गुलाब और मनहारी का प्यार


 

मनहारी – गुलाब का प्यार

(गुलाब है एक लोकल लीडर और मनहारी है गुलाब की रखै।दुनिया को तो यही रिश्ता पता है। लेकिन दुनिया को कहाँ पता होता है की रिश्ते की परिभाषा इतनी सी नहीं होती। आपको लगता है की आप जानते हैं रिश्तों की परिभाषा ? तो चलो सुनते हैं गुलाब मनहारी का प्यार)

प्रिय पाठको! इधर-उधर के तमाम किस्से सुनकर आप सचमुच ऊब गये होंगे. कहाँ कहाँ के किस्से आपसे साझा करता रहता हूँ. और हाल फिलहाल के सारे किस्से सिर्फ मौत, दुःख की चाशनी में डूबे. कितनी देर कोई इस चाशनी का स्वाद चखे. आज कुछ अलग.

तो किस्सा शुरू होता है वर्ष २०१३ की सबसे बड़ी घटना से. गुलाब की रखैल जोन-५ की विधान सभा से विधायिका हो गयी. विधायिका के चुनाव से ठीक साल भर पहले गुलाब ने पूरा जोर लगा दिया की जोन-५ को महिलाओं के लिए आरक्षित सीट की लिस्ट में शामिल करवा दे. सब जानते हैं उसने यह अपनी रखैल के लिए ही किया. मनहारी के लिए यह सब करके गुलाब ने उसका तन-मन फिर से एकदम नए रूप में जीत लिया.

बात सिर्फ मनहारी के तन को जीतने भर की नहीं थी, गुलाब ने इसके साथ साथ मुसलमानों, पासियों और निचली जातियों में अपनी जगह पुख्ता कर ली. विधान सभा का आरक्षण बदला. जब से जोन-५ विधान सभा बनी तब से यहाँ से सवर्ण ही जीतता आया था. सरकार से इसे “महिलाओं के लिए आरक्षित सीट” करवाकर और उसपर मनहारी जैसी मुसलमानी को जितवाकर गुलाब ने सवर्णों का वर्चस्व कम किया, अपने लिए लोक सभा की टिकट निश्चित और जीत पक्की कर ली. सवर्णों के वोट तो गुलाब को मिलने ही थे. जोन-५ के सवर्ण कोई पंडित थोड़े थे; जैनियों का बोल बाला था. गुलाब खुद जैन स्थानक का चेयरपर्सन था. बस एक इस चाल से उसने अपने प्रतिध्वंदियों को मात दे दी.

लेकिन आप यकीन मानिये कि यह भी वो किस्सा नहीं था जो मैं आपको आज सुनाना चाहता हूँ. मनहारी ने गुलाब को अपना तन मन कब और कैसे दिया किस्सा वहां से शुरू करते हैं. बात उन दिनों की है जब गुलाब ने जोन-५ विधान सभा और उसके आसपास की हर छोटी बड़ी बात पर नज़र रखनी शुरू ही की थी. गुलज़ार-नाई, की दुकान के बाहर पड़ा दीवान उनका अड्डा होता था. वहीँ से वो थाना-तहसील, ब्लाक-कचहरी आदि के काम निपटाया करते थे. इलाके के दूसरे बड़े नेता, जोरावर सिंह के खिलाफ अपनी सियासी जमीन खड़ी करने की शुरुवात यहीं से हुई थी.

शायद १९९२ का दशहरा रहा होगा जब आयोजन को लेकर गुलाब और जोरावर सिंह के गुटों में बहस हुई. जोरावर सिंह का दल जोन-५ के पार्क में हर साल रामलीला करवाता था. इस बार गुलाब के दल ने पार्क पहले बुक करवा दिया. खटपट इतनी बढ़ गयी की जोरावर सिंह ने एलान कर दिया की अगर गुलाब ने रामलीला के लिए पार्क उसके दल को नहीं दिया तो गोली चल जायेगी. और गोली चली. गुलज़ार ने चली हुई गोली गुलाब को नहीं लगने दी. खुद बीच में आ गया. मुसलमान गुलज़ार की वहीँ मौत हो गयी और अस्पताल में उसकी लाश पर रोती उसकी पत्नी मनहारी पर गुलाब की पहली बार नज़र पड़ी.

मनहारी को तब कहाँ सुध थी की कहाँ उसका पल्लू, कहाँ उसकी ओढ़नी. वो तो रोती जाती थी और गुलाब को कैद करती जाती थी.

ऐसा नहीं था मनहारी पर सिर्फ गुलाब की नज़र पड़ी थी. हुआ कुछ ऐसा था की गुलज़ार के छोटे भाई ने अपनी भाभी से गुलज़ार के शहीद हो जाने के कुछ साल भर बाद, यानी १९९३ के जाड़े में कहा. “अब ऐसी जानलेवा जवानी पे ईमान न डोल जायेगा भाभी. ज़माना कोई ठीक तो नहीं. हम कौन खाये जाते है तुम्हे. हम तो रक्षा की ही बात करते हैं. दिरानी जेठानी वैसे भी तो रह ही रही हो एक छत के नीचे.”

गुलज़ार के छोटे भाई की हमदर्दी और नसीयत मनहारी को पसंद नहीं आयी. और यहीं गुलाब ने मनहारी को बड़ा सहारा दिया. उसके हक़ के लिए खुद थाना-पुलिस तक उसके साथ साथ गए. इधर उधर की साथ लगाकर मस्जिद के मौलवी तक को समझा दिया की मनहारी को अपनी आज़ादी मिलनी चाहिए. मौलवी भी जान गए की गुलाब अब इलाके के उभरते आफताब हैं. गुलाब ने जो मनहारी के लिए किया उसके बाद उनका छोटी जातिओं और मुसलमानों में भरोसा और पैठ गया.

गुलाब जब भी जोन-५ के दौरे पर निकलते मंगोल पूरी डी ब्लॉक जरूर जाते. मनहारी के खसम गुलज़ार ने उनके लिए शहीदी दी थी, इसलिए डी ब्लॉक का पार्क “शहीद गुलज़ार कुटिया” हो गया था. यहाँ गुलाब कि परमानेंट बैठक थी. हफ्ते में ३-४ बार गुलाब ३-४ घंटे यहीं बिताते, मनहारी कभी चाय ले आती, कभी हुक्का- पानी पूछने चली आती. कभी यूँ ही बैठी बैठक की बातें सुनती रहती.

१९९४  के जाड़े तक मनहारी के खसम को मरे २ साल बीत चुके थे, मुश्किल से २५ की मनहारी दो जाड़े  पति के बिना निकाल चुकी थी, धीरे धीरे गुलाब की निगाह समझने लगी थी, और गुलाब की निगाह का मजा भी लूटने लगी थी

मनहारी जितने दिन तनहा रह सकती थी रही, तनहा रहती मनहारी ने समझदारी भी सीख ली थी. घर में देवर देवरानी का डर था. गुलाब ही मददगार थे; अतः मनहारी को पसंद आने ही थे. एक दिन गुलाब ने मनहारी के सर पर हाथ रखा, वो कुछ नहीं बोली, फिर एक दिन कंधे पर हाथ रखा, वो कुछ नहीं बोली. और फिर छाती पर. मनहारी ने उसके हाथों को अपने दोनों हाथों से दबा लिया.

फिर उसकी २ साल से अकड़ी पड़ी देह, कितनी ही बार नरम पड़ी इसकी अलग अलग लोग अलग अलग संख्या देते हैं. १९९५ के जाड़ों से शुरू हुआ यह सिलसिला १९९६ के जाड़ों तक बिना रोकटोक और बिना किसी तकलीफ के चलता रहा.

१९९६ के जाड़ों में पार्टी ने आने वाले विधान सभा चुनावों के लिए प्रत्याशी चुनने का काम शुरू किया. जोन-५ से दो दावेदार थे. जोरावर सिंह और गुलाब . पार्टी ने अपने पुराने गद्दावर नेता जोरावर सिंह की जगह गुलाब को टिकट दिया. जोरावर सिंह के लौंडों ने मनहारी का नाम गुलाब की जोरू कहकर खूब उछाला. लोगों ने भी खुलकर चुटकी ली.

गुलाब घबराये नहीं. जवाब में उनहोंने मनहारी को फटाफट से मंगोल पूरी वार्ड की महिला समिति की अध्यक्षा नियुक्त किया. मनहारी का काम था इलाके की पासी और चमार औरतों को पार्टी से जोड़ने. मनहारी दुनियादारी समझने लगी थी और किसी चौके की आपसी, छोटी मोटी लड़ाई को भी कैसे अपने फायदे की लड़ाई बनाना है उसको अब आता था.

१९९७ में मनहारी ने खूब काम किया, मंगोल पूरी से बाहर निकलकर उसके साथ सटे चमारों के इलाके विजय विहार तक उसकी पैठ पहुँच गयी.

और फिर १९९८ का विधान सभा चुनाव आया. गुलाब जीत गया और इसमें गुलाब की जोरू, यानी मनहारी का परिश्रम बड़ा काम आया

यकीन मानिये मैंने जो अबतक किस्सा सुनाया है, अरे यही मनहारी और गुलाब वाला, यह वो किस्सा नहीं है जो मैं आपको आज सुनना चाहता हूँ. यह तो बस उस किस्से की भूमिका के लिए जरूरी है. असल किस्सा तो १९९८ की जीत के बाद शुरू होता है

मनहारी ने विधान सभा चुनाव से ठीक १ साल पहले, यानी १९९७ में, विजय विहार में “कामवाली कमिटी” बनवायी थी. पूरे जोन-५ में कामवालियों के रेट वही तय करती थी.

“एक माले की सफाई के २००, ४ जन वाले परिवार के बर्तन के ३०० और उसके ऊपर ५००; बच्चों को भी गिना जायेगा”. यह स्टैण्डर्ड रेट कार्ड था जोन-५ की कामवालियों का. इसपर तुर्रा यह, “२६ मीटर वाले घर का रेट कोठी वाले घरों से अलग. कोठी के १००० एक्स्ट्रा”

कामवालियां उसकी मुरीद थीं. और चाहे घर के बाहर कुछ लगे लेकिन घर के अंदर कामवालियों के मरद अपनी कामवालियों के. १९९८ में गुलाब जीता या मनहारी ने उसको जिताया इसपर क्या बहस. जोरू मरद के लिए माथे का पसीना एड़ी से बहाये यह क्या नयी बात है. यहाँ से गुलाब का रामराज्य शुरू हुआ जोन-५ विधान सभा क्षेत्र में.

१९९८ की जीत के बाद मनहारी गुलाब की जोरू कहाने लगी थी; रखैल कब हुई वो बाद की बात है. गुलाब की जोरू का रुसुक विजय विहार, मंगोल पूरी के हर थाने, हर राशन की दुकान पर था.

राशन का किस्सा कुछ यूँ था, की सरकार माई-बाप ने २ रंग के राशन कार्ड बना दिए थे. सफ़ेद रंग का राशन कार्ड उनके लिए जो सरकारी खाते में “गरीबी रेखा से ऊपर वाले परिवार” श्रेणी में आते थे. गुलाबी रंग का राशन कार्ड उनके लिए जो सरकारी खाते में “गरीबी रेखा से नीचे वाले परिवार” श्रेणी में आते थे.

कौन सा कार्ड आदमी के पास है उसके हिसाब से चीनी, गेहूं, चावल आदि मिलता था. मनहारी का शुरू शुरू का कमाल यह रहा की वो सफ़ेद श्रेणी को गुलाबी श्रेणी का कार्ड दिलवा सकती थी. केरोसिन और कोयले की जरूरत पासियों, चमारों, धोबियों को बहुत थी. गुलाबी कार्ड की कीमत सब जानते थे.

सन २००० आते-आते लोगों ने मनहारी को “गुलाबबाई” बुलाना शुरू कर दिया था.  एक बात खूब चली थी, “गुलाब की जोरू गुलाबीबाई से मिल ले; काम करवा देगी तेरा”

सन २००० आते आते एक बात और हुई थीं मनहारी के जीवन में. देवर से उसकी भी सुलह हो चुकी थी. घर का आदमी घर का होता है की तर्ज पर मनहारी ने देवर को राशन कार्ड के सामाजिक काम मे लगा लिया था. देवर को भी अब ३२ साल की मनहारी के बदन से क्या लेना था.

देवर ने खूब मदद की मनहारी की. मनहारी के कमाल को उसने अगले चरण में पहुँचाया. जिनके पास कार्ड नहीं था, उनको कार्ड बनवा कर देने का सामाजिक कार्य उसने शुरू किया. जिनको कार्ड मिलना ही नहीं चाहिए था उनकी भी मदद की. विजय विहार से सटे रिठाला में कई जाट परिवार थे जिनके पास धन की कमी नहीं थीं लेकिन उनके पास भी गुलाबी कार्ड थे. रिठाला के पीछे उनके खेतों के टुल्लू पम्पों को केरोसिन चाहिए था. देवर ने खूब मदद की उनकी

आमदनी का सर्टिफिकेट और कार्ड बनवाने के लिए हर छै महीने में मनहारी और उसकी टीम ने कैम्प लगाने शुरू किये. भारी भीड़ उमड़ती थी इन कम्पों में.

२००१ तक मनहारी को समझ आ गया की बहुत भरी संख्या में जोन-५ विधान सभा क्षेत्र में बिहारी, यु पी के मजदूर, बांग्लादेशी नेपाली लोग बसने लगे हैं. और यहाँ से छटपर्व पर मंगोल पूरी मे माता की चौकी का सिलसिला शुरू हो गया. लगातार १० साल तक यह सिलसिला चलता रहा – एक मुसलमान औरत माता की चौकी करवाती है – यह बात पूरे जोन-५ में मनहारी के रसूक को बढ़ाने के लिए लाभदायक थी

अगर आपको मुगालता है की यह सब मनहारी के दिमाग का कमाल था तो याद रहे वो गुलाब की रखैल है. एक किस्सा याद आता है. एक दिन गुलाब ने मनहारी से कहा था,

“नाइन, लोग-बाग अपनी आमदनी का सबूत जुटाने की जुगत में ही झुरा रहे है. वो महीने भर में किस-किस काम से कितना कमाते हैं और उनकी रोटी का जुगाड़ कहाँ से होता है इसका ठीक-ठाक जवाब उनके पास नहीं है. सो उनकी मदद करो नाइन. तुम ही हो जो लेखपाल को इन लोगों के कंगाल होने का यकीन दिलाओगी. तुम कलाकार हो नाइन; जैसे हमको यकीन दिलाया की हमारे बिना तुम असहाय मर ही जाओगी, वैसे ही लोगों को यकीन दिलाओ की यह काम इस इलाके में कोई करवा सकता है तो सिर्फ हमारी नाइन”

मनहारी को और किसी की समझ आये न आये गुलाब की बात समझ आती थी. इस मौके पर उसने अपना भी एक काम निकलवाना ठीक जाना, बोली

“एक बात कहूं बड़े साहिब. अब हमारा भी दफ्तर होना चाहिए साहिब. क्या यह की सारा दिन हम घर पर ही बैठक बिठाये हैं; आप आते हैं तो देखते नहीं देवर जी कैसे आँखे तरेरते हैं. आपको आने जाने में जो दिक्कत होती है न साहिब वो हमें अच्छी नहीं लगती”

शहीद गुलज़ार वाटिका याद है न आपको. वहीँ ६ कमरे वाली एक लाइब्रेरी विधान सभा फण्ड से २००२ तक तैयार हो गयी. यह उनकी तरफ से मनहारी को एक और तोहफा था. मनहारी ने भी यही समझा और गुलाब पर तन-मन से वारी गई.

फिर आया २००३ विधान सभा चुनाव. और पहली बार ऐसा हुआ की दिल्ली में निगम और विधान सभा दोनों चुनाव एक साथ हुए.

अब यहाँ से शुरू होता है हमारा असली किस्सा. मनहारी को गुलाब ने टिकट दिलवाया निगम का और खुद लड़े विधान सभा. गुलाब चुनाव हार गए. मनहारी निगम का चुनाव जीत गयी. चुनाव के नतीजे एक ही दिन आये. मनहारी ने जीत का जश्न न करने का फैसला किया है यह बात सुनकर खुद गुलाब जी “शहीद गुलज़ार वाटिका” आये और आधी रात तक माता के जगराते में बैठे.

तो किस्सा यह है की मनहारी ठहरी मुसलमान नाइन और भाभी के निगम पार्षद होने के जश्न में देवर जी ने विलायती चढ़ा ली. अपने नए निकले परो से उड़ने लगे.

माता के जगराते पर, सुबह तारा माता की कथा के समय, मनहारी, गुलाब और देवर ६ कमरे वाली लाइब्रेरी में बैठे बातें कर रहे थे. देवर ने जीत के जोश में कह दिया, “साहेब भाभी ने आपको भी पीछे छोड़ दिया” गुलाब बाबू मंझे हुए खिलाडी थे. चुप नहीं रहे, और गुस्सा भी नहीं हुए. बोले, “अभी तो शुरुवात है छोटे नाई. देखते जाओ मनहारी जोन-५ विधान सभा जीतेगी”

२००३ का किया हुआ वादा पूरा होने में मनहारी को २०१३ तक इंतज़ार करना पड़ा.

अब हमारे पास दो रास्ते हैं. एक तो यह की हम २०१३ से किस्से को २००३ तक ले आएं और फिर २००३ की आखरी बड़ी घटना पर समाप्त करें और दूसरा यह की २००३ से सिलस्लेवार २०१३ तक इसको ले जाएँ और फिर इसे ख़तम करें.

एक काम करते हैं; जैसे फिल्मों में होता है वैसे ही कहानी में भी २०१३ से २००३ तक आते हैं.

तो साहिबान २०१३ में गुलाब की रखैल जोन-५ की विधान सभा से विधायक हो गयी.

लेकिन किस्सा शुरू होता है मुश्किल से साल डेढ़ साल पहले; २०११ की गर्मियों की शुरुवात ही हुई थी. महाराष्ट के किसी गांधीवादी नेता से मनहारी की मुलाकात गुलाब ने करवाई. मनहारी को पूरे रास्ते गुलाब ने एक ही बात बार बार कही; “यह अगला चुनाव तय करेगा नाईन. समझ लो यह हवा जिस और चलेगी वहीँ वोट डलेंगे. साल भर में चुनाव का  है नाईन. अपनी सीट तो “आरक्षित सीट” होने वाली है. टिकट पार्टी से तुमको ही मिलेगी. खूब काम करो नाईन”

मनहारी को गुलाब समझ आते थे. समझ गयीं. अप्रैल २०११ में मनहारी ने निगम की सीट से इस्तीफा दे दिया और अन्ना के मंच के नीचे जो दरिया बिछी थी वहां रोज अपने साथियों के साथ बैठने लगी. मई २०११ में बाबा रामदेव रामलीला मैदान आये तो मनहारी ने उनके योग शिविर के लिए मंगोल पूरी से १२ बसें भरकर भेजीं.

बाबा योग योग कहते रहे लेकिन सरकार कोई बच्चों की गुड़िया है जो गच्चा खा जाती; सरकार ने जिस रात बाबा रामदेव को घाघरा चोली पहनकर भागने पर मजबूर किया उस रात रामलीला मैदान में मनहारी के टोले के ५०० आदमी थे. भगदड़ में मनहारी ने भी पुलिस के २-४ लठ खाये. कहते हैं बाबा जब पुलिस से बचकर स्टेज से कूदे तो मनहारी ही स्टेज के नीचे उन्हें कैच करने को खड़ी थी. बातों का क्या है; मैं इस बात पर विश्वास नहीं करता

जिस मनहारी की बात कर रहे हैं वो गुलाब की जोरू से गुलाबीबाई से गुलाब की रखैल तक का सफर तय करके आयी थी. जैसे ही अगले दिन रामदेव ने कहा की अक्टूबर में वो दूसरे चरण का आंदोलन करेंगे और १,००,००० किलोमीटर की पद यात्रा करेंगे, मनहारी ने मन बना लिया की वो रामदेव के साथ साथ चलेगी.

अक्टूबर से पहले अगस्त आया और अन्ना रामदेव से पहले आकर दिल्ली में बैठ गए. १५ अगस्त को किसी ने प्रधान मंत्री का भाषण नहीं सुना, क्योंकि १६ को अन्ना अनशन पर बैठने वाले थे. १६ को अन्ना बैठे अनशन पर और गुलाब ने “शहीद गुलज़ार वाटिका” में मनहारी से कहा, “२१ को रामलीला मैदान चलना है नाईन. २०,००० आदमियों का जुगाड़ करो. यकीन मनो यह कर लिया तो पो बाराह. टिकट भी पक्की और जीत भी”

२१ को कहते हैं रामलीला मैदान में १००,००० लोग जुटे. और पहली बार मनहारी को नीचे दरियों से उठाकर मंच तक लेकर गए आंदोलन वाले. गुलाब के मोबाइल फ़ोन पर मनहारी ने फ़ोन करके कहा, “साहिब, आगे का क्या हुकुम”

“कुछ नहीं नाईन. बस मंच पर बैठी रहो. हम नहीं आएंगे. हम यहाँ से लगे हैं टिकट के लिए. तुम वहां बैठी रहना. और सुनो, उपवास रख लोगी?”

“साहिब रोजे रखते हैं हम हर साल”

“अभी भी. अब कहाँ रही तुम मुसलमानी बीबी. २ दिन का उपवास रख लेना”

मनहारी २१ से २८ अगस्त तक वहीँ रामलीला मैदान में ही रही. घर पर वैसे भी क्या काम था उसको. २४ और २७ को उपवास में शामिल हुई. २४ के दिन अन्ना के लोग मिलने गए थे प्रधान मंत्री से. मंच पर उपवास में बैठने वालों की कमी थी. मनहारी ने अपना नाम आगे करते हुए कहा था, “भाई लोग जा रहे हैं तो बहन लोग उपवास कर सकती हैं.” और इसके बाद से मनहारी का नाम हो गया “बहन मनहारी”

खैर हमको जाना था पीछे और जाने लगे आगे. २०१३ में मनहारी विधान सभा सीट जीतीं. और इस काम का सफर २०११ से शुरू हुआ. यह ऊपर स्पष्ट हो गया. यह कहने की अब जरूरत नहीं की २०१३ में वो नयी पार्टी की टिकट से चुनाव लड़ी. अनशन से लेकर लोगों को जुटाने का पारितोषिक उसको मिला यह भी मोटा मोटा साफ़ है ऊपर के किस्से से.

और यकीनन आप लोग यह भी समझ गए होंगे की गुलाब ने पार्टी नहीं बदली. वो पीछे ही रहा. इस किस्से को बाद में विस्तार से. क्यों? क्या फायदा हुआ उसका? वो सब बाद में.

अभी चलते हैं २०१० में. मनहारी २००८ में दूसरी बार निगम पार्षद को चुनाव जीतकर आयी थी. मंगोल पूरी के पीछे एक इलाका था बवाना. और वहां बन रहा था २००८ से राजीव गाँधी राष्ट्रमंडल खेल स्टेडियम. इस स्टेडियम को दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में कुश्ती, बॉक्सिंग, वेटलिफ्टिंग और तीरंदाजी के इवेंट को होस्ट करना था. मनहारी ने गुलाब के लिए खूब पैसा बनाया इस स्टेडियम के निर्माण कार्य में. और इसी समय यानी २००८ में गुलाब ने उससे कहा था “नाईन २०१० में दिल्ली में न न करते भी करीबन ३००००० अंग्रेज आएंगे. बहुत सारे देशों से. तुम लगी हो ईंट पत्थर में पैसा ढूंढने. और पैसा है जिन्दा जिस्म में.”

नाईन को समझने में देर नहीं लगी. २०१० में दिल्ली निगम पालिका ने जहाँ एक तरफ जी बी रोड की दीवारों से पान की पीक हटाकर सुन्दर पुताई की वहीँ मनहारी ने बवाना से सटे नरेला में मिनी जी बी रोड की नीवं डाली. मनहारी को सबसे बड़ा कमाल तो यह रहा की इन नए बने कोठों को बैंक से फ्रिज और ए सी के लिए लोन तक दिलवाया. इसका भी अपना एक किस्सा है. मनहारी का देवर याद है? उसकी नस्ल का पहला चिराग मनहारी के बहुत काम आया. एक तरफ उसने लोन देने वाली कंपनी की फ्रैंचाइज़ी ली और मंगोल पूरी में दफ्तर खोला और दूसरी तरफ उसने शुरू किया “स्वास्थ्य टेस्टिंग सेण्टर”. मनहारी ने नरेला की एक एक छोकरी को सर्टीफिट दिलवाया – “साफ़, स्वस्थ सेक्स वर्कर” – सर्टिफिकेट नरेला की कई खोलियों में २०१० -११ में टंगा होता था.

क्या खूब रहे वो दो हफ्ते. कहते हैं स्टेडियम खाली रहे, मैदान में प्रत्योगिता नहीं दिखी लेकिन खिलाडियों ने खूब खेला, इतना खेला की मनहारी की मुन्सिपल कारपोरेशन के कर्मचारी अवरुद्ध नालियों को खोलने में दिन भर पसीना बहाते और सुबह फिर नालियां बंद मिलतीं.

कंडोम का इतना इस्तेमाल दिल्ली में शायद उससे पहले और उसके बाद कभी नहीं हुआ. १९९२ के बार्सिलोना ओलंपिक्स के बाद खेल गांव में रह रहे हर खिलाडी को मुफ्त कंडोम उपलब्ध करना अनिवार्य था, दिल्ली के कामनवेल्थ गेम्स में इसका ठेका गुलाब के दोस्त को मिला था. और इस तरह पूरा चक्र सिर्फ एक आदमी के हाथों में था.

चार साढ़े चारसौ दलालों को खेलों के बाद सरकारी बाबुओं ने पकड़ा. हर दलाल के पास २०-२५ लड़कियों की फाइल थी. जब सरकारी बाबू मनहारी के देवर के सपूत के पास पहुंचे तो मनहारी ने बाबू को कहा था, “हमने कभी कुछ गलत नहीं किया बाबू. आप भी कुछ गलत नहीं होने देंगे इसका भरोसा चाहिए साहब”. इतना सुनते ही सरकारी बाबू ने धीरे से कहा, “आप जोरावर सिंह जी से जरूर मिल लीजियेगा. हमारा जोर कितना चलेगा वो आपपर ही है पार्षद जी”

पूछताछ के बाद हर अखबार में खबरें छपीं और कुछ अखबारों ने स्टिंग ऑपरेशन भी किये. २०१०-२०११ का साल कई स्टिंग ऑपरेशन्स का साल था. कहते हैं स्टिंग की पूरी फंडिंग जोरावर सिंह ने की थी. स्टिंग की खबर चलने से पहले जोरावर सिंह ने मनहारी को बुलवाया था. “क्या कहती हो नाइन, अब हम क्या करें?”

“किसी को पता मत लगने दें; बस इतना भर कर दें. हमारी गलती नहीं साहिब

पूछताछ के बाद हर अखबार में खबरें छपीं और कुछ अखबारों ने स्टिंग ऑपरेशन भी किये. २०१०-२०११ का साल कई स्टिंग ऑपरेशन्स का साल था. कहते हैं स्टिंग की पूरी फंडिंग जोरावर सिंह ने की थी. स्टिंग की खबर चलने से पहले जोरावर सिंह ने मनहारी को बुलवाया था. “क्या कहती हो नाइन, अब हम क्या करें?”

“किसी को पता मत लगने दें; बस इतना भर कर दें. हमारी गलती नहीं साहिब.” मनहारी ने धीरे से कहा. उसको पता था की अगर उसने चू-चा की तो बात सीधा गुलाब को घेरेगी. मनहारी किसी सावित्री से कम नहीं थी, आदमी पर विपदा आये और वो साइड हो जाये यह उसके संस्कार नहीं थे

“और हम क्यों न पता लगने दें. इतना पैसा खर्चा हमने किस बात के लिए? तुम भोली बहुत बनती हो नाइन”

“फिर आप कहें साहिब. क्या किया जाये. पैसे का क्या है साहिब; आपके पास पड़ा रहे या मेरे पास; मैं जानती हूँ उसकी  चिंता नहीं आपको – आपसे ही सीखे हैं साहिब. जो लिख दें तो इंतज़ाम कर दें हम.” मनहारी को पता था की पैसे का तो खेल ही नहीं है यह.

“और? टिकट का क्या करें?”

“हम नहीं लेंगे मालिक अगली बार. खुदही पीछे हो जायेंगे. आप जीतें.”

“और अनीश”

“उनकी हम कैसे कहें साहिब. दो शेर लोग आपस में निपटा लें, हम सियारों की क्या बिसात साहिब” मनहारी ने एक एक कदम भरना ही ठीक समझा.

और सौदा पट गया. जोरावर सिंह को उसकी मेहनत का पैसे भी मिला और मुनाफा भी. दोनों गुलाब – मनहारी ने चुपचाप अगले चुनाव का टिकट लेने से मन कर दिया. याद रहे यह साल था २०१० का. चुनाव थे २०१३ में. और याद रहे की २०११ में गुलाब ने मनहारी को अन्ना के मंच तक पहुँचाया, मनहारी ने पार्टी ही छोड़ दी, पार्षदी से इस्तीफा दें दिया. परदे के आगे जो भी दिखा या दिखाया गया, परदे के पीछे का खेल अब साफ़ हो जाता है. पार्टी में रहकर टिकट नहीं मिलना था. जोरावर सिंह को जुबान दी थी दोनों ने; सो जैसे ही नयी हवा बहती दिखी मनहारी ने बाज़ी मार ली. गुलाब चुपचाप विधान सभा को “आरक्षित सीट” घोषित करवाने में लगा रहा. और जैसा कहते हैं बाकि सब तो अब इतिहास के पन्नों में दर्ज है.

लेकिन असल किस्सा अभी भी बाकि है. क्योंकि अब साल है २०१५. २०१३ में मनहारी के जितने के बाद, लोगों को लगा की गुलाब अब “खर्च हो चूका रूपया है”. छै महीने भी नहीं बीते की मनहारी की तूती पूरे इलाके में बोलने लगी. “शहीद गुलज़ार वाटिका” के बाहर हमेशा फरयादियों का तांता लगा रहता. पार्टी नयी थी और उसके विधायक तो बिलकुल ही नौसिखिये. पार्टी को मनहारी में सीखा सिखाया विधायक मिला और इसका फायदा मनहारी को हुआ. पार्टी ने मनहारी को बनाया कानून और न्याय मंत्री. जिस दिन मनहारी ने इस पद की शपथ ली थी गुलाब और मनहारी के पेट में उस शाम हँसते- हँसते दर्द हो गया था – कानून और न्याय मंत्री बहिन मनहारी.

तय तो गुलाब ने मनहारी की जीत के दिन ही कर लिया था की अगली बार विधायकी वो लड़ेगा और जीतेगा भी. मनहारी नाम की पतंग हवा में गोते खाती थी; और यूँ हवा के साथ बहती थी की पहली बार गुलाब को लगा, थोड़ा कसना पड़ेगा.

अचानक एक दिन अखबार में खबर छपी की बहिन मनहारी की “लॉ की डिग्री”, जो उन्होंने अपने इलेक्शन डॉक्युमेंट में दिखाई है, की वैध्यता पर शक जाहिर करते हुए किसी प्रदीप कुमार ने आर.टी.आयी डाली है. शहीद गुलज़ार वाटिका के बाहर हर टीवी चैनल की आदमी खड़े थे. मनहारी ने कभी चुनाव के पर्चे खुद नहीं भरे थे. उसका यह काम करते थे गुलाब जी. और गुलाब पर उसको था पूरा भरोसा. इसी भरोसे के दम पर उसने पत्रकारों के सामने जाकर चोड में बोला, “मेरे कागज़ सब सही हैं. यह सब मेरी पुरानी पार्टी  की साजिश है. पुराने आदमी हमारी सरकार को काम नहीं करने दे रहे”

फिर उसके बाद जो मनहारी की दुर्गति हुई उसका ब्यौरा संक्षेप में नीचे. लेकिन उससे भी पहले यह बता देना जरूरी है की मनहारी का दिल उसी क्षण टूट गया जब गुलाब ने फ़ोन पर उससे कहा; “बिना पूछे अखबार वालों से बात क्यों की तूने बहन मनहारी!”

बहन मनहारी को पुलिस वाले उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद ले गए. रास्ते में पुछा, “कहाँ है तुम्हरी यूनिवर्सिटी?” महारी सन्न रही. टीवी वालों ने उसका वो चेहरा खूब चलाया. फिर पुलिस वालों ने अवध यूनिवर्सिटी के ऑफिस में बिठाकर पुछा. “कभी आयी भी थीं आप यहाँ?” मनहारी फिर चुप; और इस बार तो शर्म से गर्दन भी झुका ली. टीवी वालों ने उसका यह चेहरा भी खूब चलाया.

अंततः मनहारी को ४ दिन की पुलिस कस्टडी में भेजा गया. अखबारों मे और टीवी पर यह सच्चाई दिखाई गयी की मनहारी की सभी डिग्रीयां जाली थीं. मनहारी को यही मलाल रहा की किसी ने यह नहीं कहा की वो बिलकुल सच्ची थी, की उसने कब कहा था गुलाब को जाली डिग्री दाखिल करने के लिए. उसको यह मलाल रहा की गुलाब ने उसको अपने से दूर कर दिया.

२०१५ की जनवरी में गुलाब फिर मनहारी से मिलने आये. बोले “नाइन, तुम्हारा चुनाव लड़ना बेकार है. तुम एक काम करो, हमारी जोरू को टिकट मिलेगा सीट से, महिलाओं के लिए आरक्षित सीट है न, तुम उसको समर्थन करो”

“साहिब उस दिन जब “बहिन- मनहारी” कहकर बोले थे न, हम तभी जान गए थे आपने पराया कर दिया; आज फिर नाइन बोले हैं – अपना बना रहे हैं, जो कहेंगे करेंगे साहिब”

और यहाँ किस्सा हुआ ख़तम. इसको कहते हैं प्यार – बिलकुल शीरीं-फरहाद और हीर-राँझा के जैसा खालिस प्यार.  बस इतना फर्क की हमारी महारी को खालिस फरहाद नहीं मिल पाया

लेखक: सचिन मनन

मुझे कहानियां कहने का शौक है, आपको कहानियाँ पढ़ने का शौक होगा - अगर हाँ तो हम दोस्त हैं; अगर नहीं तो मुझे यकीन है मेरी कहानियां आप में यह शौक पैदा कर देंगी

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