दस दिन पार्ट 3 ऑफ़ 5


दस दिन – पार्ट 2 ऑफ़ 5


गुलाब और मनहारी का प्यार


 

मनहारी – गुलाब का प्यार

(गुलाब है एक लोकल लीडर और मनहारी है गुलाब की रखै।दुनिया को तो यही रिश्ता पता है। लेकिन दुनिया को कहाँ पता होता है की रिश्ते की परिभाषा इतनी सी नहीं होती। आपको लगता है की आप जानते हैं रिश्तों की परिभाषा ? तो चलो सुनते हैं गुलाब मनहारी का प्यार)

प्रिय पाठको! इधर-उधर के तमाम किस्से सुनकर आप सचमुच ऊब गये होंगे. कहाँ कहाँ के किस्से आपसे साझा करता रहता हूँ. और हाल फिलहाल के सारे किस्से सिर्फ मौत, दुःख की चाशनी में डूबे. कितनी देर कोई इस चाशनी का स्वाद चखे. आज कुछ अलग.

तो किस्सा शुरू होता है वर्ष २०१३ की सबसे बड़ी घटना से. गुलाब की रखैल जोन-५ की विधान सभा से विधायिका हो गयी. विधायिका के चुनाव से ठीक साल भर पहले गुलाब ने पूरा जोर लगा दिया की जोन-५ को महिलाओं के लिए आरक्षित सीट की लिस्ट में शामिल करवा दे. सब जानते हैं उसने यह अपनी रखैल के लिए ही किया. मनहारी के लिए यह सब करके गुलाब ने उसका तन-मन फिर से एकदम नए रूप में जीत लिया.

बात सिर्फ मनहारी के तन को जीतने भर की नहीं थी, गुलाब ने इसके साथ साथ मुसलमानों, पासियों और निचली जातियों में अपनी जगह पुख्ता कर ली. विधान सभा का आरक्षण बदला. जब से जोन-५ विधान सभा बनी तब से यहाँ से सवर्ण ही जीतता आया था. सरकार से इसे “महिलाओं के लिए आरक्षित सीट” करवाकर और उसपर मनहारी जैसी मुसलमानी को जितवाकर गुलाब ने सवर्णों का वर्चस्व कम किया, अपने लिए लोक सभा की टिकट निश्चित और जीत पक्की कर ली. सवर्णों के वोट तो गुलाब को मिलने ही थे. जोन-५ के सवर्ण कोई पंडित थोड़े थे; जैनियों का बोल बाला था. गुलाब खुद जैन स्थानक का चेयरपर्सन था. बस एक इस चाल से उसने अपने प्रतिध्वंदियों को मात दे दी.

लेकिन आप यकीन मानिये कि यह भी वो किस्सा नहीं था जो मैं आपको आज सुनाना चाहता हूँ. मनहारी ने गुलाब को अपना तन मन कब और कैसे दिया किस्सा वहां से शुरू करते हैं. बात उन दिनों की है जब गुलाब ने जोन-५ विधान सभा और उसके आसपास की हर छोटी बड़ी बात पर नज़र रखनी शुरू ही की थी. गुलज़ार-नाई, की दुकान के बाहर पड़ा दीवान उनका अड्डा होता था. वहीँ से वो थाना-तहसील, ब्लाक-कचहरी आदि के काम निपटाया करते थे. इलाके के दूसरे बड़े नेता, जोरावर सिंह के खिलाफ अपनी सियासी जमीन खड़ी करने की शुरुवात यहीं से हुई थी.

शायद १९९२ का दशहरा रहा होगा जब आयोजन को लेकर गुलाब और जोरावर सिंह के गुटों में बहस हुई. जोरावर सिंह का दल जोन-५ के पार्क में हर साल रामलीला करवाता था. इस बार गुलाब के दल ने पार्क पहले बुक करवा दिया. खटपट इतनी बढ़ गयी की जोरावर सिंह ने एलान कर दिया की अगर गुलाब ने रामलीला के लिए पार्क उसके दल को नहीं दिया तो गोली चल जायेगी. और गोली चली. गुलज़ार ने चली हुई गोली गुलाब को नहीं लगने दी. खुद बीच में आ गया. मुसलमान गुलज़ार की वहीँ मौत हो गयी और अस्पताल में उसकी लाश पर रोती उसकी पत्नी मनहारी पर गुलाब की पहली बार नज़र पड़ी.

मनहारी को तब कहाँ सुध थी की कहाँ उसका पल्लू, कहाँ उसकी ओढ़नी. वो तो रोती जाती थी और गुलाब को कैद करती जाती थी.

ऐसा नहीं था मनहारी पर सिर्फ गुलाब की नज़र पड़ी थी. हुआ कुछ ऐसा था की गुलज़ार के छोटे भाई ने अपनी भाभी से गुलज़ार के शहीद हो जाने के कुछ साल भर बाद, यानी १९९३ के जाड़े में कहा. “अब ऐसी जानलेवा जवानी पे ईमान न डोल जायेगा भाभी. ज़माना कोई ठीक तो नहीं. हम कौन खाये जाते है तुम्हे. हम तो रक्षा की ही बात करते हैं. दिरानी जेठानी वैसे भी तो रह ही रही हो एक छत के नीचे.”

गुलज़ार के छोटे भाई की हमदर्दी और नसीयत मनहारी को पसंद नहीं आयी. और यहीं गुलाब ने मनहारी को बड़ा सहारा दिया. उसके हक़ के लिए खुद थाना-पुलिस तक उसके साथ साथ गए. इधर उधर की साथ लगाकर मस्जिद के मौलवी तक को समझा दिया की मनहारी को अपनी आज़ादी मिलनी चाहिए. मौलवी भी जान गए की गुलाब अब इलाके के उभरते आफताब हैं. गुलाब ने जो मनहारी के लिए किया उसके बाद उनका छोटी जातिओं और मुसलमानों में भरोसा और पैठ गया.

गुलाब जब भी जोन-५ के दौरे पर निकलते मंगोल पूरी डी ब्लॉक जरूर जाते. मनहारी के खसम गुलज़ार ने उनके लिए शहीदी दी थी, इसलिए डी ब्लॉक का पार्क “शहीद गुलज़ार कुटिया” हो गया था. यहाँ गुलाब कि परमानेंट बैठक थी. हफ्ते में ३-४ बार गुलाब ३-४ घंटे यहीं बिताते, मनहारी कभी चाय ले आती, कभी हुक्का- पानी पूछने चली आती. कभी यूँ ही बैठी बैठक की बातें सुनती रहती.

१९९४  के जाड़े तक मनहारी के खसम को मरे २ साल बीत चुके थे, मुश्किल से २५ की मनहारी दो जाड़े  पति के बिना निकाल चुकी थी, धीरे धीरे गुलाब की निगाह समझने लगी थी, और गुलाब की निगाह का मजा भी लूटने लगी थी

मनहारी जितने दिन तनहा रह सकती थी रही, तनहा रहती मनहारी ने समझदारी भी सीख ली थी. घर में देवर देवरानी का डर था. गुलाब ही मददगार थे; अतः मनहारी को पसंद आने ही थे. एक दिन गुलाब ने मनहारी के सर पर हाथ रखा, वो कुछ नहीं बोली, फिर एक दिन कंधे पर हाथ रखा, वो कुछ नहीं बोली. और फिर छाती पर. मनहारी ने उसके हाथों को अपने दोनों हाथों से दबा लिया.

फिर उसकी २ साल से अकड़ी पड़ी देह, कितनी ही बार नरम पड़ी इसकी अलग अलग लोग अलग अलग संख्या देते हैं. १९९५ के जाड़ों से शुरू हुआ यह सिलसिला १९९६ के जाड़ों तक बिना रोकटोक और बिना किसी तकलीफ के चलता रहा.

१९९६ के जाड़ों में पार्टी ने आने वाले विधान सभा चुनावों के लिए प्रत्याशी चुनने का काम शुरू किया. जोन-५ से दो दावेदार थे. जोरावर सिंह और गुलाब . पार्टी ने अपने पुराने गद्दावर नेता जोरावर सिंह की जगह गुलाब को टिकट दिया. जोरावर सिंह के लौंडों ने मनहारी का नाम गुलाब की जोरू कहकर खूब उछाला. लोगों ने भी खुलकर चुटकी ली.

गुलाब घबराये नहीं. जवाब में उनहोंने मनहारी को फटाफट से मंगोल पूरी वार्ड की महिला समिति की अध्यक्षा नियुक्त किया. मनहारी का काम था इलाके की पासी और चमार औरतों को पार्टी से जोड़ने. मनहारी दुनियादारी समझने लगी थी और किसी चौके की आपसी, छोटी मोटी लड़ाई को भी कैसे अपने फायदे की लड़ाई बनाना है उसको अब आता था.

१९९७ में मनहारी ने खूब काम किया, मंगोल पूरी से बाहर निकलकर उसके साथ सटे चमारों के इलाके विजय विहार तक उसकी पैठ पहुँच गयी.

और फिर १९९८ का विधान सभा चुनाव आया. गुलाब जीत गया और इसमें गुलाब की जोरू, यानी मनहारी का परिश्रम बड़ा काम आया

यकीन मानिये मैंने जो अबतक किस्सा सुनाया है, अरे यही मनहारी और गुलाब वाला, यह वो किस्सा नहीं है जो मैं आपको आज सुनना चाहता हूँ. यह तो बस उस किस्से की भूमिका के लिए जरूरी है. असल किस्सा तो १९९८ की जीत के बाद शुरू होता है

मनहारी ने विधान सभा चुनाव से ठीक १ साल पहले, यानी १९९७ में, विजय विहार में “कामवाली कमिटी” बनवायी थी. पूरे जोन-५ में कामवालियों के रेट वही तय करती थी.

“एक माले की सफाई के २००, ४ जन वाले परिवार के बर्तन के ३०० और उसके ऊपर ५००; बच्चों को भी गिना जायेगा”. यह स्टैण्डर्ड रेट कार्ड था जोन-५ की कामवालियों का. इसपर तुर्रा यह, “२६ मीटर वाले घर का रेट कोठी वाले घरों से अलग. कोठी के १००० एक्स्ट्रा”

कामवालियां उसकी मुरीद थीं. और चाहे घर के बाहर कुछ लगे लेकिन घर के अंदर कामवालियों के मरद अपनी कामवालियों के. १९९८ में गुलाब जीता या मनहारी ने उसको जिताया इसपर क्या बहस. जोरू मरद के लिए माथे का पसीना एड़ी से बहाये यह क्या नयी बात है. यहाँ से गुलाब का रामराज्य शुरू हुआ जोन-५ विधान सभा क्षेत्र में.

१९९८ की जीत के बाद मनहारी गुलाब की जोरू कहाने लगी थी; रखैल कब हुई वो बाद की बात है. गुलाब की जोरू का रुसुक विजय विहार, मंगोल पूरी के हर थाने, हर राशन की दुकान पर था.

राशन का किस्सा कुछ यूँ था, की सरकार माई-बाप ने २ रंग के राशन कार्ड बना दिए थे. सफ़ेद रंग का राशन कार्ड उनके लिए जो सरकारी खाते में “गरीबी रेखा से ऊपर वाले परिवार” श्रेणी में आते थे. गुलाबी रंग का राशन कार्ड उनके लिए जो सरकारी खाते में “गरीबी रेखा से नीचे वाले परिवार” श्रेणी में आते थे.

कौन सा कार्ड आदमी के पास है उसके हिसाब से चीनी, गेहूं, चावल आदि मिलता था. मनहारी का शुरू शुरू का कमाल यह रहा की वो सफ़ेद श्रेणी को गुलाबी श्रेणी का कार्ड दिलवा सकती थी. केरोसिन और कोयले की जरूरत पासियों, चमारों, धोबियों को बहुत थी. गुलाबी कार्ड की कीमत सब जानते थे.

सन २००० आते-आते लोगों ने मनहारी को “गुलाबबाई” बुलाना शुरू कर दिया था.  एक बात खूब चली थी, “गुलाब की जोरू गुलाबीबाई से मिल ले; काम करवा देगी तेरा”

सन २००० आते आते एक बात और हुई थीं मनहारी के जीवन में. देवर से उसकी भी सुलह हो चुकी थी. घर का आदमी घर का होता है की तर्ज पर मनहारी ने देवर को राशन कार्ड के सामाजिक काम मे लगा लिया था. देवर को भी अब ३२ साल की मनहारी के बदन से क्या लेना था.

देवर ने खूब मदद की मनहारी की. मनहारी के कमाल को उसने अगले चरण में पहुँचाया. जिनके पास कार्ड नहीं था, उनको कार्ड बनवा कर देने का सामाजिक कार्य उसने शुरू किया. जिनको कार्ड मिलना ही नहीं चाहिए था उनकी भी मदद की. विजय विहार से सटे रिठाला में कई जाट परिवार थे जिनके पास धन की कमी नहीं थीं लेकिन उनके पास भी गुलाबी कार्ड थे. रिठाला के पीछे उनके खेतों के टुल्लू पम्पों को केरोसिन चाहिए था. देवर ने खूब मदद की उनकी

आमदनी का सर्टिफिकेट और कार्ड बनवाने के लिए हर छै महीने में मनहारी और उसकी टीम ने कैम्प लगाने शुरू किये. भारी भीड़ उमड़ती थी इन कम्पों में.

२००१ तक मनहारी को समझ आ गया की बहुत भरी संख्या में जोन-५ विधान सभा क्षेत्र में बिहारी, यु पी के मजदूर, बांग्लादेशी नेपाली लोग बसने लगे हैं. और यहाँ से छटपर्व पर मंगोल पूरी मे माता की चौकी का सिलसिला शुरू हो गया. लगातार १० साल तक यह सिलसिला चलता रहा – एक मुसलमान औरत माता की चौकी करवाती है – यह बात पूरे जोन-५ में मनहारी के रसूक को बढ़ाने के लिए लाभदायक थी

अगर आपको मुगालता है की यह सब मनहारी के दिमाग का कमाल था तो याद रहे वो गुलाब की रखैल है. एक किस्सा याद आता है. एक दिन गुलाब ने मनहारी से कहा था,

“नाइन, लोग-बाग अपनी आमदनी का सबूत जुटाने की जुगत में ही झुरा रहे है. वो महीने भर में किस-किस काम से कितना कमाते हैं और उनकी रोटी का जुगाड़ कहाँ से होता है इसका ठीक-ठाक जवाब उनके पास नहीं है. सो उनकी मदद करो नाइन. तुम ही हो जो लेखपाल को इन लोगों के कंगाल होने का यकीन दिलाओगी. तुम कलाकार हो नाइन; जैसे हमको यकीन दिलाया की हमारे बिना तुम असहाय मर ही जाओगी, वैसे ही लोगों को यकीन दिलाओ की यह काम इस इलाके में कोई करवा सकता है तो सिर्फ हमारी नाइन”

मनहारी को और किसी की समझ आये न आये गुलाब की बात समझ आती थी. इस मौके पर उसने अपना भी एक काम निकलवाना ठीक जाना, बोली

“एक बात कहूं बड़े साहिब. अब हमारा भी दफ्तर होना चाहिए साहिब. क्या यह की सारा दिन हम घर पर ही बैठक बिठाये हैं; आप आते हैं तो देखते नहीं देवर जी कैसे आँखे तरेरते हैं. आपको आने जाने में जो दिक्कत होती है न साहिब वो हमें अच्छी नहीं लगती”

शहीद गुलज़ार वाटिका याद है न आपको. वहीँ ६ कमरे वाली एक लाइब्रेरी विधान सभा फण्ड से २००२ तक तैयार हो गयी. यह उनकी तरफ से मनहारी को एक और तोहफा था. मनहारी ने भी यही समझा और गुलाब पर तन-मन से वारी गई.

फिर आया २००३ विधान सभा चुनाव. और पहली बार ऐसा हुआ की दिल्ली में निगम और विधान सभा दोनों चुनाव एक साथ हुए.

अब यहाँ से शुरू होता है हमारा असली किस्सा. मनहारी को गुलाब ने टिकट दिलवाया निगम का और खुद लड़े विधान सभा. गुलाब चुनाव हार गए. मनहारी निगम का चुनाव जीत गयी. चुनाव के नतीजे एक ही दिन आये. मनहारी ने जीत का जश्न न करने का फैसला किया है यह बात सुनकर खुद गुलाब जी “शहीद गुलज़ार वाटिका” आये और आधी रात तक माता के जगराते में बैठे.

तो किस्सा यह है की मनहारी ठहरी मुसलमान नाइन और भाभी के निगम पार्षद होने के जश्न में देवर जी ने विलायती चढ़ा ली. अपने नए निकले परो से उड़ने लगे.

माता के जगराते पर, सुबह तारा माता की कथा के समय, मनहारी, गुलाब और देवर ६ कमरे वाली लाइब्रेरी में बैठे बातें कर रहे थे. देवर ने जीत के जोश में कह दिया, “साहेब भाभी ने आपको भी पीछे छोड़ दिया” गुलाब बाबू मंझे हुए खिलाडी थे. चुप नहीं रहे, और गुस्सा भी नहीं हुए. बोले, “अभी तो शुरुवात है छोटे नाई. देखते जाओ मनहारी जोन-५ विधान सभा जीतेगी”

२००३ का किया हुआ वादा पूरा होने में मनहारी को २०१३ तक इंतज़ार करना पड़ा.

अब हमारे पास दो रास्ते हैं. एक तो यह की हम २०१३ से किस्से को २००३ तक ले आएं और फिर २००३ की आखरी बड़ी घटना पर समाप्त करें और दूसरा यह की २००३ से सिलस्लेवार २०१३ तक इसको ले जाएँ और फिर इसे ख़तम करें.

एक काम करते हैं; जैसे फिल्मों में होता है वैसे ही कहानी में भी २०१३ से २००३ तक आते हैं.

तो साहिबान २०१३ में गुलाब की रखैल जोन-५ की विधान सभा से विधायक हो गयी.

लेकिन किस्सा शुरू होता है मुश्किल से साल डेढ़ साल पहले; २०११ की गर्मियों की शुरुवात ही हुई थी. महाराष्ट के किसी गांधीवादी नेता से मनहारी की मुलाकात गुलाब ने करवाई. मनहारी को पूरे रास्ते गुलाब ने एक ही बात बार बार कही; “यह अगला चुनाव तय करेगा नाईन. समझ लो यह हवा जिस और चलेगी वहीँ वोट डलेंगे. साल भर में चुनाव का  है नाईन. अपनी सीट तो “आरक्षित सीट” होने वाली है. टिकट पार्टी से तुमको ही मिलेगी. खूब काम करो नाईन”

मनहारी को गुलाब समझ आते थे. समझ गयीं. अप्रैल २०११ में मनहारी ने निगम की सीट से इस्तीफा दे दिया और अन्ना के मंच के नीचे जो दरिया बिछी थी वहां रोज अपने साथियों के साथ बैठने लगी. मई २०११ में बाबा रामदेव रामलीला मैदान आये तो मनहारी ने उनके योग शिविर के लिए मंगोल पूरी से १२ बसें भरकर भेजीं.

बाबा योग योग कहते रहे लेकिन सरकार कोई बच्चों की गुड़िया है जो गच्चा खा जाती; सरकार ने जिस रात बाबा रामदेव को घाघरा चोली पहनकर भागने पर मजबूर किया उस रात रामलीला मैदान में मनहारी के टोले के ५०० आदमी थे. भगदड़ में मनहारी ने भी पुलिस के २-४ लठ खाये. कहते हैं बाबा जब पुलिस से बचकर स्टेज से कूदे तो मनहारी ही स्टेज के नीचे उन्हें कैच करने को खड़ी थी. बातों का क्या है; मैं इस बात पर विश्वास नहीं करता

जिस मनहारी की बात कर रहे हैं वो गुलाब की जोरू से गुलाबीबाई से गुलाब की रखैल तक का सफर तय करके आयी थी. जैसे ही अगले दिन रामदेव ने कहा की अक्टूबर में वो दूसरे चरण का आंदोलन करेंगे और १,००,००० किलोमीटर की पद यात्रा करेंगे, मनहारी ने मन बना लिया की वो रामदेव के साथ साथ चलेगी.

अक्टूबर से पहले अगस्त आया और अन्ना रामदेव से पहले आकर दिल्ली में बैठ गए. १५ अगस्त को किसी ने प्रधान मंत्री का भाषण नहीं सुना, क्योंकि १६ को अन्ना अनशन पर बैठने वाले थे. १६ को अन्ना बैठे अनशन पर और गुलाब ने “शहीद गुलज़ार वाटिका” में मनहारी से कहा, “२१ को रामलीला मैदान चलना है नाईन. २०,००० आदमियों का जुगाड़ करो. यकीन मनो यह कर लिया तो पो बाराह. टिकट भी पक्की और जीत भी”

२१ को कहते हैं रामलीला मैदान में १००,००० लोग जुटे. और पहली बार मनहारी को नीचे दरियों से उठाकर मंच तक लेकर गए आंदोलन वाले. गुलाब के मोबाइल फ़ोन पर मनहारी ने फ़ोन करके कहा, “साहिब, आगे का क्या हुकुम”

“कुछ नहीं नाईन. बस मंच पर बैठी रहो. हम नहीं आएंगे. हम यहाँ से लगे हैं टिकट के लिए. तुम वहां बैठी रहना. और सुनो, उपवास रख लोगी?”

“साहिब रोजे रखते हैं हम हर साल”

“अभी भी. अब कहाँ रही तुम मुसलमानी बीबी. २ दिन का उपवास रख लेना”

मनहारी २१ से २८ अगस्त तक वहीँ रामलीला मैदान में ही रही. घर पर वैसे भी क्या काम था उसको. २४ और २७ को उपवास में शामिल हुई. २४ के दिन अन्ना के लोग मिलने गए थे प्रधान मंत्री से. मंच पर उपवास में बैठने वालों की कमी थी. मनहारी ने अपना नाम आगे करते हुए कहा था, “भाई लोग जा रहे हैं तो बहन लोग उपवास कर सकती हैं.” और इसके बाद से मनहारी का नाम हो गया “बहन मनहारी”

खैर हमको जाना था पीछे और जाने लगे आगे. २०१३ में मनहारी विधान सभा सीट जीतीं. और इस काम का सफर २०११ से शुरू हुआ. यह ऊपर स्पष्ट हो गया. यह कहने की अब जरूरत नहीं की २०१३ में वो नयी पार्टी की टिकट से चुनाव लड़ी. अनशन से लेकर लोगों को जुटाने का पारितोषिक उसको मिला यह भी मोटा मोटा साफ़ है ऊपर के किस्से से.

और यकीनन आप लोग यह भी समझ गए होंगे की गुलाब ने पार्टी नहीं बदली. वो पीछे ही रहा. इस किस्से को बाद में विस्तार से. क्यों? क्या फायदा हुआ उसका? वो सब बाद में.

अभी चलते हैं २०१० में. मनहारी २००८ में दूसरी बार निगम पार्षद को चुनाव जीतकर आयी थी. मंगोल पूरी के पीछे एक इलाका था बवाना. और वहां बन रहा था २००८ से राजीव गाँधी राष्ट्रमंडल खेल स्टेडियम. इस स्टेडियम को दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में कुश्ती, बॉक्सिंग, वेटलिफ्टिंग और तीरंदाजी के इवेंट को होस्ट करना था. मनहारी ने गुलाब के लिए खूब पैसा बनाया इस स्टेडियम के निर्माण कार्य में. और इसी समय यानी २००८ में गुलाब ने उससे कहा था “नाईन २०१० में दिल्ली में न न करते भी करीबन ३००००० अंग्रेज आएंगे. बहुत सारे देशों से. तुम लगी हो ईंट पत्थर में पैसा ढूंढने. और पैसा है जिन्दा जिस्म में.”

नाईन को समझने में देर नहीं लगी. २०१० में दिल्ली निगम पालिका ने जहाँ एक तरफ जी बी रोड की दीवारों से पान की पीक हटाकर सुन्दर पुताई की वहीँ मनहारी ने बवाना से सटे नरेला में मिनी जी बी रोड की नीवं डाली. मनहारी को सबसे बड़ा कमाल तो यह रहा की इन नए बने कोठों को बैंक से फ्रिज और ए सी के लिए लोन तक दिलवाया. इसका भी अपना एक किस्सा है. मनहारी का देवर याद है? उसकी नस्ल का पहला चिराग मनहारी के बहुत काम आया. एक तरफ उसने लोन देने वाली कंपनी की फ्रैंचाइज़ी ली और मंगोल पूरी में दफ्तर खोला और दूसरी तरफ उसने शुरू किया “स्वास्थ्य टेस्टिंग सेण्टर”. मनहारी ने नरेला की एक एक छोकरी को सर्टीफिट दिलवाया – “साफ़, स्वस्थ सेक्स वर्कर” – सर्टिफिकेट नरेला की कई खोलियों में २०१० -११ में टंगा होता था.

क्या खूब रहे वो दो हफ्ते. कहते हैं स्टेडियम खाली रहे, मैदान में प्रत्योगिता नहीं दिखी लेकिन खिलाडियों ने खूब खेला, इतना खेला की मनहारी की मुन्सिपल कारपोरेशन के कर्मचारी अवरुद्ध नालियों को खोलने में दिन भर पसीना बहाते और सुबह फिर नालियां बंद मिलतीं.

कंडोम का इतना इस्तेमाल दिल्ली में शायद उससे पहले और उसके बाद कभी नहीं हुआ. १९९२ के बार्सिलोना ओलंपिक्स के बाद खेल गांव में रह रहे हर खिलाडी को मुफ्त कंडोम उपलब्ध करना अनिवार्य था, दिल्ली के कामनवेल्थ गेम्स में इसका ठेका गुलाब के दोस्त को मिला था. और इस तरह पूरा चक्र सिर्फ एक आदमी के हाथों में था.

चार साढ़े चारसौ दलालों को खेलों के बाद सरकारी बाबुओं ने पकड़ा. हर दलाल के पास २०-२५ लड़कियों की फाइल थी. जब सरकारी बाबू मनहारी के देवर के सपूत के पास पहुंचे तो मनहारी ने बाबू को कहा था, “हमने कभी कुछ गलत नहीं किया बाबू. आप भी कुछ गलत नहीं होने देंगे इसका भरोसा चाहिए साहब”. इतना सुनते ही सरकारी बाबू ने धीरे से कहा, “आप जोरावर सिंह जी से जरूर मिल लीजियेगा. हमारा जोर कितना चलेगा वो आपपर ही है पार्षद जी”

पूछताछ के बाद हर अखबार में खबरें छपीं और कुछ अखबारों ने स्टिंग ऑपरेशन भी किये. २०१०-२०११ का साल कई स्टिंग ऑपरेशन्स का साल था. कहते हैं स्टिंग की पूरी फंडिंग जोरावर सिंह ने की थी. स्टिंग की खबर चलने से पहले जोरावर सिंह ने मनहारी को बुलवाया था. “क्या कहती हो नाइन, अब हम क्या करें?”

“किसी को पता मत लगने दें; बस इतना भर कर दें. हमारी गलती नहीं साहिब

पूछताछ के बाद हर अखबार में खबरें छपीं और कुछ अखबारों ने स्टिंग ऑपरेशन भी किये. २०१०-२०११ का साल कई स्टिंग ऑपरेशन्स का साल था. कहते हैं स्टिंग की पूरी फंडिंग जोरावर सिंह ने की थी. स्टिंग की खबर चलने से पहले जोरावर सिंह ने मनहारी को बुलवाया था. “क्या कहती हो नाइन, अब हम क्या करें?”

“किसी को पता मत लगने दें; बस इतना भर कर दें. हमारी गलती नहीं साहिब.” मनहारी ने धीरे से कहा. उसको पता था की अगर उसने चू-चा की तो बात सीधा गुलाब को घेरेगी. मनहारी किसी सावित्री से कम नहीं थी, आदमी पर विपदा आये और वो साइड हो जाये यह उसके संस्कार नहीं थे

“और हम क्यों न पता लगने दें. इतना पैसा खर्चा हमने किस बात के लिए? तुम भोली बहुत बनती हो नाइन”

“फिर आप कहें साहिब. क्या किया जाये. पैसे का क्या है साहिब; आपके पास पड़ा रहे या मेरे पास; मैं जानती हूँ उसकी  चिंता नहीं आपको – आपसे ही सीखे हैं साहिब. जो लिख दें तो इंतज़ाम कर दें हम.” मनहारी को पता था की पैसे का तो खेल ही नहीं है यह.

“और? टिकट का क्या करें?”

“हम नहीं लेंगे मालिक अगली बार. खुदही पीछे हो जायेंगे. आप जीतें.”

“और अनीश”

“उनकी हम कैसे कहें साहिब. दो शेर लोग आपस में निपटा लें, हम सियारों की क्या बिसात साहिब” मनहारी ने एक एक कदम भरना ही ठीक समझा.

और सौदा पट गया. जोरावर सिंह को उसकी मेहनत का पैसे भी मिला और मुनाफा भी. दोनों गुलाब – मनहारी ने चुपचाप अगले चुनाव का टिकट लेने से मन कर दिया. याद रहे यह साल था २०१० का. चुनाव थे २०१३ में. और याद रहे की २०११ में गुलाब ने मनहारी को अन्ना के मंच तक पहुँचाया, मनहारी ने पार्टी ही छोड़ दी, पार्षदी से इस्तीफा दें दिया. परदे के आगे जो भी दिखा या दिखाया गया, परदे के पीछे का खेल अब साफ़ हो जाता है. पार्टी में रहकर टिकट नहीं मिलना था. जोरावर सिंह को जुबान दी थी दोनों ने; सो जैसे ही नयी हवा बहती दिखी मनहारी ने बाज़ी मार ली. गुलाब चुपचाप विधान सभा को “आरक्षित सीट” घोषित करवाने में लगा रहा. और जैसा कहते हैं बाकि सब तो अब इतिहास के पन्नों में दर्ज है.

लेकिन असल किस्सा अभी भी बाकि है. क्योंकि अब साल है २०१५. २०१३ में मनहारी के जितने के बाद, लोगों को लगा की गुलाब अब “खर्च हो चूका रूपया है”. छै महीने भी नहीं बीते की मनहारी की तूती पूरे इलाके में बोलने लगी. “शहीद गुलज़ार वाटिका” के बाहर हमेशा फरयादियों का तांता लगा रहता. पार्टी नयी थी और उसके विधायक तो बिलकुल ही नौसिखिये. पार्टी को मनहारी में सीखा सिखाया विधायक मिला और इसका फायदा मनहारी को हुआ. पार्टी ने मनहारी को बनाया कानून और न्याय मंत्री. जिस दिन मनहारी ने इस पद की शपथ ली थी गुलाब और मनहारी के पेट में उस शाम हँसते- हँसते दर्द हो गया था – कानून और न्याय मंत्री बहिन मनहारी.

तय तो गुलाब ने मनहारी की जीत के दिन ही कर लिया था की अगली बार विधायकी वो लड़ेगा और जीतेगा भी. मनहारी नाम की पतंग हवा में गोते खाती थी; और यूँ हवा के साथ बहती थी की पहली बार गुलाब को लगा, थोड़ा कसना पड़ेगा.

अचानक एक दिन अखबार में खबर छपी की बहिन मनहारी की “लॉ की डिग्री”, जो उन्होंने अपने इलेक्शन डॉक्युमेंट में दिखाई है, की वैध्यता पर शक जाहिर करते हुए किसी प्रदीप कुमार ने आर.टी.आयी डाली है. शहीद गुलज़ार वाटिका के बाहर हर टीवी चैनल की आदमी खड़े थे. मनहारी ने कभी चुनाव के पर्चे खुद नहीं भरे थे. उसका यह काम करते थे गुलाब जी. और गुलाब पर उसको था पूरा भरोसा. इसी भरोसे के दम पर उसने पत्रकारों के सामने जाकर चोड में बोला, “मेरे कागज़ सब सही हैं. यह सब मेरी पुरानी पार्टी  की साजिश है. पुराने आदमी हमारी सरकार को काम नहीं करने दे रहे”

फिर उसके बाद जो मनहारी की दुर्गति हुई उसका ब्यौरा संक्षेप में नीचे. लेकिन उससे भी पहले यह बता देना जरूरी है की मनहारी का दिल उसी क्षण टूट गया जब गुलाब ने फ़ोन पर उससे कहा; “बिना पूछे अखबार वालों से बात क्यों की तूने बहन मनहारी!”

बहन मनहारी को पुलिस वाले उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद ले गए. रास्ते में पुछा, “कहाँ है तुम्हरी यूनिवर्सिटी?” महारी सन्न रही. टीवी वालों ने उसका वो चेहरा खूब चलाया. फिर पुलिस वालों ने अवध यूनिवर्सिटी के ऑफिस में बिठाकर पुछा. “कभी आयी भी थीं आप यहाँ?” मनहारी फिर चुप; और इस बार तो शर्म से गर्दन भी झुका ली. टीवी वालों ने उसका यह चेहरा भी खूब चलाया.

अंततः मनहारी को ४ दिन की पुलिस कस्टडी में भेजा गया. अखबारों मे और टीवी पर यह सच्चाई दिखाई गयी की मनहारी की सभी डिग्रीयां जाली थीं. मनहारी को यही मलाल रहा की किसी ने यह नहीं कहा की वो बिलकुल सच्ची थी, की उसने कब कहा था गुलाब को जाली डिग्री दाखिल करने के लिए. उसको यह मलाल रहा की गुलाब ने उसको अपने से दूर कर दिया.

२०१५ की जनवरी में गुलाब फिर मनहारी से मिलने आये. बोले “नाइन, तुम्हारा चुनाव लड़ना बेकार है. तुम एक काम करो, हमारी जोरू को टिकट मिलेगा सीट से, महिलाओं के लिए आरक्षित सीट है न, तुम उसको समर्थन करो”

“साहिब उस दिन जब “बहिन- मनहारी” कहकर बोले थे न, हम तभी जान गए थे आपने पराया कर दिया; आज फिर नाइन बोले हैं – अपना बना रहे हैं, जो कहेंगे करेंगे साहिब”

और यहाँ किस्सा हुआ ख़तम. इसको कहते हैं प्यार – बिलकुल शीरीं-फरहाद और हीर-राँझा के जैसा खालिस प्यार.  बस इतना फर्क की हमारी महारी को खालिस फरहाद नहीं मिल पाया

दस दिन – पार्ट 1 ऑफ़ 5


कहानी : “दस दिन”


कहानी : “दस दिन,  सिर्फ दस दिन” 

एक :  तीसरा दिन

“आपने उत्तर नहीं दिया; आप खुश हैं?”

फिर वही, कहीं से भी बात शुरू करो यहीं पहुँचती है; इस बार उसने उत्तर देना सही समझा, “बाबा को पता था; कई सालों से. मेरे पति को भी. शुरू से”

“और आपको आज पता लगा की उन्हें पता था?”

उसने धीमे से स्वीकृति में गर्दन हिलायी, एक मार्मिक उदास मुस्कराहट उसके चेहरे पर तैरी. करन आगे चल पड़ा, और पीछे पीछे माँ. अभी कुछ ही सीढ़ियां चढ़े होंगे की करन ने पीछे मुड़कर कहा

“आपको एक प्रश्न पूछने की छूट देता हूँ. कोई प्रश्न जो आपको पूछना हो? आपको वचन देता हूँ बिना किसी उपालम्भ बिना किसी शिकायत उतर दूंगा”

और माँ ने बिना एक भी क्षण खोये धीमे से पुछा, “और कोई भी जानता है?”

“क्या?” करन बोला

“इन १० दिनों के बारे में?”

“कौन? जैसे की कौन?” करन के प्रश्न मे रोष था

“मुझे नहीं पता….” करन के चेहरे के भाव बदल गए. माँ ने उसका हाथ पकड़कर रोकना चाहा लेकिन करन आगे बढ़ गया

 

दो

प्रस्तावना

वो हाथ में मूंगा पहनती थी. दुश्मनों पर काबू पाने के लिए आवश्यक हिम्मत मिलती थी मूंगे से. और चलते समय अपने दायें हाथ की उँगलियों से बाएं हाथ में पहनी मूंगे की अंगूठी धीरे धीरे हिलाती रहती थी. अपने आलिशान घर की रसोई में शाम के खाने को लेकर अपने नौकरों को हिदायत दे रही थी.

“अधिक आग्रह की आवश्यकता नहीं; संक्षिप्त मे ….. अगर किसी प्रश्न का उत्तर देना भी पड़े, आप उनके परिचित नहीं” नौकर पूरे ध्यान से उसकी हिदायत सुन रहे थे, “मान लो आपसे कुछ गिर जाए, टूट जाये तो चुपचाप निकल जायें, माफ़ी के लिए और साफ़ सफाई के लिए और लोग होंगे वहां. और ध्यान रहे, आप में से, खाने की बैठक में कोई भी किसी तरह का आभूषण पहन कर नहीं आएगा. जो वस्त्र मिले हैं बस उतने”

यह सुनते ही, उससे दूर खड़े एक लड़के ने अपने कान के कुण्डलों को पहले छुआ और फिर अपने बड़े हुए बालों और कोट के कालर से छुपा लिया

“मुझे विश्वास है आप अच्छा काम करेंगे. आपका धन्यवाद” और इतना कहकर वो वहां से चली गयीं

तीन

शाम का खाना शुरू हो चुका था. कितने ही अतिथि – गिनती नहीं. और कितना बड़ा खाने का मेज. एक कोने से दूसरे कोने तक कुछ ५०-५५ कुर्सियां. और हर कुर्सी की सेवा में एक अदद सेवक. और सबमे ऐसा तारतम्य जैसे कोई सैन्य दस्ता मार्च कर रहा हो. अतिथि आपस में बात करने में व्यस्त. और उसकी नज़र सबपर लेकिन किसी पर नहीं.

“रस?” जब प्याले में रास डालने की बारी आयी तो लड़के ने सभी की तरह आगे बढ़कर पुछा

“संतरे का” उनहोंने कहा

उस लड़के ने चुपचाप रस उनके ग्लास मे डाल दिया. रस का स्वाद उनहोंने पहचान लिया; यह उनके शहर मे मिलने वाला रस नहीं था. मुड़कर लड़के को देखा. लड़के के कानों के कुण्डल उसकी दूसरी गलती थे.  लेकिन ये समय नहीं था. लड़के की तस्वीर उनहोंने अपनी आंखों में रख ली.

चार

सबके चले जाने के बाद उनहोंने लड़के को बुलाया, “वो रस दोगे थोड़ा और?”

“लड़के ने चुपचाप उनको एक और प्याला दिया और कोने में खड़ा हो गया”

वो उस लड़के को बहुत देर देखती रहीं; और दोनों को कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं पड़ी. फिर उठकर जाने से पहले उन्होंने इतना कहा, “शहर में कहाँ ठहरे हो?”

“यहीं पास में” लड़के ने कहते हुए एक कागाज का टुकड़ा आगे बढ़ा दिया जिसपर उसके होटल का पता लिखा था

“कल ….”  इतना भर कहकर उन्होंने लड़के को जाने को कहा, लड़का चुपचाप वहां से चला गया

पांच

उनको शहर में कौन नहीं जानता था? अगले दिन जब वो उस लड़के से मिलने पहुंची तो उस होटल की रिसेप्शन पर बैठे कितने ही लोग थे जो उन्हें जानते थे. कितने ही खुद उठकर उनके पास आये. कितनों ने उन्हें अपने पास बैठने का न्योता दिया.

“नहीं एक साक्षात्कार है, वो जो लड़का बैठा है वहाँ, उससे मिलना है.  आज नहीं फिर मिलूंगी आपसे” उन्होंने औपचारिकता निभाए और आगे बढ़ गयीं

लड़के की पास पहुंचकर उन्होंने कहा, “तुम्हारे लिए चाय बोली है मैंने”

लड़का इस शहर का नहीं था. उसकी पौषक से जाहिर था. उसके केश बिखरे थे, शायद उसके गांव मे इस शहर की मुक़ाबले ठड ज्यादा पड़ती थी लेकिन यहाँ उस जैकेट की जरूरत नहीं थी जो वो पहना था. शायद उसको शिष्टाचार के नियम भी नहीं पता थे क्योंकि वो उनके आने पर खड़ा नहीं हुआ. सिर्फ सर उठाकर उनकी तरफ देखा.

“तुम्हे कुछ कुछ और चाहिए?” बैठते हुए उन्होंने लड़के से पूछा

“आप अपना चश्मा उतार सकती हैं?” उसने कहा

चेहरे को पत्थर करना तो उनको आता था, आँखों मे उतरे भाव वो चश्मे से छुपाती थीं. चश्मा उतारते ही लड़के के सामने उनकी कित्रिमता स्पष्ट उभर आयी. लड़का उनकी आँखों में अपराध भाव को पढ़ते ही कटाक्ष से भर मुस्कुराया फिर अपनी जैकेट से एक सिग्रेटे निकाली, सुलगायी.

“मुझे नहीं लगता यहाँ तुम सिग्रेटे जला सकते हो”

“वो देखेंगे लेकिन मुझे रोकेंगे नहीं, खासकर तब तक जब तक आप हैं यहाँ” लड़के ने कहा

“शायद तब तक जब तक कोई शिकायत न करे ”

“हम्म …आप जबतक हैं यहाँ. कोई शिकायत नहीं करेगा ” लड़का ने कहा

उनके शारीरिक हाव भाव में एक कसाव था. सीधे बिलकुल सीधे कमर करके, दोनों टांगो को जोड़े, दाएं हाथ की उँगलियों से बाएं हाथ के मूंगे को अत्यंत धीमे हिला रहीं थीं.  लड़के ने सिग्रेटे पीनी चालू रखी

“मेरे बारे में पता कैसे चला?”

“आपको ढूंढ लेना मुश्किल है क्या?”

“और घर में दाखिल कैसे हुए?”

“आपको बताने से उस व्यक्ति पर आपके प्रतिकार का संशय है मुझे. लेकिन किसी ने तो मदद की ही होगी” लड़के ने उन्हें बात पूरी नहीं करने दी, “मुश्किल नहीं था. आपकी नज़र में आने के लिए अगर हत्या भी करनी पड़ती तो परहेज नहीं था मुझे”

उनका मूंगा घुमाना थम गया; आँखों में लोहा सा उतरता लगा, ठोस होता जाता लोहा; लड़के की ज़ुर्रत पर विश्वास नहीं हुआ उन्हें.

“मैं मजाक नहीं कर रहा” लड़के ने कहकर सबूत दिया की वो जरा भी विचलित नहीं हुआ

 

“सर आप यहाँ सिग्रेटे नहीं पी सकते” चाय रखते हुए वेटर ने कहा

“अच्छा, मैंने तो पूछा था इनसे. इन्होने कहा पी सकते हैं. आप जानते हैं इन्हे?” लड़के ने उनकी तरफ इशारा कर कहा और फिर सिग्रेटे बुझाते हुए उनकी ओर दुष्टता भरी मुस्कराहट से देखा

वो कुछ विचलित सी लगीं; जैसे समझ गयी हों यह लड़का विद्रोही है. वेटर चुप चाप चाय रखकर चला गया

“क्या चाहिए तुम्हे?”

चाय का कप उठाते उसने कहा, “मैं चाहता हूँ की आप मेरे साथ १० दिन बिताएं”

“क्या?”

“आपने सही सुना”

उनको लगा उनका गला सूख रहा है, बोतल से पानी ग्लास मे डालते उनके हाथ कांप रहे थे, लड़के को अच्छा लगा. यही तो वो चाहता था, “यह धमकी नहीं है. आप सोच सकती हैं इस बारे में यदि आप चाहें तो”

“धन्यवाद” पानी पीते हुए उनहोंने कहा अपना पर्स उठाया और वहां से चली, जाते जाते ५०० का नोट टेबल पर रखा, “जो बचे वो टिप के छोड़ देना”

लड़का हंसा, उसकी हंसी में उनके लिए धिक्कार था

 

छह

प्रारम्भ

“कितना?”

“उसको पैसा नहीं चाहिए” उन्हें यकीन था की वो पैसे के लिए नहीं आया था

“उसे क्या चाहिए?”

“वो चाहता है कि मैं उसके साथ १० दिन तक रहूँ” उन्होंने कहा

“उसने धमकी दी?”

“नहीं”

“क्या उम्र होगी उसकी?”

“२५ का या तीस का” कुंती ने कहा और कहते हुए वो कमरे के उस भाग कि ओर चली जहाँ अँधेरा कुछ ज्यादा था; “वो पुत्र है मेरा, मैंने जन्म देते ही छोड़ दिया था; विवाह से पहले कि संतान ….” और वो उसी अँधेरे में कहीं बैठ गयी

“तुम्हे यकीन है कि यह वो ही है ?”

“हाँ”

“कैसे?”

कुंती ने गहरी सांस ली, “उसके कुण्डल पहचानती हूँ मैं”

बाबा ने ज्ञान की तरफ देखा. बाबा ज्ञान को विदुर बुलाते थे. विदुर समझ गया और उसने लड़के को बुलावा भिजवाया

सात

सौदा, समझौता और अनुबंध

उस कमरे में कुल ६ कुर्सियां थी; कुंती ने कई बार अपने बड़े बेटे से कहा था एक-दो और होनी चाहिए; कभी कोई मेहमान ही जाए लेकिन उसके पुत्र को यह सुझाव कभी नहीं जंचा. आज कमरे में सिर्फ तीन लोग थे; वो, बाबा और उनका विश्वस्त सलाहकार ज्ञान.

लड़के को कमरे तक खुद विदुर लेकर आया. लड़का हिचकिचाते हुए कुर्सी पर बैठा. इतने बड़े कमरे में शायद वो पहले बार दाखिल हुआ था

“चाय लोगे”

“नहीं”

“तो फिर सुनिए; हमने आपको बुलाया ताकि कुछ बातें स्पष्ट कि जा सकें. आपकी अजीब सी मांग है” लड़के का ध्यान कुंती कि तरफ था लेकिन कुंती उस लड़के की तरफ नहीं देख रही थी, उनकी नज़र खिड़की से बाहर कि तरफ थी; जैसे भूत के अँधेरे से भविष्य का उजाला ढूंढना चाहती हों.

“आप दीदी के साथ १० दिन बिताना चाहते हैं.” ज्ञान ने आश्चर्य के साथ कहा, “बड़ी अजीब से मांग है आपकी”

“जी”

“तो आप बता सकते हैं कि क्या करने वाले हैं आप इन १० दिनों में?”

“कोई सूची? तो तैयार नहीं की है मैंने ” लड़का हक्का बक्का सा देख रहा था; उसको समझ नहीं आया कि क्या कहे. उसकी बाजुएँ अपने शरीर से इतनी भीचीं सी थी कि मानो वो खुद में सिमटता सा जा रहा हो.

“मेरे कहने का मतलब है कोई कैलेंडर तो होगा आपके पास कि आप क्या करने वाले हैं इन १० दिनों में?”

“नहीं कुछ नहीं है. लेकिन हम कुछ तो करेंगे. शायद बातें”

“हम वही जानना चाहते हैं” फिर क्षण भर ठहरकर, “कोई और रास्ता हो, इससे तेज इस मसले को सुलझाने का, जैसे की वित्तीय भरपाई आपके नुक्सान की?”

लड़के ने फिर एक बार कुंती की और देखा. वो अब भी खिड़की सी बाहर की तरफ देख रही थीं

“पैसे से भरपाई हो सकती है?”

“कोई और तरीका?” विदुर ने खुद को एक अवसर और दिया हालांकि उसको भी पता था की लड़का नहीं मानेगा

लड़का जवाब से उससे पहले बाबा ने पूछा “मैं जानना चाहता हूँ, की इस सब सी तुम्हे क्या मिलेगा?”

अभी तक वो ज्ञान के पीछे दृढ़ता से चुपचाप खड़े थे. कोई भाव नहीं. और इस प्रश्न को भी उन्होंने उसी भीष्म दृढ़ता से पुछा जिसके लिए वो प्रसिद्ध थे, “क्या तुम समझते हो की यह सब हमारे लिए कितना अजीब है? तुम २५-३० साल बाद अचानक से आते हो और आकर सिर्फ यह मांग की कुंती के साथ १० दिन बिताना चाहते हो? अकेले”

“इनसे मिलने के लिए मुझे इनको ढूंढ़ने मे समय लग गया. अगर पहले आ पता तो पहले ही आता”

“और अगर कुंती मना करे तो?” बाबा ने पूछा

“मुझे नहीं पता. मैंने अभी इसके बारे में सोचा नहीं” लड़के ने धीमी लेकिन मजबूत आवाज में कहा

“हमने एक अनुंबध, एक समझौता तैयार किया है, अगर तुम्हे १० दिन मिलते हैं तो भविष्य में ऐसी कोई मांग तुम दोबारा नहीं करोगे. तुम्हे यह रिश्ता छोड़ना होगा” ज्ञान ने समझौते का दस्तावेज आगे बढ़ाते हुए कहा; “यह आसान तरीका है सुनिश्चित करने का की तुम इसके बाद कोई और मांग नहीं करोगे”

लड़के को कुछ अटपटा सा लगा, रिश्ता छोड़ देना क्या होता है? उसने फट से कलम उठाई स्वकृति हस्ताक्षर करने के लिए. लेकिन उस जैसी कलम भी उसने कहाँ देखी थी. किस ओर से और कैसे खुलेगी इसमें उसको २-३ बार कलम को उलटना पड़ा. हस्ताक्षर के बाद लड़के ने पूछा “और कुछ?”

“तुमने पढ़ा भी नहीं. खैर वो तुम्हारी मर्जी. लेकिन एक बात याद रखो, कुंती को हमसे दिन में एक बार बात करने की इज़ाज़त होगी.” बाबा ने कहा

“वो चाहे तो एक से ज्यादा बार भी बात कर सकती हैं. लेकिन आप नहीं कर पाएंगे. मेरे घर पर फ़ोन नहीं. लेकिन २-३ किलोमीटर पर एक पब्लिक बूथ है; वहां तक इनको जाना होगा – पैदल””

 

आठ

पहला दिन

सुबह के निकले शाम तक दोनों सफर करते रहे. कुछ बात नहीं हुई. शुरुवात में कुंती गाडी में पीछे बैठी फिर कहीं बीच सफर आगे भी आयी लेकिन बात का कोई सिलसिला नहीं बना. लड़का चुपचाप गाडी चलाता रहा और बीच बीच में सिग्रेटे पीता रहा. देर शाम उसने एक घर के पास गाडी रोकी और घर का ताला खोलकर अंदर चला गया. कुछ देर बाद बत्ती जली. दो मंजिला घर के बाहर एक छोटा सा बगीचा और बगीचे की सीमा के साथ साथ कांटेदार जाली. इस सीमा के बाहर दूर तक कुछ नहीं, झाड़ – झाड़ियां और एक पगडण्डी. कुंती ने कार का दरवाजा बंद किया और घर में दाखिल हुई.

“कोई रहता है यहाँ?”

“हाँ, मैं. सब बेतरतीब है इसलिए पूछ रही हैं?” लड़के ने पूछा

“नहीं, यह मतलब नहीं था मेरा”

लड़के ने फिर कोई उत्तर नहीं दिया. उनको इशारे से उनका कमरा दिखाया और खुद ऊपर की मंजिल पर अपने कमरे की और चला गया. घंटे भर बाद जब कपडे बदलकर वो कमरे से निकलीं तो लड़का रसोई में था. लड़के ने देखकर पूछा, “आखरी बार खाना कब बनाया था आपने? आता है आपको?”

“दोनों मिलकर बनाते हैं” उन्होंने उत्तर दिया, “अगर तुम चाहो तो?” उनको लगा लड़के का असली सवाल यही है

“नहीं. अभी के लिए अगर हम अपने अपने काम बाँट लें तो बेहतर होगा” लड़के ने अपना काम जारी रखा

“ठीक है” कुंती को यही ठीक लगा, वो अभी कुछ बैचैन सी और कुछ संकोच में थी, शायद शर्मिंदगी उन्हें व्याकुल कर रही थी. चिंतित कुंती नहीं जान पा रही थीं की उनका क्या व्यवहार होना चाहिए.

” कुछ पीने को है?”

“मैं नहीं पीता. मैंने खुद को मना किया हुआ है.” लड़के ने गैस जलाते हुए कहा

“नहीं! मेरा मतलब है कुछ भी हो पीने को.  सफर लम्बा था. कभी कभी पानी से प्यास नहीं बुझती न” कुंती ने बोल तो दिया लेकिन उसको खुद ही अपनी बात अटपटी लगी

“आप एक काम कीजिये, एक बार फ्रिज में देख लीजिये. और चिमनी में कुछ लकड़ी जला लीजिये, ठण्ड काफी है आज, लकड़ी बाहर है. कमरा थोड़ा गरम हो जायेगा”

कुंती बाहर निकली और सबसे पहले उसने अपने फ़ोन पर सिग्नल तलाशे. सिग्नल नहीं थे. लकड़ी लेकर वो जब वापस दाखिल हुईं तो लड़का सब्जी काट रहा था;

“सिग्नल नहीं आएंगे यहाँ. लेकिन लैंडलाइन है वहां. वो चलता है. आप जब चाहें फ़ोन कर सकती हैं”

बात सुनी, और चिमनी जलने के लिए बढ़ गई. लैंडलाइन होने से उसको थोड़ी तस्सली हुई

“आप चाहें तो बाबा को फ़ोन कर सकती हैं. उन्हें अच्छा लगेगा जानकार की आप ठीक हैं. ठीक रहेगा की उनको यकीन आ जाये की मेरा इरादा आपको मारने का नहीं है”

कुंती चुप रही. और लड़का खाना बनाने में व्यस्त हो गया

“आप इतनी प्रसिद्ध कैसे हो गयीं?” लड़के ने जिज्ञासा वश पूछा. “शादी के समय तो शायद आपको शहर में कोई जानता भी नहीं था?”

“हो सकता है इसलिए की मुझे वैसा       परिवेश मिला, जिस परिवार में शादी के बाद पहुंची उसको तो शहर जानता है” कुंती को समझ नहीं आया की यह कैसा अटपटा सवाल है.

“हम्म! और आपको लगा होगा की इतना समय निकल गया है. अब कहाँ …”

“लकड़ी गीली है” कुंती चिमनी से जूझ रही थी, उसने लड़के के प्रश्न के उत्तर में पूछा, “समय निकल गया…क्या?”

“की इतने समय बाद मैं कहाँ याद रख पाऊंगा आपको?” लड़के ने अपना वाक्य पूरा किया

उसके बाद दोनों में बहुत देर तक कुछ बात नहीं हुई. लड़के ने खाना परोसा, दोनों ने खाया. लड़का लगातार सिग्रेटे पीता रहा. कुंती चुपचाप खाना खाती रही.

“आप अपने पति से कैसे मिलीं?” लड़के ने खाने की टेबल पर चुप्पी तोड़ते हुए पुछा

“तुम्हारे बाद, छोड़ने के बाद, मैंने कुछ दिन एक स्कूल में पढ़ाया. वहीँ उनसे मुलाकात हुई थी”

“तो वो अध्यापक थे आपकी तरह?”

“हाँ”

“लेकिन अमीर भी और वो भी खानदानी अमीर?” लड़के ने कहा

“हाँ, उनका परिवार था”

“तो उन्होंने आपको चुना? जैसे अमीर जवान लड़के करते हैं”उसकी बात मे कुंती को धिक्कार की तौंस महसूस हुई.

“नहीं” कुंती ने मजबूत होकर जवाब दिया. “हम दोनों ने एक दुसरे को चुना” ऐसे बोली जैसे सफाई दे रही हो

“और आपके बेटे?”

“पढ़ते हैं. बाहर”

“बाहर क्यों?”

“उन्होंने अपना स्कूल खुद चुना था” कुंती ने जवाब दिया. कुंती को अपने सभी बच्चों पर बड़ा गर्व था. बच्चों के विषय में बात शुरू होते ही वह स्वतःस्फूर्त हो स्वयं ही रूचि दिखाया करती थी. लेकिन लड़के के सामने आज वह हिचकिचा रही थी

उसपर लड़के ने कह दिया ” उन्होंने अपना स्कूल खुद चुना और देश कौन सा हो वो आपने?”

कुंती कुछ नहीं बोली. उन्हें इतने अपमान की आशा थी

“और तुम?” कुंती ने कुछ ठहर के प्रश् किया

“मैं कभी अपनी डिग्री पूरी नहीं कर पाया. किसी भी क्षेत्र में विशेषज्ञ नहीं. कुछ घटिया नौकरियां की कुछ महिलाओं के साथ औसत सम्बन्ध रह; लेकिन कुछ ऐसा नहीं जिसपर आपको गर्व हो ” लड़का मुश्किल से बोल पाया और फिर सिग्रेटे का कश खींचकर जैसे खुद को सँभालते हुए उसने कहा, “आपको शर्मिंदा करने के इरादे से नहीं बोला. सिर्फ इतना की मैं चाहता तो हूँ की मेरे पास भी गर्व करने लायक कुछ हो लेकिन कुछ हैं नहीं “और मुस्कुराने लगा जैसे अपनी लज्जा अपने संशय अपने संकोच को छुपा लेगा.

“हर जीवन की उपलब्धियां इतनी सीधी नहीं होती की उनको गिनाया जा सकता हो. कुछ जीवन मात्र जी पाना भी उपलभ्धि होती है” कुंती ने कहा

“बेहतरीन जवाब, जैसी आशा थी” कहकर लड़के ने कुंती के मरहम की खिल्ली उड़ा दी,” यकीन मानो मैंने क्षण भर को आपके इस तर्क को मान भी लिया था. देखो कैसे सीना गर्व से फूल गया है मेरा” कहते हुए वो फिर हंसने लगा.

कुंती ने कुछ चिढ़कर अपना रोष प्रकट किया, ” तो क्या यह सब ही चलेगा अगले १० दिन.  क्या ऐसे ही चलेगा अगले १० दिन?”

“चिंता मत कीजिये, आज के लिए बस यह बर्तन धोने भर से चल जायेगा” कहकर लड़का हँसता हुआ वहां से उठकर चल दिया

कुंती अपना गुबार लिए बर्तन समेटने लगी; उनके पास लड़के की बदमिजाजी का कोई उत्तर नहीं था.  अनबनऔर बढ़े यह किसी के लिए ठीक नहीं सोचकर वो अपनी नाराजगी भी जाहिर नहीं कर पायीं.

दूसरा दिन

कुंती ने सुबह की चाय बनाकर घर के बगीचे मे एक कुर्सी डाल ली. लड़के को तलाशने मे एक नज़र दौड़ाई लेकिन फिर छोड़ दिया.

हर सुबह वो टहलने निकल जाया करता था. उगते सूरज को देखना उसे बहुत अच्छा लगता था. घर के पीछे एक पहाड़ और उसके पीछे बहती गंगा. सुबह टहलते हुए भी उसकी सिग्रेटे नहीं छूटती थी. जैसे खुद को जला डालने पर आमादा हो. आज गंगा किनारे एक जख्मी मराल दिखा. प्राण उखड नहीं रहे थे, छटपटाता, क्षणिक आवेश में अपने शरीर को ऐंठ लेता और फिर ढीला छोड़ देता – दर्द असहनीय था. लड़का चुपचाप खड़ा उस मराल को जूझते देखता रहा, फिर अपनी जांघों पर रखकर अपने हाथ से उसे सहलाता रहा; और अंततः उसकी गर्दन मरोर दी.

“पीड़ा से मुक्ति का कभी-कभी मृत्यु ही एक मात्र विकल्प होता है.” मराल को मिटटी मे दबाते हुए उसने स्वयं को अपने इस कृत्य के लिए मानो माफ़ किया. अंदर एक प्रश्न ने भी जन्म लिया, मानसिक पीड़ा से मुक्ति का भी क्या यही एकमात्र विकल्प होगा? और वापस लौटते हुए बार बार उसने इसी सवाल पर एक सवाल और रक्खा, और यदि एकमात्र विकल्प मृत्यु ही है तो फिर यह सब प्रपंच क्यों? क्यों न उन्हें लौट जाने को कहूं

कुंती ने चाय पीकर कुछ देर लड़के का इंतज़ार किया फिर वो भी टहलने निकल गयी. पगडण्डी से होतीं हुई सड़क की तरफ बढ़ गयीं, जहाँ से पिछली शाम लड़का गाडी में उसे लाया था. रास्ते में एक गाओंवाले ने उसे रोका; “आप यहीं से हैं क्या?”

कुंती ने मुड़कर देखा, “अगर आप यहाँ के रास्तों से वाकिफ नहीं तो ध्यान रहे – यह सुरक्षित नहीं”

“नहीं बहुत समय बाद आयी हूँ यहाँ” कुंती ने कहा

“फिर आगे मत जाइए” राहगीर ने कहा, “आगे का जंगल सुरक्षित नहीं”

“यह पगडण्डी सड़क तक नहीं जाती क्या?”

“नहीं. वो रास्ता पीछे की और है”

कुंती वापस मुड़ गयी. बगीचेके पास पहुंची तो देखा लड़का आँगन में लगे नल के नीचे अपने बाल धो रहा था. मराल को दफ़नाने में उसके कपड़ों और बालों में मिटटी मानो भर गयी थी उसने आवाज लगायी  “आपकी मदद चाहिए”

“ठीक को तुम?” कुंती उसकी तरफ थोड़े तेज क़दमों से बढ़ी

“हाँ. एक मराल कराह रहा था नदी किनारे. शायद उसकी मुक्ति का प्रबंध मेरे हाथों था. मैंने भी आनाकानी नहीं की. उसको दफ़नाने में यह सब गन्दा हो गया”

कुंती को उसके शब्दों के चुनाव पर आश्चर्य हुआ. इतना कठोर ह्रदय! वो ठिठक गयी, “मराल को तुमने अपने हाथों से मार डाला?” लड़के ने नल के नीचे से अपना सर हटाकर ऊपर उठाया और एक नज़र कुंती को देखा, “और क्या करता? आप मदद करेंगी जरा बाल धोने में?”

“जरा कपडे बदल कर आती हूँ”

“चिंता मत कीजिये. अगर भीग भी गयीं तो सूख जाएँगी. आज मौसम खिला खिला है. भगवान् सूर्य आज सारा दिन आस पास ही रहने वाले हैं” लड़के ने नल में पाइप जोड़ा और दूसरा सिरा  कुंती की तरफ बढ़ाया

कुंती ने पाइप पकड़ा, लड़का कुर्सी पर बैठ गया और अपना सर पीछे की ओर लटकाया, “थोड़ा पानी डालिये.” लड़के ने बोलना जारी रक्खा, “उस मराल को क्या कभी आशा होगी की उसकी कराह से कोई मन उद्वेलित होगा? कोई आएगा उसकी मदद को? कोई उसको इस पीड़ा से मुक्त करेगा?”

कुंती ने उसके माथे के कोने पर अपने हाथ को खड़ा करके रक्खा, हिचकिचाते हुए; पूरा हाथ रखने की हिम्मत नहीं हुई और पाइप से पानी डाला. लड़के ने सहसा अपनी आँख खोली और दोनों की आँखे टकरायीं. लड़के की आँखों में प्रश्न था “क्यों? क्या में पुत्र नहीं?” और कुंती की आँखों में प्रश्न था, “क्या मुझे अधिकार है.इतने वर्षों के बाद भी?”

लड़के ने झटके से अपने बालों में हाथ फेरा और ऐसा करने से पीछे खड़ी कुंती की सफ़ेद साड़ी पर मिट्टी के दाग पड़ गए

“ध्यान से” कुंती हल्का सा पीछे हटी, “मैंने कहा था मैं कपडे बदलकर आती हूँ”

लड़का रुका नहीं. अपने सर से पानी निरंतर झटकता रहा. कुंती फिर बोली “ध्यान से”

“बस भी कीजिये, यह कोई बड़ी बात नहीं. ऐसा तो नहीं की आपकी साडी पर कोई छींट नहीं” लड़के ने कटाक्ष किया, “इतना ही तो हुआ है की अब वो दाग साफ़ साफ़ दिखने लगे हैं”

कुंती ने पीछे से आवाज दी, “क्या ऐसे ही चलेगा अगले १० दिन?”

“क्या?” लड़के ने मुड़कर पूछा

“यही छोटे छोटे खेल, देखने के लिए की मैं सह सकती हूँ या नहीं?”

“आपकी साडी से अगर दाग नहीं गए, तो इस नुकसान  के पैसे मैँ भर दूंगा

“मतलब?”

“महंगी होगी. नहीं? आपकी साडी.कितने की है?”

“मुझे अंदाज़ा नहीं”

“आपको होना चाहिए.कौन कितना और क्या है इसको ध्यान रखकर आपने यहाँ तक का सफर तय किया है; निश्चित ही आपको पता होना चाहिए” कुंती को यह गाली जैसा लगा; आरोप सहना आता है उनको; लड़का उन्हें दोष दे वो सहन कर सकती हैं लेकिन धिक्कारे? उनहोंने अपनी ठोड़ी पर हाथ फेरा. यह उनकी आदत थी; विचलित स्तिथि में यह उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती थी

“आपको कोई सस्ती चीज लेकर दे यह कैसे हो सकता है?”

कुंती और नहीं सह पायी. चुपचाप वहां से चली गयीं

तीसरा दिन

“मैं नीचे सड़क तक जा रही हूँ, कुछ सामान चाहिए मुझे. तुम्हे कुछ चाहिए?” कुंती ने सुबह पुछा

लड़का बागीचे में बैठा था. उसने कोई जवाब नहीं दिया. ऐसे जैसे उसने सुना ही न हो. कुंती क्षण भर इंतज़ार करती रही फिर निकल गयी.

उसने फिर फ़ोन के सिग्नल चेक किये. बाबा को फ़ोन मिलाया. लड़के का जिक्र आते ही बाबा ने पूछा “कुछ समझ में आया? क्या चाहता है वो?”

“वो घर पर ज्यादा समय नहीं रहता. सुबह ही कहीं बहार निकल जाता है, कभी दोपहर में लौटा तो लौटा वर्ना नहीं भी लौटता. काफी खाली समय रहता है मेरे पास” कुंती बोली, “कल सुबह नदी किनारे एक मराल को जख्मी पाया तो उसको मार डाला. लौटकर बोला दर्द से कराह रहा था, कोशिश करने पर भी नहीं बचता इसलिए मैंने उसे मार डाला. कभी कभी अजीब सा हो जाता है.कभी कभी जानबूझकर कुछ बहुत चुभ जाए ऐसी बात कर देता है”

बाबा चुपचाप सुनते रहे. कुंती ने थोड़ा रूककर धीरे से कहा, “बाबा! मैं जानती हूँ की आप मुझे कभी क्षमा नहीं करेंगे इस सब के लिए”

“मैं तुम्हे बहुत पहले क्षमा कर चुका कुंती.” दूसरी तरफ से आवाज आयी. “बहुत बहुत समय पहले”

कुंती अपने दाएं अंगूठे से अपनी तर्जिनी मे पड़े मूंगे को सहला रही थी; स्वतः ही उसमे तेजी आ गयी. जाने कहाँ से हिम्मत लायी पूछने की “कबसे पता है आपको बाबा?”

“सालों से. लेकिन मुझे कभी समझ नहीं आया की इस सन्दर्भ में अगर कुछ बात भी करूँ तो कैसे और क्या. इसलिए चुप रहना ही सही जाना”

कुंती ने फ़ोन काट दिया. चुपचाप धीमे क़दमों से वो वापस घर की ओर बढ़ चली. करण घर पर नहीं था. उसके कमरे मे जब वो घबराहट के साथ दाखिल हुई; तो उसके दिमाग मे एक आतंक पैदा हो रहा था, बैचेन कुंती को लगा कहीं करण के कमरे में दाखिल होकर वो एक और संकट को न्योता तो नहीं दे रही. ये डर उसे खींचकर बाहर ले आना चाहता था और उसकी जिज्ञासा उसे रुकने को बाध्य कर रही थी. कुंती ने करन के टेबल पर पड़ी डायरी की ढेरी में से एक उठाई;

“दिनांक २५ सितम्बर शाम ९ बजे

मानवी रूप में विकट सांपनी, अनैतिक, बेशरम, गन्दी, कुटिल – ऐसी भी किसी की माँ होती है करन? और यह जो मैँ ताड़ना देता हूँ उसको, जो शब्दों की चाबुक से रोज पीटता हूँ उसको, बार बार यूं कसकर कोड़े मारता हूँ; क्या कभी उसका अंतर्मन यूं ही धिक्कारता होगा उसको? ह्रदय के तल में कहीं तो जलन उठती होगी उसको? गली की कुतिया को देखा है करन, कैसे अपने नवजात पिल्लों की सुरक्षा हेतु आजकल आक्रामक हुई घूमती है – क्या मेरी माँ कुतिया सी भी नहीं? कैसे किया होगा अपने पुत्र का परित्याग. यूँ एक नवजात को, निःसहाय को छोड़कर चले जाना ऐसा तो पशु भी नहीं करता”

कुंती ने डायरी पटक दी. उसके नथुने फूल उठे.

“आपको वो नहीं पढ़नी चाहिए” करन कब पीछे आया कुंती को पता नहीं चला

“मुझे लगा तुम बाहर हो” कुंती हड़बड़ा गयी

“सामान मिला?”

“क्या?”

“आप सामान लेने गयी थीं न … मिला जो चाहिए था आपको?” करन ने पुछा

“हाँ”

“ठीक है. कुछ और चाहिए हो तो बता देना. मैँ ले आऊँगा आपके लिए. मैं बाहर जा रहा हूँ. शायद रात देर से लौटूंगा. खाना आपको स्वयं बनाना पड़ेगा”

“कहाँ चले. अभी तो लौटे हो?” कुंती धीमे क़दमों से उसकी तरफ बढ़ी. जैसे रोक लेगी उसको; लेकिन हिचकिचाहट थी उसमे.

“मेरा इंतज़ार मत कीजियेगा” कहते अपनी जैकेट उठाकर करन बाहर निकल गया.

वो क्षण भर भी और रुकता तो कुंती उसे गले से लगा लेती. करन कुंती को ऐसा कोई मौका ही नहीं देना चाहता था, वो तेजी से बहार निकल गया.

बाहर गाडी में बैठकर इंजन स्टार्ट किया लेकिन गाडी आगे बढ़ाई नहीं. एक्सेलरेटर पर पाओं दबाता रहा. खुद से ही कुछ बोला. फिर गाडी का हॉर्न बजाया. ठहरे रहा. कुंती ने ऊपर वाली मंजिल की खिड़की से बाहर झाँका. करन ने गाडी में सर झुकार ऊपर खिड़की की तरफ देखा और फिर हॉर्न बजाया. कुंती फटाफट अपना स्वेटर उठाकर घर से बाहर निकली और तीज क़दमों से चलती गाडी में आकर बैठ गयी. करन ने गाडी चला दी

 

 

 

 

“आपको पता है पापा को मैंने दफना दिया” करन ने गाडी आगे बढ़ाते ही कहा

किंकर्तव्यविमूढ़ कुंती ने उसकी तरफ देखा। उसको समझ ही नहीं आया की वो क्या कहे। करन कुंती की इस हालत पर धीमे से मुस्कुराया। कुंती को विचलित देखकर उसको अच्छा लगा। व्यग्र कुंती प्रतीक्षा में थी की करन कुछ कहेगा

“बिलकुल जहाँ आपको दफनाया था, ठीक उसकी बगल में. यही कोई ४-५ साल पहले. आपको पता है, मेरा एक ईसाई दोस्त है, उसके माँ बाप ४-५ साल पहले चल बसे. पहले माँ और फिर ६-८ महीने बाद पिता. उसने उनको दफनाया. हर हफ्ते वहां जाता है. लगभग हर हफ्ते मैं साथ जाता था उसके. पहले तो यूँ ही सिर्फ साथ भर के लिए चला जाता था. फिर एक दिन मुझे लगा की अगर मैं भी अपने माँ बाप को दफना दूँ तो कितना आसान हो जायेगा. हफ्ते में एक बार आया करूँगा, उनसे जो शिकवा है वो हफ्ते दर हफ्ते सांझा करता रहूंगा. इस रोज-रोज, इस हर समय के चक्कर से तो छूटूँगा. लगा आप दोनों को दफनाकर शायद आगे बढ़ सकूं. कभी-कभी किसी को याद करना; हररोज से तो आसान ही होगा. इसलिए मैंने पापा को दफना दिया.

कुंती स्तब्ध सुन रही थी; “आप चलोगी वहां?” उसने पूछा

“कहाँ?”

“जहाँ पापा और आपको दफनाया है मैंने। शीत के समाप्त होते ही वहाँ सूरजमुखी खिलेंगे। मैं हर साल इस समय वहां सूरजमुखी के कंद बो आता हूँ। बसंत के आते ही आप दोनों की कब्र पर सूरजमुखी खिलने लगते हैं। और सुबह से शाम तक जहाँ जहाँ सूर्य चलता है वहां वहां भागते रहते हैं। जैसे चाहते हों की उनपर भी सूर्य का प्रकाश पड़े; उन्हें भी कोई तो मान्य करे ”

“तुम क्या चाहते हो करन?” कुंती का दिल बैठा जा रहा था; उसके लिए अब यह दंश असहनीय होते जा रहे थे.

“अभी तो कुछ नहीं। अभी तो दिन बाकी हैं। मैं स्वयं भी ढूंढ रहा हूँ की मुझे आपसे आखिर चाहिए क्या । आप मिली हैं कभी उनसे”

“नहीं”

“क्यों? आप मिलना चाहेंगी उनसे?”

“नहीं”

“क्यों? अगर मैं पैदा नहीं होता तो आप मिलती उनसे? मुझे लगता है अगर मैं नहीं होता तो आप मिलतीं। लोग अपने पुराने मित्रों से मिलते हैं। आप भी मिलतीं।लेकिन मेरे होने में शर्मिंदगी है – शायद इसलिए न मिलना ही भला?”

कुंती चुप रहीं, पराजय जनित उद्वेग मे सिर्फ अपने मूंगे को कसकर रगड़ भर पायीं जैसे कह रहीं हूँ यह सहने की शक्ति दो ईश्वर

“हम कहाँ जा रहे हैं?” कुंती ने बात बदलनी चाही

“यहाँ नीचे गांव में एक शादी है; आपका मन बहल जायेगा. प्रेम विवाह है – अविवेकी जिज्ञासा जनित प्रेम और प्रेम विवाह. पहचाना पहचाना सा लगता है न?” करन के कटाक्ष तीखे होते जाते थे

कुंती चुप हो गयी. आंखें मूँद लीं. कुछ देर बाद करन ने गाडी रोकी. दोनों चलने लगे.

 

वापस कहानी की शुरुवात से: तीसरा दिन

“आपने उत्तर नहीं दिया; आप खुश हैं?”

फिर वही, कहीं से भी बात शुरू करो यहीं पहुँचती है; इस बार उसने उत्तर देना सही समझा, “बाबा को पता था; कई सालों से. मेरे पति को भी. शुरू से”

“और आपको आज पता लगा की उन्हें पता था?”

उसने धीमे से स्वीकृति में गर्दन हिलायी, एक मार्मिक उदास मुस्कराहट उसके चेहरे पर तैरी. करन आगे चल पड़ा, और पीछे पीछे माँ. अभी कुछ ही सीढ़ियां चढ़े होंगे की करन ने पीछे मुड़कर कहा

“आपको एक प्रश्न पूछने की छूट देता हूँ. कोई प्रश्न जो आपको पूछना हो? आपको वचन देता हूँ बिना किसी उपालम्भ बिना किसी शिकायत उतर दूंगा”

और माँ ने बिना एक भी क्षण खोये धीमे से पुछा, “और कोई भी जानता है?”

“क्या?” करन बोला

“इन १० दिनों के बारे में?”

“कौन? जैसे की कौन?” करन के प्रश्न मे रोष था

“मुझे नहीं पता….” करन के चेहरे के भाव बदल गए. माँ ने उसका हाथ पकड़कर रोकना चाहा लेकिन करन आगे बढ़ गया

इस घटना के बाद पूरी रात करन पर एक अजीब विद्रोह तारी रहा. अपनी प्रकृति के विपरीत वो किसी अलमस्त हाथी सा पल में उदास, दूसरे पल गुस्सा और घडी भर में अति उत्साही सा हो उठता. उसने शादी में कब पीनी शुरू की यह कुंती को पता ही नहीं चला. कुंती को शुरुवात में करन की इस भावनात्मक अस्थिरता ने कुछ आशा बँधायी की शायद करन बोले वो उसे १० दिन के लिए अपने साथ क्यों लाया है, लेकिन जल्द ही वो समझ गयी की स्थिति काबू से बाहर है.

“मैं तुम्हे तुम्हारी और तुम्हारे प्रेमी की कब्र पर खिले सूरजमुखी भेंट करूंगा। क्या तुम उन फूलों को अपनी आलिशान बैठक की शोभा बनाओगी? बोलो बना पयोगी?” करन कुंती के पास आया और बक बक करके फिर चला गया, कुंती चुपचाप उसकी हरकतें देखती रही. कुंती डर रही थी, यह सोचकर, की अगर करन शांत रूप मे इतनी कड़वाहट से भरा था तो नशे मे वो क्या करेगा. अंतर्मुखी करन के बहिर्मुखी हो जाने की स्थिति में वो क्या करेगी इसका उसके पास कोई उत्तर नहीं था

चौथा दिन

देर रात कुंती को गाडी चलानी पड़ी. उसने करन से पूछा भी था, “तुमने तो कहा था तुम पीते नहीं; फिर?”

“बकवास. कौन हो तुम?” कुंती के कन्धों से अपना हाथ हटाते ही वो धरती पर गिर पड़ा था. कुंती ने जैसे तैसे उसे गाडी में डाला और घर तक ले आयी. रास्ते में करन सो गया था. कोई बात नहीं हुई.

सुबह कुंती जल्दी उठ गयी. बीते दिन नीचे बाज़ार से वो सूरजमुखी के बीज खरीद लायी थी. शीत की ठण्ड कम होने लगी थी और यह सही मौसम था सूरजमुखी बीजने का. कुंती घर के पीछे के बगीचे में उन्ही बीजों को बो रही थी की करन ने पूछा, “सूरजमुखी यूँ ही नहीं उग जाता। आपके जाने के बाद इसको पानी कौन देगा? या आप चाहती हैं यह भी न खिल पाए?” करन की आखें लाल – सुर्ख लाल थी, आवाज भारी। उसके इतनी जल्दी उठ जाने की कुंती को आशा नहीं थी।

कुंती पीछे मुड़ी, “सूरजमुखी हैं, इन्हे पानी की ज्यादा जरूरत नहीं होती। इक बार अंकुरित हो जाने भर की देर है, उसके बाद इनकी जिजीविषा इनको जीवित रखती है। और अभी तो मैं हूँ यहाँ कुछ दिन.

करन कुंती को देखता रहा, अर्थपूर्ण संवाद के लिए कितनी ही बार भाषा की जरूरत नहीं होती. मुड़ते हुए वो खुद से बोलता हुआ चला, “इक बार अंकुरित हो जाने भर की देर है, उसके बाद इनकी जिजीविषा इनको जीवित रखती है” फिर मुड़कर बोला, “आप वापस चली जाएँ। अभी”

कुंती ने खुरपी चलाना रोका, “कहाँ? कहाँ चली जाऊं?”

“अपनी दुनिया में. मुझे नहीं लगता आपकी यहाँ जरूरत है; मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए”

“तो बस यही योजना थी?”

“नहीं, कोई योजना नहीं थी” और तेज चलने लगा. कुंती उसके पीछे तेज क़दमों से बढ़ी, “तो फिर तुम मुझे यहाँ क्यों लाये?”

“मै गलत था, मुझे माफ़ कीजिये”

“मै पिछले ३ दिनों से यहाँ हूँ, और मुझे नहीं पता की में यहाँ क्यों हूँ” कुंती ने एक खीज के साथ उसकी कमीज खींचकर उसे रोक लिया

करन मुड़ा, “मुझे नहीं पता की मुझे क्या कहना है; लेकिन आपने ठीक कहा सूरजमुखी बिना देखभाल अनुकूल मौसम के साथ खिल जाता है और मौसम के प्रतिकूल होने पर मुरझा जाता है. शायद मै यह भूल गया था. मुझे देखकर क्या लगता है आपको? मैं खिला दीखता हूँ आपको या मुरझाया हुआ”

“मुझे कहो की तुम चाहते क्या हो?” कुंती बोली, “या की बस तुम यही चाहते थे मुझे इस तरह…..तुम मुझे माफ़ नहीं करोगे, कभी भी नहीं – यह ही बताना चाहते हो?”

“नहीं, शायद मुझे आपके प्रति कोई असंतोष नहीं; मैं आपको माफ़ कर सकूँ इससे पहले मैं आपको दफना आया।माफ़ कर दूँ? कर चूका हूँ शायद। लेकिन क्या आपको महसूस होता है वैसे जैसा मुझे महसूस होता है? आप सूरजमुखी में करन और करन को सूरजमुखी होते देख पाती हैं? साडी पर लगे दाग को व्यक्तित्व पर लगे दाग जैसा देख पाती हैं? आपको होता है वैसा मानसिक कष्ट जैसा मुझे होता है जब मैं कुतिया को अपने पिल्लों को दुलारते देखता हूँ?”

फिर खुद को समेटकर करन ने कहा “मै चाहता हूँ आप यहाँ से चली जाएँ” करन ने आँख में आँख डालकर कहा और वहां से चला गया

दोपहर तक कुंती करन के लौटने का इंतज़ार करती रही. उसने एक बार फिर उसके कमरे में जाने का सहस जुटाया, उसकी डायरी उठाई और एक पन्ना खोला,

“दिनांक ११ नवंबर २० दोपहर १२ बजे

आज मंदिर में उस कथावाचक ने एक बड़ी आश्चर्यचकित कर देने वाली कहानी सुनाई. कहते हैं गंगा ने अपने ७ पुत्रों को पैदा होते ही स्वयं अपने हाथों से पानी में डुबाकर मार दिया था. और अपने आठवें पुत्र को भी वो यूँ ही डुबाकर मार डालती लेकिन उसके पति शान्तानु ने उसे टोक दिया. भीष्म बच गए.

चाहे वो कथावाचक कोई भी कारण देता रहे मै जानता हूँ चिरयुवति गंगा को अपने यौवन का अभिमान रहा होगा, वह मुग्धा, मोहिनी अपने ही यौवन पर मोहित नहीं समझ पायी होगी माँ होने का सुख. जानते हो करन संभ्रांत, अभिजात वर्ग की युवतियां ऐसी ही होती हैं. विश्वामित्र की पत्नी मेनका ने भी अपनी संतान को यूँ ही घाट पर छोड़ दिया था, हिंसक पशुओं का भोजन हो जाने को. मै अकेला नहीं जिसकी माँ ने नवजात शिशु को निर्दयता से छोड़ दिया हो. और मेरी माँ भी अकेली नहीं जो ऐसे कुकृत्य के बाद भी पूजी जाती हों. समाज शक्तिशाली की रखैल है करन.

कथावाचक कहता था, भीष्म जीवन भर जब भी संशय में हुआ अपनी माँ – गंगा के पास मार्गदर्शन को जाता रहा. सुनने में कितना असामान्य, कितना विचित्र लगता है; जिसने तुम्हारा तिरिस्कार किया तुम उसी के पास लौटे लेकिन क्या मुझे भी एक बार कोशिश करनी चाहिए करन? क्या मै भी जाऊं, मिलूं उससे जो मुझे छोड़कर चली गयी थी? क्यों पालूँ इतना वैमनस्य, इतना असंतोष उसके प्रति जिससे मिला नहीं कभी? कथावाचक कहता था, भीष्म के उसकी माँ गंगा के साथ, मत्स्यगंधी शकुंतला के उसकी माँ मेनका के साथ सम्बन्ध अच्छे रहे। कैसे करन? हो सकता है बच्चों ने ही कोशिश की हो। क्या मुझे एक बार मिलना चाहिए?”

कुंती को सम्भावना की पहली किरण दिखाई दी। डायरी रखकर वो दूसरी मंजिल से नीचे उतरी। करन कब लौटा और उसने कब दोपहर का खाना बनाना शुरू कर दिया उसको पता नहीं चला था। वो चुपचाप चिमनी के पास पड़े एक मुड़े पर बैठ गयी। कुंती को सर झुकाये बैठे देखकर करन ने कहा, “आप कल सुबह वापस चली जाएँ तो अच्छा रहेगा। मेरी डायरी से आपको सिर्फ इतना ही पता चलेगा की मेरा मन आपके बारे में हर दूसरे दिन पलट जाता है। आपके सामने आते ही आपसे जुड़ जाने की इच्छा दम तोड़ देती है। इतना तो मै ४ दिनों में समझ ही गया हूँ। कल शाम की ही बात ले लो। आपको मौका दिया  मुझसे एक प्रश्न पूछने का। और कहा भी की आप जो भी पूछेंगी मै जरूर उत्तर दूंगा. और आपने क्या पूछा।”

करन ने मुड़कर कुंती की तरफ देखकर उसका बीती शाम का प्रश् दोहराया, “और किसको पता है?” क्षण भर रूककर बोला, “धिक्कार है; अपने जीवन के आगे भी देख पाती हैं कभी आप?”

कुंती को सुनने की इच्छा थी। लेकिन करन से आँख मिला पाना संभव नहीं था. उसने आँखे नीची कर लीं

“डायरी के किसी पन्ने पर यह प्रश्न भी मिलेगा की आपको कभी आत्महत्या की चाह हुई होगी? कभी तो स्वप्न में मै आकर खड़ा हुआ हूँगा; बेजान, प्राणहीन। कितनी कठिन, क्रूर, निर्मोही होगी आप जो स्वप्न में अपने ही बच्चे को प्राणहीन देखकर भी अगली सुबह अपने हाथों पर आपको रक्त नहीं दिखा होगा।”

कुंती ने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने मूंगे को अपनी ऊँगली में अंगूठे के दबाव से धंसा दिया।

“आप ही कहो; अब किसको नहीं पता? आप स्वयं ही तो कह रही थीं कल गाडी में की बाबा को पता है, आपके पति को पता है। मुझे लगा अब जब सबको पता ही है तो आप निर्भय हो स्वयं ही कहेंगी; मेरे साथ चलो तुम। ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा की मुझे भी अस्वीकार कर दिया जायेगा। नहीं कर पायी पहले, जब करना चाहिए था, मुझसे अपराध हुआ, देर ही सही पर अब तुम चलो साथ.”

तुमने कल भी प्रश्न किया तो अपने स्वार्थ से प्रेरित; “और किसको पता है? माँ तो नहीं हो सकती तुम। माँ होती तो यह प्रश् नहीं पूछती. तुम कल वापस चली जाओ” करन कहकर कमरे से बाहर चला गया

 

 

 

 

 

 

 

पांचवा दिन

रात भर कुंती असमंजस में रही। सुबह से कुछ पहले उसने उठकर अपने कपडे समेटने भी शुरू किये। कई बार उसको यहाँ से चले जाना ही सबसे उचित लगा। फिर बार-बार उसका मस्तिष्क उसको कहता, चले जाने से क्या होगा। वो फिर लौटा तो वो क्या करेगी? लेकिन यहाँ रूककर भी क्या करेगी? फिर उसने छोड़ दिया। जैसे खुद से कहा हो, जाने न जाने का फैसला वैसे भी उसके हाथ में नहीं। यदि करन चाहेगा तो उसको रुकना ही होगा। ज्ञान का अनुबंध उसे याद आया। फिर खुद से ही कहा, लेकिन करन ने तो अनुबंध पढ़ा भी नहीं था। इस बारे में सोचना बंद करने की कोशिश में जितनी बार वो सर को झटकती थी उतनी बार एक नया विचार, नया प्रश्न अंकुरित हो उठता था.

आखिर बाहर चिड़ियों की चहचआहट और रोशनी उसकी मदद के लिए आयी। रसोई में आकर उसने चाय का पानी रखा, तुलसी के दो पत्ते डाले। करन ने ऊपर से उतरते हुए उसे आवाज़ देकर कहा, “मैं भी पियूँगा। थोड़ा पानी और दाल दीजिये”

उसने बिना कुछ कहे जग से थोड़ा पानी और दाल दिया। चाय दो प्यालों में डालकर कुंती करन के ठीक सामने आकर बैठ गयी। दोनों ने अपनी अपनी प्याली उठाई।

“आपसे कुछ माँगू तो मिलेगा?” करन ने पूछा

कुंती ने सर हिलाकर उत्तर दिया

“मुझे जीवन से कोई आशा नहीं। आपका मुझे छोड़ कर चले जाना मुझे निरंतर कष्ट पहुंचता है। मैंने आपसे १० दिन इस आशा से ही मांगे थे की मैं ही कोशिश करके देखता हूँ। लेकिन अलग अलग छोर पर खड़े हम चाहे जितनी संभावनाएं तलाशें कुछ होगा नहीं। यह तो हम दोनों ही जान चुके हैं?” करन ने प्रश्न के साथ विराम लिया

“सभवतः हाँ। लेकिन अगर तुम कुछ चाहो जिससे तुम्हारा जीवन सरल हो सके तो मैं पीछे नहीं हटूंगी”

“मराल याद है आपको। मुझे मेरी मनोव्यथा, इस कभी न समाप्त होती वेदना से मुक्त करने का भार उठायेंगी आप?” करन ने पूछा

कुंती निशब्द, निस्तब्ध। भीषण कष्ट, अथाह निराशा ने उसे घेर लिया। उसने जीवन में शायद अंतिम बार अपने मूंगे को छुआ, जैसे जीवन भर का सारा बल इस एक क्षण में एकत्र करना चाहती हो। उसने सर उठाकर करन की आँखों में आँखे डालकर देखा और कहा; “तुम यही चाहते हो?”

“हाँ। मेरी मुक्ति का और कोई साधन नहीं। आपके प्रेम और आपके स्वीकार लेने की आशा खो चूका हूँ। मुक्ति का और कोई साधन नहीं मेरे पास। आत्मदाह नहीं कर पाऊंगा, मेरे प्राण मेरा शरीर नहीं छोड़ेंगे। मैं मारल की तरह न जीवित रह पाऊंगा न मर ही पाऊंगा।”

“कब?” कुंती ने पूछा

“आज ही ”

“कैसे?”

करन ने अपनी कोट की जेब से एक छोटी सी शीशी निकलकर कुंती के सामने टेबल पर रख दी।

“अभी तुम्हारे पास ५ दिन बाकी हैँ?” कुंती ने प्रश्न किया

“वो मैं बचा के रखना चाहता हूँ। आपसे जब वहां मिलना होगा तो मुझे आशा है आप माँ बनकर मुझे ह्रदय से लगाने में संकोच नहीं करेंगी”

-समाप्त –

लॉक डाउन राइटर और उसके दोस्त सीरीज – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’


हाँ! लेकिन बात तो हुई


सह-लेखक : अर्चना – उत्सुक पाठक और एक शानदार कवयित्री और निधि मेरी प्यारी पत्नी

मैं सुबह सुबह घर से ऑफिस के लिए निकला. ऑफिस पहुंचा, सारा दिन काम किया

शाम को ऑफिस बैग पकड़कर बहार निकला. सेक्टर १६ के मेट्रो स्टेशन से मेट्रो पकड़ी. ३ दोस्त भी थे साथ. मैं राजिव चौक तक उनके साथ रहा. राजिव चौक पर उतरा, गाडी में नई सवारियां चढ़ी. जो उतरे थे वो तेजी से आगे बढ़ गए.

मुझे तब एहसास हुआ की मैं भूल गया हूँ की मुझे जाना कहाँ है.  जाना तो घर है लेकिन मेरा घर कहाँ है?

मैंने बड़ी हसरत से गाडी की तरफ देखा, अगर गाडी रुक जाती तो जल्दी से दोस्तों से पूछ लेता. मैं भूला इसका मतलब यह थोाड़ा ही है की मेरे दोस्त भी भूल गए होंगे की मेरा घर कहाँ है. लेकिन गाडी निकल गयी.

फ़ोन!.. फ़ोन करता हूँ दोस्त को. यह सोचकर जेब में हाथ डाला. फ़ोन बंद. मुझे याद है बैटरी तो ऑफिस में ही कम थी. घर फ़ोन भी किया था बताने को, बैटरी कम है, परेशां मत होना, सीधा घर ही आ रहा हूँ घंटे भर में.

घर का नंबर याद है. १-२ दोस्तों का भी नंबर याद है.  किसी से फ़ोन लेकर घर फ़ोन कर लेता हूँ. है तो अटपटा लेकिन अब याद नहीं आ रहा तो और चारा क्या है. मैं खासा डरा हुआ था. यह पहले कभी नहीं हुआ था मेरे साथ.

“भाई साहब ! जरा फ़ोन देंगे. मेरा फ़ोन बंद हो गया है एक फ़ोन करना है साहब” मैंने एक हमसफ़र से गुजारिश की

उसने मना नहीं किया, लेकिन यह जरूर कहा, “कहाँ को जा रहे हैं? कश्मीरी गेट की तरफ जाना है तो साथ ही हो लो, रास्ते में मिला लेना. रुकना क्यों है”

वो जल्दी में था और मुझे सही सही नहीं पता था की क्या मुझे कश्मीरी गेट जाना है या नहीं. मैं शायद जवाब ढूढ़ने की कोशिश कर रहा था. मुझे इतना हैरान सा देखकर उसने फ़ोन मेरी तरफ बढ़ाया और कहा, “सब ठीक है न भाईसाहब”

“हैं?.. हाँ हाँ सब ठीक है, आप जल्दी में हैं शायद. लेकिन मुझे बस दो मिनट चाहिए” कहते हुए मैंने फ़ोन का कीपैड खोला.

कीपैड सामने था, फ़ोन नंबर भी याद था मुझे, 999961993  लेकिन कीपैड पर लिखे नंबर नहीं समझ पा रहा था, इनमे से कौन सा क्या है? सहसा मुझे एहसास हुआ की मुझे सख्या ज्ञान ही नहीं है. सुबह तो था, लेकिन शाम को नहीं, दिन में किस समय में सख्या को पहचानना भूल गया मुझे याद नहीं. मेरी घबराहट बहुत ज्यादा बढ़ गयी, दिल की धड़कन का इतना जोर से शोर करना मैंने कभी महसूस नहीं किया था.

“सर एक मदद करेंगे, यह एक नंबर मिला देंगे?” मैंने कहा

“भाईसाहब आप ठीक हैं न?” यक़ीनन वो आदमी भी घबरा गया. किसी को भी मुझे अनाड़ी मानने में बेहद परेशानी होती. कोई और होता तो मेरे व्यवहार को भद्दा मजाक मानता. उसने फिर पुछा, ” तबियत ठीक है न सर?”

“हैं?.. हाँ….हाँ सब ठीक है शायद सर. लेकिन मुझे याद नहीं आ रहा की मेरा घर कहाँ है. और मुझे अपना फ़ोन नंबर तो पता है सर लेकिन यह अक्षर जो हैं आपके फ़ोन पर यह समझ नहीं आ रहे”  मुझे इतना डर लग रहा था की इतनी अटपटी बात बोलने से भी में अब खुद को रोक नहीं पा रहा था. मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था

“भाई साहब आप, आप वहां आराम से बैठो एक मिनट.” मेरी बैचेनी देखकर उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे एक बैंच पर बैठाया. “नंबर दीजिये मुझे सर”

मैंने नंबर दिया तो उसने डायल करते हुए मुझसे पुछा, “किसका नंबर है सर ?”

“मेरी पत्नी का सर. वो क्या लिखा है” मैंने सामने लगे सुचना पट्ट को देखते हुए पूछा

“क्या?” नंबर डायल करते हुए जब  उसने सूचना पट्ट की तरफ देखा तभी फ़ोन से आवाज आयी

“हेलो” दूसरी  तरफ से आवाज आयी

“जी ! मैडम… यह आप बात कीजिये.” कहते हुए उसने अपना फ़ोन मेरी तरफ बढ़ा दिया

मैंने फ़ोन कान पर लगाया लेकिन दूसरी तरफ से क्या बोला जा रहा था मुझे समझ नहीं आया. कुछ आवाज तो आ रही थी दूसरी तरफ से लेकिन उन आवाजों का क्या मतलब था मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. मैंने फ़ोन वापस उस आदमी की तरफ बढ़ाते हुए कुछ कहना चाहा, लेकिन मेरे पास शब्द नहीं थे. मुझे एहसास हुआ की मैं कोई भाषा नहीं जानता. और भाषा के बिना संवाद कैसे हो. मैंने इशारे से कहा, “मुझे समझ नहीं आ रहा की दूसरी और से आती आवाजें क्या कह रही हैं.”

“आपकी पत्नी हैं सर” शायद उस आदमी ने मेरे इशारों से समझा की मैं पूछ रहा हूँ की कौन है. मैंने फिर इशारों से समझने की कोशिश की, ” मुझे समझ नहीं आ रहा की दूसरी और से आती आवाजें क्या कह रही हैं.”

उस आदमी ने सामने से आते जाते लोगों को रोककर कुछ कहा. धीरे धीरे भीड़ बढ़ने लगी. एक आदमी ने कहा

“अरे अगर इनको कुछ याद नहीं तो एक काम करो फ़ोन पर जो हैं उन्हें बता दो की यह साहब राजीव चौक पर खड़े हैं. वो आकर ले जाएँ.

उसके बाद किसने क्या किया मुझे कुछ समझ नहीं आया. मुझे सिर्फ इतना दिखा की एक खाकी वर्दी वाले आदमी ने मुझे एक गाडी में बिठाया और उसकी गाडी में थोड़ी देर बाद मुझे नींद लग गयी. हो सकता है मैं बेहोश हो गया हूँ. लेकिन उसके बाद जब उठा तो बिस्तर पर औंधा पड़ा था

मेरे आस पास घर के ही लोग खड़े थे. मैं सबको पहचानता था. लेकिन समस्या यह थीं की वो क्या बोल रहे थी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. मेरा भाषा ज्ञान, मेरी  संवाद की शक्ति, मेरा अक्षर ज्ञान, सब मुझसे छूट गया था. घबराहट, डर… नहीं घबराहट नहीं व्याकुलता  का अतिरेक… एक आकुलता, और एक  जटिलता. मैंने  बहुत कठनाई के साथ कुछ समझने की कोशिश तो की लेकिन कोई फायदा नहीं. प्रबल उद्योग के बाद मैंने हार मान ली और चुपचाप विष्मित सा इधर उधर देखने लगा

जब यूं ही पड़े पड़े मुझे बेचैनी होने लगी, जब चारों तरफ की आवाजों से में परेशान होने लगा, कोलाहल, सब बोलते ही चले जा रहे थे, डॉक्टर गुप्ता को घरवालों ने बुला लिया था, वो भी बोलते जाते थे, लेकिन मेरे लिए सब ची-पो, शोर के इलावा कुछ नहीं था तो मैं चुपचाप उठा, पहले गुसलखाने गया और फिर सीढ़ियां चढ़कर ऊपर छत पर चला आया. एक स्टूल उठाया और एक कोने में डालकर बैठ गया.

कुछ देर बाद सरला एक कप  चाय और २ ऱस लेकर ऊपर आयी, मेरी ही तरह या शायद मुझ से भी ज्यादा वो परेशान थी. उसने कुछ कहा, मैंने प्रश्नवाचक सा चेहरा बनाकर उसकी तरफ देखा. उसने धीरे से मेरे सर पर हाथ फेरा. थोड़ी देर तक साथ बैठी हाथ फेरती रही. फिर हम दोनों ही घबराहट के चलते  रोने  लगे. वो रोटी जाती थी और कुछ बोलती भी जाती थी.

थोड़ी देर बाद नीचे से एक आवाज आयी. सरला ने ऊपर से ही जवाब दिया, फिर मेरी तरफ देखा, कुछ बोली, खाली कप उठाया और नीचे चली गयी. उसके जाते ही एक आवाज आयी जो मुझे समझ पड़ी:-

“बोलकर गयी है माँ बुला रही है वापस आएगी”

मैंने आश्चर्यचकित होकर इधर उधर देखा. कोई नहीं था. कोई भी नहीं. किसने बोला? कौन बोला?

“तुमको मैं दिखाई नहीं दूंगा. लेकिन तुम मुझे सुन सकते हो; और मैं तुमको समझ सकता हूँ. शर्त सिर्फ एक है, यह सब तुम किसी और को नहीं बताओगे”

“मैं नहीं बताऊंगा. नहीं बताऊंगा. लेकिन तुम रहना साथ मेरे. मुझे हुआ क्या है; तुम जानते हो यह हो क्या रहा है”  मेरी हालत बिलकुल उस कैदी की तरह थी जो सबकुछ मानने को राजी था थोड़ी सी सजा में ढील के बदले.

“मुझे नहीं पता तुमको क्या हुआ है. लेकिन मैं उनको भी सुन समझ सकता हूँ और तुमको भी. बोलो क्या चाहते हो? सुनो सरला आ रही है वापस. तुम यह बोलना बंद करो”

मैंने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और बोलता रहा, “सुनो, सुनो, तुम जाना मत. यहीं रहो प्लीज. एक तुम ही हो जो मेरी बात सुन रहे हो”

सरला छत के दरवाजे पर खड़ी थी; उस समय के मेरे भाव और मेरी हरकतें किसी को भी डरा सकती. थीं. उसको समझ नहीं आ रहा था की वो मेरे पास आये या मुझसे बचकर दूर भागे. एक कदम मेरी तरफ आयी लेकिन हतप्रभ सी फिर पीछे मुड़ी और सीढ़ियों में आकर बोली, “माँ जरा ऊपर आना”

“वो डर रही है तुम्हारी हरकतों से. सुनो तुम चुप रहो. बिलकुल मत बोलो. उसको समझ नहीं आ रहा की वो क्या करे. मैं यही हूँ; कहीं नहीं जा रहा. तुम चुप रहो; वो जाएगी तो बोलना”

मैं बिलकुल चुप हो गया और टिकटिकी लगाए सरला की तरफ देखने लगा. किसी को भी मेरी यह हरकत और डरा देती. वही हुआ; सरला डरते हुए बोली, “आप ठीक हो?” लेकिन आगे नहीं बढ़ी.

मुझे कुछ समझ नहीं आया की वो क्या बोल रही है. स्वतः ही मेरी आँखे चौड़ी हो गयीं, जैसे आमतौर पर किसी चीज पर जरूरत से ज्यादा केंद्र करने पर हो जाती हैं. जैसे ही उसने सीढ़ी की तरफ देखकर माँ को दोबारा आवाज लगायी और उसका ध्यान मेरी और से क्षण भर को हटा मैंने कहा, “क्या कह रही है वो. जल्दी बोलो”

मुझे खुद से ही बड़बड़ाते देखकर सरला अब भयभीत थी. माँ के आते ही रोने लगी. माँ ने मेरी तरफ देखा और वो भी अचंभित, जैसे कोई मुर्ख किसी को देखकर समझने की कोशिश कर रहा हो की आखिर यह सब हो क्या रहा है. माँ के पीछे पीछे डॉक्टर गुप्ता जी भी आये, मेरे पास आकर उनहोंने एक इंजेक्शन मेरी बाजू में लगाया…

वो आवाज मेरे कानों में कहती जाती थी, “घबराओ मत, यह इंजेक्शन तुम्हे सुला देगा. मैं तुम्हारे सपने में आकर तुमसे बात करूंगा. यहाँ बात करना मुमकिन नहीं लगता. तुम्हारे बड़बड़ाने से लोग डर रहे हैं. मुझे डर है कहीं तुम्हे तुम्हारे ही घर वाले पागल न समझने लगें.

(2)

खूब हरियाली. चारों तरफ सरसों फैली हुई. और इस हरयाली से भरे मैदान में सिर्फ एक घर. कच्चा मकान जिसे ईंट गारे से जोड़ा गया था. घर के ऊपर खपरैल और खरपैल पर पशुओं के लिए चारा. घर में सिर्फ एक ही कमरा. कमरे में सिर्फ एक ही खटिया. घर का दरवाजा टुटा हुआ. चौखट के कील निकले शायद बहुत दिन हो गए. दरवाजा खुला हुआ और दरवाजे से अंदर आती ठंडी हवा. अंदर जमीन पर एक आदमी लेटा हुआ. उम्र यही कुछ मुश्किल से ३५- ४० के बीच की. लगातार खांसता और बीच बीच में मुहं से निकलती लार को पास पड़े एक कपडे से पोंछ लेता.  उठने का प्रयत्न करने पर भी उठ नहीं पता था. हारकर उसने पास ही पड़े बेलन को उठाकर जमीन पर दो चार बार खड़काया

बाहर से एक औरत अंदर आयी. यही कुछ ३४-२७ साल की. बालों में अभी सफेदी उतरी ही थी, कहीं कोई एक आधा बाल सफ़ेद. अंदर आते ही समझ गयी आदमी को क्या चाहिए. चुपचाप पानी उठाकर उसे पानी पिलाया. थोड़ी देर उसके पास बैठी उसके सर में हाथ फेरती रही. आदमी में कहीं कोई हिम्मत ही नहीं की कुछ कहे. कोशिश भी करे तो खांसी ही नहीं रूकती. औरत ने मुल्लठी की एक दातुन उसके हाथ में पकड़ा दी और बाहर निकल गयी. वो धीरे धीरे उसे चबाने लगा.

“कैसे हो?” आवाज आयी

“कौन ?”

“कहा नहीं था की तुम्हारे सोते ही सपने में आयूँगा. बोलो कैसे हो?” आवाज ने कहा

“क्या हुआ है मुझे ?” लेटे हुए आदमी ने पुछा

“कहा तो था की मुझे नहीं पता तुम्हे क्या हुआ.  मैं कोई डॉक्टर नहीं हूँ भाई.” आवाज ने जवाब दिया

“तुम हो कौन?”

“देखो ध्यान से सुनो, मैं तुम्हारे सपने में आता रहूँगा – रोजाना. लेकिन शर्त एक ही है. सिर्फ तीन सवालों का जवाब दूंगा. और तीन सवालों के बाद चला जाऊंगा. एक और बात, हर हफ्ते एक बार तुम जो कहोगे वो मैं तुम्हारे लिए करूँगा. लेकिन ध्यान रहे तुम्हे ठीक नहीं कर सकता. तुम्हारी असल जिंदगी में कोई फर्क नहीं ला सकता. सिर्फ इस सपने की जिंदगी में तुम जो बोलो कर दूंगा. इस बीच अगर तुम ठीक हो गए तो तुम्हे वैसे भी ये सब याद नहीं रहेगा. बोलो मंजूर??”

“पता नहीं मंजूर की नहीं…. एक बात बताओ तुम हो कौन?” लेटे हुए आदमी ने पूछा

“एक ही सवाल दो बार पूछोगे तो २ सवाल काउंट होंगे. अब तुमने अपने आज के ३ सवाल पूछ लिए. “तुम हो कौन?” यह तुमने २ बार पूछ डाला और उससे पहले “क्या हुआ है मुझे?” तो ३ का कोटा हो गया पूरा. अब उत्तर सुनो, “मैं वो हूँ जो इस स्थिति में भी तुम्हे सुन सकता हूँ समझ सकता हूँ और जिसे तुम भी सुन सकते हो और समझ सकते हो. ऐसा एक ही आदमी हो सकता है – तुम खुद – तो जान लो मैं और कोई नहीं तुम हूँ. और यह भी जान लो की जब तुम, तुम से ही बातें करते पकडे जाओगे तो लोग तुम्हे सिरफिरा कहेंगे. इसलिए हो सके तो तुम मुझे तब मत बुलाना जब आस पास लोग हों; हो सके तो जागते हुए मुझसे बात ही नहीं करना” तो मैं चलता हूँ.

फिर जाने से पहले वो आवाज़ मुड़ी और बोली “देखो क्योंकि आज पहला दिन है इसलिए एक एक्स्ट्रा बात बताते जा रहा हूँ – जैसे डिस्काउंट होता है न – एक के साथ एक फ्री – यह जो औरत आयी थी न अंदर, जिसने तुम्हे पानी पिलाया था, सर पर हाथ फेरा था – यह सरला थी”

चौंक कर मेरी आँख खुल गयी. उठा तो वही पहली सी स्थिति. जानता हूँ की अपने घर पर हूँ लेकिन न भाषा ज्ञान न संवाद की कोई गुंजाइश. बस एक सन्नाटा. मैं खुद से ही कुछ बुदबुदाया, इस विचार से की जो सुन पा रहा है शायद वो जवाब देगा. लेकिन कोई जवाब नहीं. मुझे याद आया उसने कहा था, “मैं तुम्हारे सपने में आता रहूँगा – रोजाना. लेकिन शर्त एक ही है. सिर्फ तीन सवालों का जवाब दूंगा. और तीन सवालों के बाद चला जाऊंगा…….बोलो मंजूर??”

मैंने झट कहा “मंजूर” और जब कोई पलटकर नहीं बोलै तो फिर कहा, “भाई! सुनो, मंजूर”

लेकिन पलटकर कोई जवाब नहीं आया. मैं सपने में नहीं था और उसने कहा था की वो सपने में मेरे पास आएगा. मैंने फिर आँखे बंद कर लीं. इंजेक्शन की गफलत अभी थी. थोड़ी जद्दोजहद करनी पड़ी लेकिन नींद लग गयी.

 

नींद में फिर वही खपरैल का घर और जमीन पर लेटा वही आदमी. उसके पास ही वो औरत बैठी थी और एक एक कौर उसकी तरफ बढाती. वो इतनी ही हिम्मत कर पता की जब कौर मुहं के नज़दीक पहुँचता तो वो अपना मुहं खोल लेता. कौर मुहं में रखकर धीरे धीरे उसे चबाता जाता. एक एक कौर का यह सिलसिला लगता घंटों चलता ही जा रहा है. बीच-बीच में उस आदमी को कोई हिलता मनो उसे कुछ और करने को कह रहा हो; लेकिन वो आदमी सिर्फ एक बैल की तरह जुगाली ही करता जाता था.

दरअसल वो दूसरा आदमी मैं ही था जो लेटे हुए आदमी को झकझोर रहा था. मैं चाहता था की वो लेटा हुआ आदमी कुछ तो बोले, कुछ तो करे की प्रतिउत्तर में कोई आवाज आये. मेरी रूचि तो उसी प्रतिउत्तर वाले में थी. यह संघर्ष बड़ी देर तक चलता रहा. और अंततः मैं इतना झुंझला गया की उसी झुंझलाहट  में मेरी नींद टूट गयी.

मैं समझ गया की वो आवाज अब आज तो लौटकर नहीं आने वाली. उसने कहा था “मैं तुम्हारे सपने में आता रहूँगा – रोजाना…..”

अब वो कल ही लौटेगा. मेरे लिए बस वो ही सहारा था. बाहर की दुनिया में न मुझे कुछ समझ आ रहा था न ही मुझे कोई समझ पा रहा था. डॉक्टर जब इलाज करेगा तब करेगा; जब आराम आएगा तब आएगा. अभी के लिए बस एक ही सहारा था और वो सहारा अगली रात का आश्वासन देकर जा चुका था.

अगली रात के आने से पहले मैं सोचता रहा की आखिर उससे सवाल क्या पूछने हैं? दिन भर मेरे आस पास घर बाहर के कितने ही लोग आकर बैठे. सभी कभी मुझसे कुछ बोलते तो कभी आपस में बातें करते. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. लेकिन मैं हर आदमी को पहचान रहा था. हर नए आदमी के आने पर मेरे मन में उठता की रात को उस आवाज से यही पूछूंगा की यह आदमी कह क्या रहा था.

(3)

“तो शुरू करें?” आवाज ने कहा

मैं घर के बाहर चारपाई पर बैठा था. सरला कुछ दूर चौका लेप रही थी. मैंने जवाब में कहा “हाँ. शुरू करते हैं”

“पूछो फिर?”

“मैं ऐसे जमीन पर क्यों पड़ा था? खांसता ही जाता था. हुआ क्या है मुझे? अभी भी चारपाई पर अधमरा सा पड़ा हूँ; क्या बीमार हूँ?” मैंने पूछा

“तुम भूल गए दोस्त. तुम अभी सपने में हो. सपना तुम्हारी सच्चाई नहीं दोस्त.क्या तुम सचमुच यही प्रश् पूछना चाहते थे?” और फिर बिना मुझे उत्तर देने का मौका दिए बोला, ” लेकिन अब तुमने सवाल पूछ लिया है तो जवाब सुनो. तुम जमीन पर इसलिए पड़े हो क्योंकि वो औरत – सरला – जो चौका लेप रही है और तुम्हारी देखभाल के लिए बार बार तुम्हारे सिरहाने आती है वह गत ५ वर्षों से तुम्हे धीमे धीमे जहर देती आयी है. और अब आखिरकार उस जहर ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है.” फिर एक तेज हवा का झोंका मेरे पूरे बदन से होकर गुजरा जैसे उस आवाज ने मेरे सर पर हाथ फेरा हो.

“तुम मुझे फंसा रहे हो” मैं उलझन में था, “मुझे पता है की मुझे अपनी असल जिंदगी को लेकर सवाल पूछना चाहिए लेकिन…… कल तुम जाते जाते कह गए थे की यह औरत सरला है. आज फिर सपने में सिर्फ मैं हूँ और वही औरत. मैं समझ नहीं पाया की यह क्या गोरखधन्दा है और गलत सवाल पूछ बैठा” फिर बड़ी विनम्रता से पूछा, “सुनो, तुम ही बताओ ऐसा कैसे हो सकता है की यह सरला हो?”

“मैं भी तुम हूँ, तुम तो तुम हो ही, तुम्हारे जीवन का खूंटा सरला से बंधा है, लौट लौट कर वहीँ तो जाते हो तुम तुम्हारे सपने की यह औरत भी सरला है. तुम अपनी सच्चाई को सपने में जल्दी जल्दी बदल रहे हो. कितनी बार कहा है तुमने; रिटायर होकर दूर कहीं गांव में जाकर रहूँगा.” उसने बोलना जारी रक्खा “तुम बहुत जल्दी उस जहर से मर जाओगे. और तुम्हारे मरने के बाद सरला अपने पिता के पास वापस लौट जाएगी. यह सपना जब अपने निष्कर्ष पर पहुंचेगा तब मैं भी वापस लौट जाऊंगा; वहां जहाँ से मैं आया हूँ. तुम भी शून्य हो जाओगे और मैं भी”

मेरे कंधे पर हाथ रखकर उसने कहा “तुम्हारे पास एक ही रास्ता है दोस्त – अपने सपने में स्वयं को जीवित रखो. अगर तुम मरे तो सपना समाप्त”

“यह क्या घचपच है. कुछ समझ नहीं आ रहा. सपने में जो सरला है वो भी मेरी पत्नी है; बाहर जो सरला है वो भी मेरी पत्नी है. यह सरला मुझे पिछले ५ साल से जहर दे रही है, वो सरला रो रो कर खुद मरने को है. एक सवाल है, तुम बोलो मैं क्या करूँ? ”

“मैं भी तो तुम्हारी ही सोच हूँ. मैं तुम्हारे लिए कैसे सोचूं. मेरे लिए और अपने लिए और सरला के लिए और अपने जीवन के लिए – इन सबके लिए सोचना तुम्हारा दायित्व है” फिर आगे बोला, “मैं गुत्थी सुलझाने में मदद कर सकता हूँ; गुत्थी सुलझाकर परोस नहीं सकता”

“ठीक – ठीक. जरा सोचने दो मुझे.” और फिर कुछ सोचकर मैंने बोला, “यह सरला कुछ बोलती क्यों नहीं? सपने में मैंने इसे कुछ बोलते नहीं देखा कभी”

“तुम चाहते हो यह बोले?”

“हाँ”

“ठीक है, तो इस हफ्ते मैं तुम्हारी यह एक बात मानता हूँ, कल से सरला और तुम बात कर पाओगे”

 

 

(4)

रात का समय. सरला आँखे बंद किये लेटी हुई है – अचेत नहीं, उसको पता है की मैं कमरे में बैठा पिछली रात का बना मुर्गा निपटा रहा हूँ; वो पिछले ५ सालों से ऐसे ही सोती है जैसे भ्रूण माँ की कोख में. अपने घुटने अपने पेट से सटाये. उसकी आंखें असहज सी बंद हैं, दूर से ही पता चलता है की वो सोई नहीं है. मैं खाना निपटा कर उसकी बगल में लेट जाता हूँ. धीरे से अपना हाथ उसकी बाजू के नीचे से निकाल उसके वक्षस्थल पर रखकर उसको खुद से कसता हूँ. वो असहज होकर थोड़ा दूर हो जाती है. कुछ देर उसके पास होने की कोशिश चलती है फिर अपमानित सा मैं दूसरी तरफ पलट कर सो जाता हूँ

अगले दिन सुबह हम दोनों एक पहाड़ी पर चढ़ रहे हैं. उसको पीठ पर इतना बड़ा थैला बांधकर चलने में कठनाई हो रही है तो मैंने उसका थैला भी अपने कंधे पर ले लिया है. देर तक हम चलते रहे. एक चाय की टपरी देखकर उसने कहा;

“कुछ देर ठहर जाएँ?” सरला ने पहली बार सपने में कुछ बोला. मैं जो दूर खड़ा यह सब देख रहा था मन ही मन मुस्कुराया, आवाज़ ने अपना वादा पूरा किया था

मैंने पीछे मुड़कर देखा. वो हांफ रही थी. मैंने बिना कुछ कहे थैला नीचे रख दिया. वो बैठ गयी. चाय के साथ पाव भर प्याज़ भाजी लेकर दोनों बैठे. सरला को प्याज़ भाजी सचमुच पसंद थी. चाय ख़तम हुई तो दोनों यंत्रवत उठे और चलने लगे.

पहाड़ी के पार सरसों के खेतों की कटाई का काम था. दोनों वहां पहुंचकर अपने अपने काम में लग गए और फिर शाम ढले उसी तरह वापस घर लौट आये. सरला ने लौटकर चौका संभाला और मैंने नहा धोकर संध्या आरती. रात दोनों खाने की मेज पर थे की सरला बोली

“दर्द रहता है आजकल. थकावट भी.”

“स्वाभाविक है सरला.” मैंने कहा

“शहह … चुप रहो. तुम बड़बड़ा रहे हो. सरला सुन लेगी” सहसा आवाज आयी

“हैं! कहाँ थे तुम इतनी देर? मैं अकेला था इतनी देर से” मैंने ऐसे कहा जैसे मैं उसका मालिक हूँ और वो आवाज मेरे इशारे पर चलती हो.

“दुनिया में सिर्फ एक तुम ही तो नहीं जिसकी हर रात मैं मदद करता हूँ. और भी हैं. लेकिन सुनो यूँ बड़बड़ाया न करो, सरला तुम्हारे साथ सोती है, और आजकल तो बहुत कच्ची नींद सोती है, तुम्हारे इस तरह बड़बड़ाने को जाने क्या समझेगी”

मैंने धीमे से सर हिलाया. इतनी एहतियात से की कहीं मेरे सर हिलना भी कहीं सरला को उठा न दे

वो हंसा “यह क्या कर रहे हो. हम सपने में हैं; इतना डर क्यों रहे हो. हाँ तो क्या बड़बड़ा रहे थे?” आवाज़ ने पूछा

“सरला जब गर्भ से थी तो उसको भी बहुत थकावट होती थी, यही कह रहा था की स्वाभाविक है”

उसने मेरी बात को अनसुना सा कर दिया और बोला “तुमने नोट किया, आज तुम बीमार नहीं हो सपने में, तुम्हे नहीं लगता की तुम खासे जवान लग रहे हो आज. और सरला भी. देखो उसके बालों में कोई सफ़ेद लकीर नहीं है आज”

मैंने ध्यान से देखा. बेचैनी बढ़ने लगी, परेशानी के साथ मुझे लगा यह आवाज मुझे भ्रमित करने में लगी है- इसका एक मात्र उद्देश्य है मुझे पागल कर देना. “मैं बीमार क्यों नहीं हूँ आज?” सहसा मैंने पूछा.

“इसका उत्तर तो आसान है. तुम कल से सोच रहे हो की सरला तुम्हें जहर क्यों दे रही है पिछले ५ वर्षों से. इसलिए आज तुम्हारा सपना वहां से शुरू हुआ जहाँ सरला और तुम नयी नयी शादी करके आये थे. याद है दोनों काम पर जाया करते थे. फिर एक दिन तुमने सरला से कहा था, तुम थक जाती हो सरला; तुम जॉब छोड़ दो मैं मैनेज कर लूँगा.”

“और उसने मेरी बात मान भी ली थी.” मैंने जवाब दिया, “एक बात कहूं; तुम गलती कर रहे हो. सोचो तुम कल सपने मैं आओ और देखो की तुम यहाँ मरे पड़े हो तो फिर क्या करोगे. तुम इस खेल के रूल सीखने में देर लगा रहे हो दोस्त. सब चुटकी में ख़तम. मैं लौटकर नहीं आऊँगा दोस्त. तुम्हे ठीक से और जल्दी से सीखना होगा.”

“तुम मेरा एक काम करोगे?”

“क्या?”

“मैं सोच रहा हूँ की मैं अभी कुछ बड़बड़ाऊँगा. देर तक. निश्चित ही सरला सुनेगी. निश्चित ही वो सुबह इस बारे में बात करेगी. क्या तुम जब कल लौटोगे तो मुझे बताओगे की वो क्या बात कर रही थी?”

“तुम्हारे लिए यह भी सही. पहला हफ्ता है तुम्हारा. कायदा तो कहता है की एक हफ्ते में मैं तुम्हारा एक ही काम करूँ; लेकिन कोई बात नहीं – मान रहा हूँ. कल बताऊंगा. कोई और सवाल पूछना है तुम्हे?”

“नहीं अभी नहीं. लेकिन तुम रुके रहो, मैं सरला से बात करने की कोशिश करता हूँ” और इतना कहकर मैंने दोबारा उन दोनों की तरफ देखना शुरू किया.

सरला घर के बाहर खड़ी थी. दूर कहीं सूरज निकलने को बेताब था. उसी तरफ टिकटिकी लगाए सरला देखती जा रही थी. तेज हवा उसकी कनपटी में अटके बालों को उड़ाती, वो फिर उन्हें कनपटी पर उलझाती और हवा फिर उड़ा देती. देर तक यह सिलसिला चलता रहा. इस तरह केंद्रीभूत सरला की आँखों से पहले एक आँसूं टपका और फिर अचानक वो सिसकने लगी. उसने पहले अपने होठों को दबाया की कहीं वो फूट न पड़े लेकिन फिर नहीं रोक पायी. मैं कमरे से बाहर निकला और उसकी तरफ दौड़ा. उसके पास पहुंचा तो देखा उसके पैरों की पास की जमीन पर खून के छींटे पड़े हुए हैं. उसकी सलवार के पोछें पर नज़र पड़ी और फिर ऊपर की तरफ उठती चली गयी. मैंने उसे कसकर पीछे से पकड़ लिया और रोने लगा, सरला, छोड़ दे सरला, सबकुछ, मैं देख लूँगा

“सरला वो मेरी गलती नहीं थी, मुझे नहीं पता था, तुम्हे भी कहाँ पता था. सरला मैं शर्मिंदा हूँ. लेकिन हमने उसको नहीं मारा सरला. हमको पता ही नहीं चला” मैं बड़बड़ाने लगा.

उस आवाज़ ने सही कहा था, सपने में मैं और सरला ही थी. सरला का वो गर्भपात भी इतना ही दुखदायी था. “सरला इस दुःख से बाहर तो आना ही होगा हमको. सरला उसकी मौत के लिए क्या तुम मुझे जिम्मेदार मानती हो? छोड़ दो सरला; मैं देख लूँगा” मैं बड़बड़ाता रहा और फिर मेरी नींद खुल गयी.

सरला सन्न मुझे देख रही थी. फिर कुछ बोली; मुझे कसकर गले से लगाकर रोने लगी. उठते ही मेरी स्तिथि बहरहाल वैसी ही थी थी; न भाषा का ज्ञान न संवाद की गुंजाईश. सरला को मैं निस्सहाय रोते बिलखते देख रहा था. उसने माँ को बुलाया और बोली;

“शायद मेरे मिसकैरिज को याद करके कुछ बड़बड़ा रहे थे. बार बार कहते थे छोड़ दो सरला मैं देख लूँगा.” बोलते बोलते रोती जाती थी. “शायद मेरी जॉब छोड़ने की बात याद कर रहे थे, मिसकैरिज के बाद हमने जॉब छोड़ देने का फैसला किया था न – शायद वही सपने में आया होगा”

(5)

दिन की किसी भी घटना की बात करना बेकार होगा. उसका इस कहानी से अब कोई वास्ता ही नहीं. मेरी स्तिथि वास्तविक जीवन में ठीक होगी नहीं होगी मुझे नहीं पता. अब जो होगा सपने में ही होगा. मैं रात का इंतज़ार करने लगा. मुझे अब सिरफिरा कहा जा सकता था. वास्तविकता से मेरा नाता टूटता जा रहा था. अभी दिन में बैठे बैठे मैं खुद से ही बोलता रहूं वो स्थिति तो नहीं आयी थी लेकिन दिन भर मैं रात होने का इंतज़ार करता रहता था. दिन में कई बार सोने की कोशिश भी करता लेकिन दिन में नींद आने पर भी सपना नहीं आता था

सरला मुझे छोड़ कर जा चुकी है. बिलकुल वैसे जैसे आवाज़ ने कहा था. “जब मैं मर जाऊँगा तो सरला अपने पिता के घर वापस चली जाएगी”.शायद वो मेरे मरने तक के लिए भी नहीं रुकी. मैं अकेला चारपाई पर बैठा सांस बड़ी कठिनाई से तेज तेज खींच रहा था. सांस लेने में इससे पहले मुझे कभी इतनी दिक्कत नहीं हुई. कुछ देर बैठा रहा, फिर जब नहीं बैठा गया तो अंदर आकर चारपाई पर लेट गया. रात में अकेले होने का डर अभी से सताने लगा था. क्या पता रात तक सांस खींच भी पाऊं या नहीं? दूर खड़ा मैं जब खुद को ऐसी हालत में देख रहा था तो एक ही ख़याल चल रहा था, अगर मैं आज रात सपने में मर गया तो क्या होगा?

“कुछ नहीं होगा? डरो मत.  तुम आज के सपने में नहीं मरने वाले. घबराओ नहीं. “आवाज ने कहा

“क्या कहती थी सरला? तुमने सुना? क्या कहती थी वो.” मैंने सपने को अपने पर इस बार भारी नहीं होने दिया. जो सोचकर आया था वही प्रश् पूछा

“उसे लगा तुम उसके मिसकैरिज के बारे में बड़बड़ा रहे थे.”

“और?”

“कहती थी की उसने तो कभी इस बारे में कुछ नहीं कहा.कोई शिकायत नहीं की. तुमपर कभी दोष नहीं दिया. कहती थी वो तो कब का उस वाकिये को भूल जीवन में आगे बढ़ चुकी है. लेकिन शायद तुम्हे अभी भी वो सब कचोटता है; अभी तक मन में है.  शायद इसीलिए यूँ नींद में बड़बड़ा रहे थे”

“तुमने देखा नहीं था कल क्या हुआ? सरला मैदान में खड़ी दूर सूर्योदय को एक टक देख रही थी. और रोती जाती थी. हमारा बच्चा वो सूर्योदय था जो हमने नहीं देखा” मैंने कल के सपने को इंगित कर कहा

“बस दिन भर इसी बात के इर्द गिर्द ही बातें होती रहीं. कई बार सरला बोली; अगर एक बार यह मेरी सुनें तो मैं इन्हे बताऊँ की मुझे कोई शिकवा नहीं” आवाज़ ने कहा और फिर यकायक बोला, “तुम्हे पता है सरला अपने पिता के पास चली गयी”

“कौन?” मैंने अचम्भे से पूछा

“अरे! देखते नहीं तुम अकेले पड़े हो. सरला अपने पिता के पास चली गयी” आवाज़ ने कहा

“हाँ ऐसा ही लगता है. मैं अकेला पड़ा हूँ. लेकिन तुमने तो कहा था की वो मेरे मरने पर जाएगी. अभी क्यों चली गयी?”

“मुझे नहीं पता. हो सकता है तुम्हे लगता हो की वो तुमसे इतना प्यार करती है की तुम्हे मरता नहीं देख सकती इसलिए तुमने अपने सपने में परिवर्तन कर दिया हो. या हो सकता है तुम्हे लगता हो वो तुम्हे न मरने देगी न जीने इसलिए तुमने उसे जीवन से निकल फैकना ठीक समझा हो”

मैंने ठान रखा था की आज मैं भ्रमित नहीं होऊंगा. उसकी बात को अनसुना कर मैंने कहा “अच्छा सुनो; क्या सरला कहती थी की अगर एक बार मैं उसकी सुन लूँ तो तो वो मुझे बताये की उसे कोई शिकवा नहीं”

“हाँ कहती तो थी.” आवाज़ ने कहा

“तो क्या हम उसको भी इस सपने में ला सकते हैं. क्यों न हम कुछ ऐसा करें की सरला को भी सपने में ले आए. सपने में तो हम बात कर सकते हैं न”

“सरला है तो सपने में”

“कहाँ है?”

“आज नहीं है; क्या पता कल फिर आ जाये. सपना तो तुम्हारा है. मैं भी तुम हो और तुम भी तुम. सपने का क्या है. कहीं और से शुरू करना कल. एक बात ध्यान रखना. मैं सिर्फ सिरफिरों से बात कर सकता हूँ” इतना कहकर वो क्षण भर को ठिठका. शायद मुझे सिरफिरा कहना उसे अच्छा नहीं लगा. फिर बोला, “एक बात सोचो अगर तुम सरला को सपने में ले भी आये तो वो असली सरला थोड़ा ही होगी”

सरला जा चुकी थी. आदमी कभी बैचैन होकर उठ बैठता, कभी फिर लेट जाता. दिन ढलने लगा तो उसको भूख भी लगने लगी. उसने उठकर जो पिछले दिन का बना पड़ा था वही टटोला; एक थाली में डाला और बैठकर खाने लगा. सरला की बात याद आयी; कुछ बनाना सीख लोगे तो आसानी होगी. मैं कभी कहीं चली गयी तो भूखे मर जाओगे. खाकर उसने बर्तन चौके के पास रखे, वहीँ पास ही में लकड़ी का बना एक पालना पड़ा था. उसको याद आया, सरला के गर्भपात के बाद वर्षों तक वो सरला को समझाता रहा था की उन दोनों को फिर से कोशिश करनी चाहिए. पालने पर उन दोनों ने मिलकर एक नाम गोदा था, “पल”. उस नाम पर वो बड़ी देर तक हाथ फेरता रहा. पल भर में कैसे सब बदल गया था. सरला उसके बाद इतनी डर गयी थी की वो फिर कभी नहीं मानी.

“तुम झूठ बोलती हो सरला. तुम नहीं भूली. इतने साल बाद भी तुम हर बार कहती हो, तुमसे नहीं हो पायेगा.  तुम नहीं भूली.” मैं बड़बड़ाता रहा, “तुम्हे हमेशा लगता रहा की फिर वही होगा. तुमने कभी भविष्य की कल्पना में, हमारे बच्चे को   स्थान ही नहीं दिया. एक जोड़ी उज्ज्वल आँखे और पांच जोड़ी छोटी उँगलियों के लिए हम तरसते रहे सरला”

“तुम क्या कर रहे हो? वो रो रही है. प्लीज चुप हो जाओ” आवाज़ ने कहा

मेरी नींद खुल गयी. सरला सामने बैठी रोती जाती थी. मुझसे गले लगकर रोती जाती थी और जाने क्या बोलती जाती थी.

(6)

मैं और सरला एक रेलवे स्टेशन पर खड़े हैं. मैं पिलर नंबर १८ और वो पिलर नंबर २२ के पास. गाडी आने में अभी समय है. कोई लोकल स्टेशन है, घनी रात में स्टेशन की लाइट इतनी कम है की अकेले आदमी को अँधेरे से डर लगे. पूरे प्लेटफार्म पर सिर्फ मैं और सरला ही हैं. मैं धीरे धीरे उसकी तरफ बढ़ता हूँ.

“तुम यहाँ क्या कर रही हो? कहीं जाना है?”

“हाँ, मैं पिताजी के घर लौट रही हूँ”

“हमारी इस बारे में कोई बात तो हुई नहीं. मुझे छोड़ रही हो”

वो चुप रहती है. हवा तेज है, उसके कान के पास के बालों को फिर-फिर उड़ा देती है. वो मेरी तरफ नहीं देख रही. कहीं सामने किसी बिंदु पर नज़र अटकाए है, जैसे उसे पता हो की मेरी तरफ देखगी तो लिपटकर रोने लगेगी

“क्यों जा रही हो सरला?

“मैं फिर कोशिश नहीं करुँगी. कभी नहीं. हम फिर कोशिश नहीं करेंगे. कभी नहीं” सरला ने कहा, “मुझे लगता है हमने सब कुछ ठीक किया था, और जो भी किया जा सकता था वो किया जा चुका है”

“मैंने कभी इस बारे में जबरदस्ती की है?” मैंने पूछा

“पिछली तीन रातों से तुम इसी बारे में बोलते रहते हो. क्या तुम्हे लगता है दोबारा कभी कोशिश न करना तुम्हे ज़हर देने जैसा है. तुम्हे धीरे धीरे मारने जैसा” सरला ने मुड़कर मेरी तरफ देखा, “तुम्हे लगता है बच्चा न होना मेरी ज़िद्द है, किसी तरह का प्रतिशोध?”

चुप बिलकुल चुप रहने की बारी मेरी थी. मुझमें साहस ही नहीं था की बोलूं, मुझे बच्चा चाहिए सरला. मैं तुम्हारे अंदर के डर के चलते नहीं कह पाता लेकिन मैं चाहता हूँ की तुम कोशिश तो करो. मुझे बच्चा चाहिए.

“तो सरला को ले ही आये तुम सपने में” आवाज़ ने पीछे से कहा

मैंने मुड़कर उसकी तरफ देखा, “तुम बीच में मत आओ. उसको नहीं पता की हम सपने में हैं. मुझे बात करने दो उससे. यही एक तरीका है इस मसले को ख़तम करने का. बात किये बिना यह नहीं सुलझने वाला.”

“तुम्हारे यहाँ बात करने का कोई फायदा नहीं. यह सरला भी तो तुम्हारी कृति भर है. गांव की जगह इस स्टेशन पर खड़े होने से कुछ बदला नहीं है दोस्त. देख तो तुम सपना ही रहे हो. बड़बड़ा तो तुम खुद से ही रहे हो.” उसने फिर कहा, “अगर तुम बात कर ही सकते तो शायद तुम्हारी यह स्तिथि ही न होती. संवाद ही तो नहीं हुआ इस विषय पर कभी”

“नहीं तूम चुप रहो. मैं स्तिथि बदलने की कोशिश ही कर रहा हूँ. देखते नहीं ५ वर्षों में पहली बार मैं और सरला इस विषय पर बात कर रहे हैं – सपने में ही सही” मैं शायद स्वयं को ही तर्क दे रहा था, यह जानते हुए भी की मेरे तर्क की कोई जमीन नहीं

“तुम्हारा भ्रम है, यह बात उस तक नहीं पहुंचेगी”

“पहुंचेगी, मैं जानता हूँ कैसे अपनी बात उस तक पहुंचानी  है”

“कैसे?”

“एक बार सपने में ही सही मैं यह बात कर डालना चाहता हूँ. अंदर दबी निराशा, कुंठा ही मुझे पराजित कर रही है. मैं इस आशाहीनता के चलते बीमार हूँ की इस विषय पर बात करके मैं सरला को विक्षिप्त ही न कर दूँ. वह पागल न हो जाये, बीमार न हो जाये इस डर से मैं यह विषय नहीं उठाता. लेकिन इससे मैं भी तो दीवाना होता जा रहा हूँ”

आवाज़ ने उत्तर नहीं दिया. वो चुप रही. शायद यह पहली बार था की मैंने अपने अंतर्मन से तारतम्य बैठाया था. मुझे बात करनी ही चाहिए यह मैं और मेरे अंतर्मन दोनों एक सुर में बोले थे. मैंने सरला की और मुड़कर कहा, “गाडी आने में समय है सरला. आओ वहां बेंच पर बैठते हैं.”

सरला चुपचाप बेंच तक मेरे साथ चली और हम दोनों बेंच पर बैठे. मैंने धीरे से कहा, “तुम्हे किस बात का डर है?”

“अगर फिर वही हुआ तो? मैं वो दुःख नहीं सहना चाहती. तुम कहो मैंने कब तुम्हारा कहा नहीं माना? कभी हुआ की मैंने समझने की कोशिश न की हो. तुम्हारे साथ न दिया हो?” सरला की आंखों में यकायक आंसूं भर आये, “पहले सपना देखो, एक साथ सपना जीना शुरू करो और फिर एकाएक खून के थक्के से निकलने लगें. यह मैं नहीं देख पाऊँगी”

“लेकिन ….”

“इस बार तुम मान जाओ. प्लीज. मुझे शरीर की दुर्गति की चिंता नहीं लेकिन मन की दुर्गति नहीं सह सकती. बच्चे को सोचती हूँ तो लगता है मेरे अंदर से फिर कोई मशीन एक मांस का लोथड़ा निकल कर मेरे सामने रख देगी.”

“पर ऐसा होगा ही क्यों? हम क्या इस दुनिया में अकेले हैं जिसके साथ ऐसा हुआ है.”

सरला ने शायद मुझे सुना नहीं. वो कहती जाती थी “पहले खून के थक्के निकलेंगे, फिर उसके बाद पेट के निचले हिस्से में दर्द होगा, दर्द धीरे धीरे दिन – दिन फैलता पेल्विक हिस्से और कमर के निचले हिस्से तक पहुंचेगा. घर के सब बड़े कहेंगे, कुछ ख़ास नहीं इस स्तिथि में होता है. फिर वही होगा जो पहले हुआ था, बार बार पेशाब जाना होगा; सब यही कहेंगे होता है; लेकिन जब वजन में गिरावट आने लगेगी, ब्रैस्ट कड़ी और कड़ी होने लगेगी तो सब डरने लगेंगे. सब कहेंगे कम्पलीट बेड रेस्ट लेकिन फिर कुछ नहीं होगा. और एक दिन एक मशीन कहीं अंदर से एक मांस का लोथड़ा निकाल कर टेबल पर रख देगी. पिछली बार मैं बहुत रोई थी. मुझे यकीं है इस बार तो मुझे रोना भी नहीं आएगा. उस बात पर कौन रोयेगा जो पता है अवश्यम्भावी सत्य है. मुझे उम्मीद ही नहीं है. तुम ज़बरदस्ती करोगे और निराशा हाथ लगेगी. तुम शायद रोओगे भी. लेकिन मुझे तो सिर्फ आश्चर्य होगा की तुम रो क्यों रहे हो. ऐसा क्या हुआ है जो हमें पता नहीं था. इसलिए मुझे लगता है की मेरे चला जाना ही ठीक है. तुम्हे लगता है मैं जिद्द करके तुम्हारे साथ अन्याय कर रही हूँ; तुम्हे ज़हर दे रही हूँ और मुझे लगता है की तुम जिद्द करके, मुझसे बच्चे की चाह रखके मेरे साथ अन्याय कर रहे हो. इसलिए मेरे चला जाना ही हितकर है”

“अब तुम कुछ नहीं कह पयोगे” आवाज ने धीरे से मेरे कान में कहा

“हाँ! लेकिन बात तो हुई.” इतना कहकर मैं सरला की तरफ मुड़ा और बोलै, “चलो घर चलते हैं.” उसने मेरी तरफ देखा और हम चुपचाप वापस घर लौट आये. दोनों बिस्तर की अपनी अपनी साइड लेटकर सो गए.  सरला ने खिड़की से परदे हटाए तो मेरी नींद खुली. उसपर नज़र पड़ते ही मैंने कहा, “सरला ! चलो बात हुई और बात ख़तम हुई”

उसको क्या समझ आना था. बस मुझे कुछ बोलते देखकर वो अचंभित किसी मुर्ख की तरह बार बार जोर से आवाज़ लगाती रही, “माँ …. माँ … ऊपर आओ … माँ .. माँ “

लॉक- डाउन – दिन 4 – कहानी 4 – पार्ट १


बंद रास्तों से निकलकर

रात भर तेज़ बारिश होती रही थी. ऊपर वाले फ्लोर पर रहने के कारण छत पर पड़ रही तेज बूंदे टपा टप करती और इस शोर से उसको नींद नहीं आती. सुधा चुपचाप सो रही थी. उसकी नींद वैसे भी मेरी तरह  हलकी नहीं थी. मेरा तो यह हिसाब था की हलकी सी खटपट से टूट जाती थी. किसी ने लाइट  ऑन ऑफ की, किसी ने थोड़ी आवाज कर दी, कमरे से अटैच बाथरूम का नलका चला और मेरे नींद टूट गई.

आज सुबह तो मैं ५  के आसपास ही उठ गया. कल रात को पनीर सैंडविच ने शायद काम ख़राब कर दिया था. हो सकता है इसी वजह से नींद नहीं आयी हो. मुझे खुद पर खीज सी आ रही थी. सोच रहा था कि सुधा आज क्यों नहीं जगी अबतक। रोज़ पांच बजे के अलार्म से वो उठ जाती थी; लगभग हर रोज उसके उठने के साथ ही मुझे भी उठना पड़ता था. अगर उठकर बाहर न भी जाऊं तो भी बिस्तर पर पड़ा पड़ा करवट बदलता रहता था. आज उसके अलार्म से पहले मैं उठा और उसका अलार्म बजने से पहले ही बंद कर दिया. वो सोती रही.

बच्चों के कमरे मे गया, दोनों बहने सो रही थीं. कितना समय बीत गया कितनी जल्दी। बच्चे कब इतने बड़े हो गए. बिना आवाज़ किये बाहर चला आया. ब्रश करते हुए पूरे घर में घूमता रहा. फिर किचन में पहुँचकर चाय बनाने लगा. सुधा को चाय से नफरत जितना प्यार था. मैं चाय लेकर ऊपर गया, कमरे में बैठा, फ़ोन पर मैसेज चेक करने लगा तो उसने करवट लेते हुए कहा, “मुहं धोया या पहले चाय बनाकर लाये हो?”

“सिर्फ दूध में पत्ती डाली है. चाय नहीं है” यह मेरा स्टैण्डर्ड जवाब हुआ करता था

“हुम्म्म… ” और यह सुधा की स्टैण्डर्ड प्रतिक्रिया

“सुनो, सुरभि को कल कहानी भेजी थी ”

“कौन सी ?” सुधा ने

“जो कल तुम्हे सुनाई थी. उसका जवाब आया है”

“फिर?”

मुझे लगा शायद समय ठीक नहीं है. वैसे भी सुरभि का जिक्र आते ही मुझ में असहजता आ जाया करती थी. घबराहट, अधीरता और कुबलाहट का एक अनोखा सा भाव. सुरभि को मैं २० -२२ साल से जानता था एक समय था जब सुरभि पृथाश्री और आकाश तिवारी के किस्सों की गूँज पूरे मोहल्ले में थी

पढ़ाकू बंगाली सुरभि और एक नंबर का तिकड़मबाज आकाश.  मुँहफट आकाश और सौम्य सुरभि  शिउली के फूल जैसी सुन्दर थी सुरभि.

हम दोनों की जोड़ी हमारे मोहल्ले में तो बहुत बाद में चर्चा का विषय बनी उससे बहुत पहले कॉलेज के सर्किल में चर्चा मे आयी. सुरभि मुझसे एक साल सीनियर थी. और क्योंकि पढाई मे मुझे काफी बेहतर भी उसने दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिन्दू कॉलेज मे एडमिशन लिया था. मेरे अगले साल जो नंबर आये उसके चलते दयाल सिंह मे एडमिशन मिला. मुझे पहली बार वो एक डीटीसी बस में मिली थी और पहली ही बार मे मैंने उसे क्लास बंक करने के लिए राजी कर लिया था. उसके दिन के बाद शायद हमने उस पूरे महीने फिर क्लास अटेंड ही नहीं की. दिल्ली के सभी चर्चित पार्कों के हर पुराने गुम्बद की दीवार पर हमने दिल खींचकर अपने नाम लिखे.

उसी दौरान मुझे मच्छी की वैरायटी से लेकर हर मच्छी का अलग अलग स्वाद है, अलग अलग बनाने का तरीका – इस सब का ज्ञान मिला.

“ईलिश माछ तो बांग्लादेशी कहते हैं; वो कहाँ के असली बंगाली. हम बंगाली तो रोहू, रुई, पॉम्फ्रेट के दीवाने हैं. एक दिन तुम्हारे लिए चिंगरी लाऊंगी” बंगाली खाने पर बात में उसकी बहुत रूचि थी

आगे के २-४ महीनों मे मैंने बकर-बकर करते शायद पूरा थीसिस लिख डाला था और उसका शीर्षक था ‘बंगालन इतनी हॉट क्यों होती हैं?’- ललित कलाओं में उनकी रूचि, आजाद ख्याल मे उनका कोई सानी नहीं, पढाई लिखाई मे हमारी नार्थ इंडियन लड़कियों से यकीनन आगे, खुले विचारों वाली, बहुभाषी – हिंदी उनको आती; अंग्रेजी पिक्चर दिखा लो; बंगाली तो हैं ही. फिर मैंने कोई बंगाली लड़की नहीं देखी जिसका विवाह पूर्व एक घनिष्ट पुरुष मित्र न रहा हो- और लगभग सबकुछ मान्य. ऐसा भी नहीं की यहाँ रिश्ते की शुरुवात हुई और ६ महीने में पूछने लगें – शादी कब करोगे. शादी की तो कोई जल्दी ही नहीं. नहीं तो न सही और करनी है तो अभी नहीं.

सुरभि ही एक मात्र बंगाली लड़की थी जिसे मैं जानता था, इसलिए हो सकता है मेरी थीसिस सर्वमान्य न हो लेकिन मेरा जो अनुभव था वो ही मैं बघारा करता था.

कॉलेज मे हर कोई हमें रश्क़ से देखता था। कॉलेज के दोस्तों में यह बात थी की दोनों हम दोनों शादी करेंगे. सुरभि ने अपने पापा को थोड़ा-बहुत बता भी रखा था.

देखते देखते उसका आखिरी सेमेस्टर आ गया और प्लेसमेंट के शोर-शराबे में ये बातें दब गयीं. मुझे अभी साल भर बाकि था. उसको ग्रेजुएशन के बाद किसी अच्छी यूनिवर्सिटी मे रिसर्च का भूत सवार था. वो पता करने मे लग गयी. उसके पिता डॉक्टर थे, वो चाहते थे सुरभि पहले पीएचडी कर ले उसके बाद नौकरी करे।

मेरे पैरेंट्स को मुझसे उतनी ही उम्मीद थी जितनी एवरेज स्टूडेंट के माँ-बाबूजी  को होनी चाहिए. यह कंप्यूटर कोर्सेज का दौर था. ग्रेजुएशन के पहले साल में मेरे पेरेंट्स ने मुझे कंप्यूटर कोर्स में डाल दिया था. उनको बस इतना चाहिए था की लड़का ग्रेजुएशन करे, और हो सके तो US चला जाये.

 

 

माँ को जब मैंने पहली बार बताया था सुरभि के बारे में तो उनका टिपिकल नार्थ इंडियन जवाब था, “रंग थोड़ा दबा दबा सा नहीं है बेटा.” फिर अगले १०-१५ दिन तक अलग अलग मौके पर बोलती रही थी और सब बातों का निचोड़ इतना ही था, ” सुरभि हमारे परिवार और रिश्ते-नातों में रच-बस पायेगी क्या?”

महीने भर उन्होंने कहना शुरू कर दिया था, “और सब तो मैं सह लूंगी लेकिन मांस-मच्छी खाना तो इस घर में नहीं चलेगा”

“कोई बात नहीं,  किचन अलग कर देना” यह जवाब मै २०-२१ साल की उम्र में दे रहा था.

आखिरकार वही हुआ जो होना था. सुरभि को अमरीका की यूनिवर्सिटी में अच्छी स्कॉलर्शिप मिल गयी और वो मास्टर्स के लिए वहां चली गयी. जाते हुए उसने मुझसे पुछा था, तुम्हारा क्या प्लान है? मेरा कोई प्लान नहीं था. इसलिए मैंने तीन चार प्लान बता दिए. उनमे से एक था, मै सोच रहा हूँ ग्रेजुएशन के साथ साथ कंप्यूटर कोर्स ख़तम हो जायेगा. किसी मल्टीनेशनल में अप्लाई करूंगा और फिर में भी अमरीका.

उसके जाने के बाद पांच सात महीने तक हमारी बात चीत होती रही. वो ऑरकुट और ईमेल का ज़माना था. उसके बाद मेरा लास्ट सेमेस्टर शुरू हो गया. और आखिरकार मुझे अच्छी कम्पनी में प्लेसमेंट मिल गयी. लेकिन अमरीका वाला प्लान कभी नहीं बना.

“बोल यार क्या लिखा है उसने?” सुधा ने बेड से उठते हुए कहा.

“तुम्हारी कहानियों में कुछ होता ही नहीं. कुछ पैदा भी तो किया करो. क्या कहते हो तुम अपनी कहानियों को – न प्रेम है, न घृणा, न कोई शोकपूर्ण घटना, न पुनर्जम  और न ही तुम्हारे पात्र रंक से राजा या फिर राजा से रंक बनते हैं, न बाहरी खोज न अंतर की खोज. तुम्हारे पात्र कहीं की यात्रा भी नहीं करते. आखिर तुम्हारी कहानियों को तुम किस श्रेणी में रखते हो ?” मैंने ज्यों का त्यों उसका मैसेज पढ़ कर सुना दिया

“तो तुमने क्या जवाब दिया ?” सुधा से मुझे प्रश्न की आशा नहीं थी. मुझे था की वो कहे, सुरभि बकवास कर रही है, उसको क्या पता कहानी क्या होती है.

“मैंने इतना लिखा की मेरी कहानियां मेरे अंदर के जटिल विचारों को अपने कंधे से उतार कर रखने की प्रक्रिया का नाम है”

“तुम दोनों इसीलिए बात करते हो न क्योंकि तुम दोनों को लगता है की तुम अलग लेवल पर कनेक्ट करते हो” सुधा हमेशा यही कहती थी.

“मतलब?” मैंने पूछा

“तुम ही तो कहते हो, सुधा तुम पत्नी हो; तुमसे कुछ चुप नहीं सकता. तुम मुझे जानती हो. लेकिन मेरे अंतर में पिता, पति, पुत्र के अतिरिक्त जो बैठा है उसको किसी ऐसे साथी की तलाश रहती है जो उसे जज न करे. वो पत्नी के साथ नहीं हो सकता क्योंकि पत्नी से कुछ छुपता नहीं” सुधा से यह बात मै कई बार कर चूका था

“हाँ यह तो सही है.”

“तो सुरभि तुम्हे नहीं जानती या जानती है?”

“सुरभि मुझे जानती है लेकिन नहीं जानती. मतलब उसको पता है आकाश कौन है लेकिन क्योंकि वो मेरे साथ नहीं रहती, इसलिए हमारे बीच सिर्फ उतना ही साझा है जितना हम साझा करने को राजी हों. ऐसे में कई बार सुरभि और आकाश बात तो करते हैं लेकिन उस समय वो सुरभि और आकाश नहीं होते. मुझे कुछ अलग बनकर और उसे कुछ अलग बनकर बात करने का मौका मिलता है” मैंने कहा

“मुझे कभी सुधा के आलावा कुछ और बनने की चाह नहीं होती.” उसने बोला और फिर खुद ही शायद सोचने लगी. ब्रश करते हुए उसने इशारे से कहा, “फिर उसने जवाब दिया?”

नहीं अभी अमरीका में तो रात होगी. मैंने अभी अभी जवाब लिखा है. शायद शाम को जवाब देगी. खैर….

“और भी किसी को भेजी थी?”

“हाँ. ऑफिस में कुछ लोगों को, कुछ लोगों ने जवाब दिया है. वही नार्मल टाइप – अच्छी है, बहुत बढ़िया टाइप” मैंने कहा

“और किसे भेजी ?” सुधा जानती थी मैंने राधा को भी भेजी होगी

लॉक- डाउन – दिन ३ – कहानी ३ – पार्ट १


बातें

((महानगरीय जीवन और छुट्टियों से प्रभावित)

पंकज को लगता है उसका  दिमाग एक छलनी की तरह काम करता है; कभी कभी उसकी छलनी बड़े बड़े छेदों वाली हो जाती है जिसमे से पुरानी यादें थप करके गिरती हैं और वो उन यादों की मिठास खटास में खुद को घोल लेता है. फिर कभी ऐसा भी होता है की छलनी इतनी महीन छेदों वाली होती है की याद आती तो है की कुछ हुआ था लेकिन पूरा किस्सा याद नहीं आता. ऐसे समय में वो खुद से सघर्ष करने लगता है.

“राजे, वो याद है एक बार हम गए थे … अ…. याद नहीं आ रहा ” उसने अपनी पत्नी की तरफ देखकर पुछा. शिवांगी को वो राजे बुलाता था

“कहाँ?”

“यार याद नहीं आ रहा. वो था न एक… याद नहीं आ रहा… यार वो बात हुई थी न … की कुछ दिनों के लिए उसको जीवित कर लेना जिसके बारे में जानते हैं वापस लौटने के बाद उसकी हर इच्छा का गला घोटना पड़ेगा बहुत अच्छा लगता है” उसने शिवांगी की मदद मांगते हुए कहा

“हैं? किसको जिन्दा कर लेना” शिवांगी ने रसोई में चलती चिमनी को एक बार बंद किया की ध्यान से पंकज की बात सुन पाए, “फिर से बोलो क्या बोल रहे थे, चिमनी की आवाज में कुछ सुनाई नहीं दिया”

“यार ध्यान है हम गए थे कहीं… जहाँ हमने यह बात की थी. शाम को हमने एप्पल सूप पिया था और होटल लौटते हुए पूरे सेंटी टाइप हो गए थे…. वहीँ तो हुई थी यह बात … ध्यान है न… कहा नहीं था की कुछ दिनों के लिए ही सही लेकिन यह छुट्टियां हमे “मैं” होने का चांस देती हैं…. वो जगह कौन सी थी यार…. याद है? ” पंकज दिमाग के साथ जद्दोजहद में लगा था, की कहीं से एक छेद भर बड़ा हो जाये और छलनी से वो जगह टपक आये

“यह तो हम हर छुट्टी पर कहते हैं. कहाँ वक़्त है रोज की दौड़ में खुद से मिलने का, छुट्टियां ही तो होती हैं जब अपने से मिलते हैं …..कहीं कूर्ग की बात तो नहीं कर रहे” शिवांगी ने कढ़छी चलाते हुए कहा

पंकज की माँ शिवांगी के साथ ही किचन में लगी थी, धीरे से उनहोंने कहा, “वैसे कूर्ग का ट्रिप बड़ा अच्छा रहा था. नहीं?”

“अभी २-३ दिन पहले मेरे फेसबुक पर फोटो आयी थी उस ट्रिप की. वो होता है न फेसबुक का फीचर पुरानी फोटो फिर दिखाने का. दोनों बच्चे ऐसे लग रहे थे जैसे कितने छोटे हों”

“तीन साल पहले की ही तो बात है” माँ ने कहा

“नहीं माँ, पांच साल हो गए. तीन साल पहले तो उदयपुर गए थे.”

“कैसे टाइम निकल जाता है, नहीं ” माँ और शिवांगी बात करते जाती थीं और अपने अपने हिस्से का काम भी निकल रहा था

“एक और निकल गया. टोटल १२ हो गए” दूसरे कमरे से शंकरनाथ जी बोले, “यह बढ़ेगा अभी, पूरी दुनिया को लेकर जायेगा”

“हैं राजे, याद आया?” पंकज लगातार याद करने की कोशिश कर रहा था

दोनों महिलाएं एक साथ बोलीं, दोनों अपने अपने पति को उनके हिस्से का जवाब दे रही थीं

“तुम यही देखते रहो. सुबह से लगे हो इसीमे. डिप्रेशन ही हो जाये बन्दे को”  माँ ने कहा और ठीक उसी समय शिवांगी बोली “यार नहीं याद आ रहा. अभी आराम से बैठेंगे तो बात करते हैं, यह काम के बीच में तुम नयी कहानी मत शुरू करो.”

“ले मैं तो सिर्फ बता रहा हूँ की यह फैलता जा रहा है. सही किया मोदी ने जो देश बंद कर दिया. यह तो सन ४७ वाली हालत होती जा रही है” शंकरनाथ बोले

“हैं? क्यों दंगे हो गए ?” माँ ने किचन से ही जवाब दिया

“दंगे ही होंगे अगर ऐसे ही चलता रहा तो. लोग मान ही नहीं रहे. मेरे दादाजी बताते थे ४७ में भी किसी को कुछ पता ही नहीं चला. सब सोचते रहे कुछ नहीं होगा; लोग एक दूसरे के दुश्मन थोड़ा ही हो जायेंगे, और फिर सरकार भी तो है….”शंकरनाथ अपनी बात कर रहे थे और शायद सिर्फ माँ सुन रही थीं. पंकज कमरे से उठकर शिवांगी के पास किचन में आ गया था. उनकी अगल से बातें चल रही थीं

“यार नहीं आ रही याद मुझे … क्यों पूछ रहा है अभी .. क्या करना है ?” शिवांगी के पास फुर्सत नहीं थीं

“नहीं मुझे याद है उस ट्रिप में हमने यह बात बार बार की थीं. होगा तो हाल फिलहाल का ही ट्रिप. शादी के पहले कुछ सालों में तो यह ख़याल नहीं आता था हमें. यह तो जब से हम दोनों थोड़े ज्यादा बिजी हुए हैं तभी से समय की कमी लगने लगी है”

“हम्म …”

“लो हर की पौड़ी भी बंद कर दी. वहां स्नान पर पाबंदी लगा दी सरकार ने” शकरनाथ वैसे भी घर के ब्रेकिंग न्यूज़ जैसे थे. टीवी की नयी खबर से लेकर, ब्लॉक के हर घर की खबर शाम सवेरे वही मौज ले लेकर बताया सुना करते थे

शिवांगी और माँ ने फिर एक साथ बोला; एक ने शंकरनाथ को, “वैसे भी कौन जा रहा है ऐसे समय में हर की पौड़ी?”

“यार पंकज खाली होकर बात करते हैं, अभी बहुत काम है … एक काम कर ऊपर मशीन से कपडे निकल कर जरा छत पर डाल आ. सूख जायेंगे ”  शिवांगी को पंकज की बात में फिलहाल कोई दिलचस्बी नहीं थी

पंकज उसी उधेड़बुन में सीढ़ियों से ऊपर आया, मशीन से कपडे निकले और छत पर सुखाने के लिए ले गया

“ये पूछ क्या रहा है?” नीचे माँ शिवांगी से पूछ रही थीं

“खाली है, बैठे बैठे कुछ आ गया होगा दिमाग में. मेरा सर खाये इससे अच्छा मैंने कपडे सुखाने भेज दिया” शिवांगी काम मे व्यस्त थी

पंकज कपडे रस्सी पर डालता जाता था और सोचता जाता था की सारे दुखों की शुरुवात वहीं से होती है जहाँ से छुट्टियों के वो दिन ख़तम होते हैं. छुट्टियों के फ़ौरन बाद हम दोनों ही अपनी रसहीन जिंदगी दोहराने लगते हैं. हम जीवित तो रहते हैं लेकिन वो जीवन रसहीन होता है.हम जीवित तो रहते हैं लेकिन वो जीवन अपना जीवन होता ही नहीं. कई बार तो इसलिए छुट्टी लेनी पड़ती है की कहीं हमारा रिश्ता ही बेमानी न हो जाये.

पंकज को एकदम से वो किस्सा याद आया. एक बार तो हद ही हो गयी थी. राजे ने उसके सिरहाने के पास पड़ी किताब उठाई और बोली, यह क्या पढ़ रहे हो?

“कोठागोई – प्रभात रंजन की किताब है ”

“जिस्म्फ़रोशी के किस्सों वाली किताब ?”

“क्या बकवास कर रही हो ? ”

“तुमने ही तो कहा कोई कोठा वोठा वाली किताब है. एक बात बताओ, क्या तुम बदल रहे हो?”

“नहीं ”

“क्या तुम्हारी जिंदगी में कोई लड़की है ?”

“नहीं ”

“आ भी गयी है तो कोई परेशानी नहीं है. एन्जॉय करो, बल्कि मैं तो कहती हूँ … ”

“मान लो कोई आ गयी तो ?”

“तो क्या… तुम्हारा जीवन, अपने जीवन पर इतना बोझ क्यों ढोते हो? … ”

“तुम एक्सेप्ट कर लोगी?”

“यह सोचकर किसी को चाहोगे की मैं एक्सेप्ट कर लूंगी या नहीं ?”

पंकज को याद आया की उसने जल्दी से कहा था “नहीं कोई नहीं है …” लेकिन उसको यह भी याद आया की उस समय वो सोच रहा था की कैसे हो गए हैं शिवांगी और वो. तभी छलनी में से एक और पूर्व घटना टपकी… शायद उसी रात की थी. पंकज ने कहा था

“कभी कभी कुछ ज्यादा ही मांग होती है ”

“सेक्स की?”

“हुम्म्म !!” उसने बेहद धीरे से कहा था

शिवांगी ने धीरे से उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा था, “स्वाभाविक है पंकज. हमारी व्यस्तता हमको एक दुसरे के लिए समय नहीं दे रही. हमको कुछ दिन की छुट्टी लेनी चाहिए”

उसके बाद ही तो कूर्ग का प्लान बना था. और वो ट्रिप भी उन दोनों के लिए एकांत नहीं लाया था. माँ – पापा से उन दोनों ने पुछा की वो चलना चाहेंगे तो वो फट से राजी हो गए. पूरे परिवार के साथ छुट्टी का अपना मजा था – इसमें कोई शक नहीं – लेकिन पति पत्नी का एकांत नहीं था

पंकज कपडे डालकर नीचे वापस आया तो शंकरनाथ और माँ के बीच टीवी पर चल रही ख़बरों की ही बात चल रही थी. शिवांगी अपने हाथ पौंछ रही थी, तौलिया वापस हैंडल में टांगते हुए उसने पंकज से कहा,

“हम क्या बोल रहे थे तुम? अब बताओ”

“यार एक एक बार हम कहीं गए थे. मैं और तुम; शायद बच्चे भी नहीं थे ….”

“बच्चों के बिना हम तभी गए थे जब बच्चे नहीं थे” और शिवांगी मुस्कुरायी

“नहीं यार, शायद एक बार कहीं गए थे. हो सकता है फिर की बच्चे होटल रूम में ही हों और हम बाहर निकल गए हों ….”

“सिर्फ एक बार नैनीताल में ऐसा हुआ था. हम बाहर निकले थे बच्चों को रूम में छोड़कर. दोनों डिनर के लिए निकले थे; लेकिन फिर मन नहीं हुआ तो सिर्फ एप्पल सूप पी कर वापस आ गए थे” शिवांगी को जैसे सब ठीक ठीक याद था. सिर्फ छलनी का खेल है; कभी कभी जो आपकी छलनी से नहीं छनता वो आपका साथी यूं ही क्षण भर में बता देता है

“यार हम क्यों गए थे नैनीताल; कुछ याद है ?” पंकज का सवाल बड़ा अटपटा था

“क्यों गए थे? मतलब. बच्चों की छुट्टियां थीं, तो सोचा होगा कहीं घूम आते हैं. इसीलिए गए होंगे”

“नहीं यार, कोई और भी कारण था”