लॉक डाउन राइटर के दोस्त सीरीज में आज महक शर्मा की कविता


लॉक डाउन राइटर के दोस्त सीरीज में आज हरीश कनौजिआ की कविता


खबर


कोई अपनी बीवी की लाश
ढोता हो अपने कंधे पर
तब भी जब बहुत सारे कैमरे उसको देख रहे हों
इसमें खबर कहाँ है ?

उसकी बेटी के रोते चले जाने को देखकर
रुदन या करूण भाव
जो पिघला दे आपका कलेजा
इसको खाने की टेबल पर परोसा जाये रोज शाम ९ बजे
इसमें खबर कहाँ है ?

खबर यह है की हममें से कुछ
इसको खबर मानते हैं
और खबर के बाद अगली खबर की
तरफ रुख कर लेते हैं

अफवाह


अफवाह की तो उम्र होती है
सो उसकी उम्र के बाद
जब दीवारों पर खिड़कियाँ निकल आएंगी
और प्रकाश तैरने लगेगा हर कोने से कोने तक
तब क्या करोगे ?
क्या तुम फिर एक अफवाह का सहारा लोगे ?

चलो उसकी छोड़ो
तुम कब तक ठगे जाते रहोगे?
क्या तुम्हे अफवाह और सच में फ़र्क़ करना नहीं आता?
या फिर फिर ठगा जाना अच्छा लगता है।

महानगर का जीवन


बहुत सारे सच सुन लेने के बाद
मन में भरा शोक
झूठ के एक डोज़ से हर्षित हो उठता है
सच थोड़ा कम जमा झूठ थोड़ा ज्यादा बराबर
महानगर का जीवन

पॉपकॉर्न


पांच रुपये का पॉपकॉर्न
२५० रुपए में खरीदा
खरीदे भी २ पैकेट
टिकट १७० की पॉपकॉर्न २५० का
कुल ५६०, जी अस टी के बाद
सिर्फ पॉपकॉर्न के लिए
अब लगता है सादगी के बदले
दिखावटीपन का सौदा
घाटे का सौदा रहा
हम सबके लिए

सफ़ेद – काला


तुम्हारी काले कपडे पहनने की आदत
तुम्हे कहीं का नहीं रखेगी
काली शर्ट पर पड़ा काला दाग
ऐन काला नहीं होता
दिखेगा और तुम छुपा नहीं पाओगे

तुम सफ़ेद पहना करो
सफ़ेद पर काला दाग
साफ़ दिखता है
कौन मानेगा तुम्हारे सफ़ेद चरित्र पर दाग
तुम बच जाओगे
तुम्हारे समर्थन में सफ़ेद खड़ा हो जायेगा

जय श्री राम


पुरखे भी बोलते थे जय श्री राम
सुबह उठकर
एक-दूसरे को अभिनन्दन, अभिवादन, शुभकामनायें देते
सलाम, स्वागत और जयध्वनि में
लगी थी क्या कभी कहीं आग, “जय श्री राम” बोलने पर?
लेकिन जब
जय श्री राम नारा हो गया
नारा-ए-तकबीर अल्लाह हो अकबर की तर्ज पर
हमने जैसे घोषणा कर दी
हम भी भयभीत कर सकते हैं

किताब पर धूल


काम करने जो आती है

वो किताब झाड़कर, सलीके से नहीं रखती

फेंकती है;

अगर कभी समझ जाय की फैंकने से ही सारी परेशानी शुरू होती है

न दिमाग पर और न किरदार पर कभी धूल बैठे

कविता


पीछे छूटा बचपन हर शाम बगल मे बैठ पूछता है – तो कहाँ पहुंचे ?
और मेरे बच्चों को मैं “वहां” पहुँचने की हिदायतें दिया करता हूँ

कविता


दिखाई देना
होना नहीं होता

क्योंकि दिखाई देना तो कहीं भी हो सकता है
होता भी है

लेकिन
होना तो
बस यहाँ ही होगा

 

!! स्वागत है 2017 : अलविदा 2016 !!


 

साल मोमबती सा
पिघलता रहा

और हमने
उसके कुछ आखरी क्षणों में
एक नयी मोमबती
उसी की लौ की मदद से
उसी पर टिका दी

साल नया आया और साल पुराना
उसी में घुलमिल सा गया

 

नशा


25-dec

जनता हूँ
यह जो आजकल
कुछ आवाजें सुनता हूँ आसपास
मौत है

जनता हूँ
खुद को राख होते देखना
है सजा उस जुर्म की
जो मैं जनता था मैं कर रहा हूँ

जनता था वह मौत है
पर मैंने उसे काश भर काश
बड़े अंदाज से पिया
तुझसे बचने के लिए बेहोश रहा – जिंदगी

पर जनता हूँ
तुझे मुश्किल रस्ते बनाने के जुर्म में
कोई सजा नहीं मिलेगी
और
उनपर चलने से इंकार करने की सजा
मैं भुगत रहा हूँ

25-dec 2

शेरा वाली माता की जय


“मीरा भोजन कर
धीरे धीरे भोजन कर
भोजन करके भजन भी कर”

मास्टर जी भजन क्या होता है

इसपर हमें तमाचा पड़ा
भजन का अर्थ गुप्त कोष में ही रहा

बड़ा होकर हमने कद पाया
धंधे का जब समय आया
तो विद्वान ने समझाया
‘सचिन’ भजन कर
बड़ा ही चालू धंधा है
साथ में चंदा है
भोजन भी मिल जाता है
यानी पेट भर जाता है

भजन का अर्थ

बीच सड़क तम्बू लगवाओ
दो दबंग तीन चार महिलाओं को बिठाओ
गाला फाडू कान उखाड़ू आवाज निकलवाओ
लॉउडस्पीकर प्रयोग में लाओ

भजन सुनाऊ?

तड़ तड़ ताड़ ताड़ ताड़
धुम धुम धूम धूम धूम
तड़ ताड़ धुम धाम धाम

शेरा वाली माता की जय

poem 1

Poem XX: स्मृतियाँ


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बंद दरवाजे के भीतर

पुरानी स्मृतियाँ

सरसराहट पैदा करती हैं

 

मनो पुराने फैसले पर

कहकहे लगा रही हों

और कह रही हों

‘हम पहले से न कहती थीं?’

विल वर्क फॉर फ़ूड


Poem 2

माँ कहती है
गरीबो की मदद किया करो
मैं जेब की चिल्लड़
कभी कभी बाँट दिया करता हूँ

पिताजी उनके हक़ मैं मोर्चे किया करते हैं

दोस्त केले वाले का टोकरा
उनके सर पर रखवा कर दुआ ले लेते हैं

नेताओं ने स्कीम बहुत सी निकाली हैं
शायद भला भी हुआ हो

बाकि बात सिर्फ इतनी है
चुगने वाले ज्यादा हैं
और
चुगने को दाने बहुत कम

poem 3

Poem XVIII: बहुत समय हुआ अब कलयुग भोगते


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समय यदि गोलाकार पथ पर परिक्रमा करता है

तो

मैं चाहूंगा कि आज के दिन उसकी परिक्रमा पूर्ण हो

 

फिर कल से वह जब अपनी नयी परिक्रमा प्रारभ करेगा

तो पुनः सतयुग का प्रारभ होगा

बहुत समय हुआ अब कलयुग भोगते

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Poem XVII: ‘वो भी होगा यहाँ!’


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जब वो पहले यहाँ आती थी

आते ही कहती थी

अरे ! वो भी है यहाँ

अब

वो यहाँ से निकलती है

तो अन्दर नहीं आती

न आने का कारण वो बतलाती है

‘वो भी होगा यहाँ!’

Poem XVI: चाहो तो गिरा दो चाहो तो अपना लो


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बाप ने भेजा है एक विशेष गुप्तचर

पता लगवाने हेतु

कि आखिर उस गुप्प अँधेरे में कौन है?

 

खबर आयी है

अवांछित है

सास ने सुझाया है

चाहो तो गिरा दो चाहो तो अपना लो

 

माँ जानती है उस अवांछित की नियति

बाप की चाहत पर निर्भर है

चाहो तो गिरा दो चाहो तो अपना लो

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Poem XV: चुनाव का मौसम आया (लम्बी कविता)


For part I of the poem : https://sachinmanan.wordpress.com/2014/03/21/poem-xiv

For part II of the poem : https://sachinmanan.wordpress.com/2014/03/20/poem-xii

सैलाब के समय में

इन्द्रसभा में एक मामला आया था

मंगल पर जीवन अंकुर फूटना चाहिए या नहीं?

किन्तु

नए कार्यालयों को कार्यान्विन्त करने के चकार में

यह मामला बीच में ही अटक गया

 

धरती वासी विस्मित न हो

‘अटकना’

यह कला इन्द्रसभा ने हम से ही सीखी है

 

 

कार्यालय तो तब से अब तक कई खुले हैं

समस्या कि विकटता और पांच साल के भीतर निवारण से

पार्टी पार्टीकोश को क्या फायदा होगा

यह सबसे बड़ी कसोटी होती है

सब जानते हैं इस विषय पर बहस फज़ूल होती है

 

मसीहा अवतार पैगम्बर कार्यालय के अंतर्गत

एक नया कार्यालय पिछली ही सदी में खुला है

यह कार्यालय परिस्थितियों को ध्यान रखकर

कार्यसूची तैयार करता है, फिर पाठयक्रम में तब्दील कर

प्रोढ़ अवतार मसीहा को पढ़ाया भी जाता है

आश्चर्य

पाठ के अंत में बार बार

ॐ शांति का पाठ दोहराया जाता है

 

धरती वासी विस्मित हों, पूछें मुझसे

“अचरज  कैसा?”

मैं कहूंगा

शांति का पाठ पढ़ाया गया क्रांतिकरियों को

शांति और क्रांति के बीच

यह लटकते नहीं रह जायेंगे

कभी दायें

कभी बायें

कभी दायें

कभी बायें

तो कभी कहीं नहीं

यह ही न करते रह जायेंगे

 

इलाज है इसका भी तर्कशक्ति के पास

आप महाराणा कि संतान है

यकीन जानिए शुद्ध फौलाद हैं

अच्छा नहीं तो बुरा भी न कहिये

जाइये संकट मोचन का पाठ करिये

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर

जय कपिश …..