कहानी : “दस दिन”


कहानी : “दस दिन,  सिर्फ दस दिन” 

एक :  तीसरा दिन

“आपने उत्तर नहीं दिया; आप खुश हैं?”

फिर वही, कहीं से भी बात शुरू करो यहीं पहुँचती है; इस बार उसने उत्तर देना सही समझा, “बाबा को पता था; कई सालों से. मेरे पति को भी. शुरू से”

“और आपको आज पता लगा की उन्हें पता था?”

उसने धीमे से स्वीकृति में गर्दन हिलायी, एक मार्मिक उदास मुस्कराहट उसके चेहरे पर तैरी. करन आगे चल पड़ा, और पीछे पीछे माँ. अभी कुछ ही सीढ़ियां चढ़े होंगे की करन ने पीछे मुड़कर कहा

“आपको एक प्रश्न पूछने की छूट देता हूँ. कोई प्रश्न जो आपको पूछना हो? आपको वचन देता हूँ बिना किसी उपालम्भ बिना किसी शिकायत उतर दूंगा”

और माँ ने बिना एक भी क्षण खोये धीमे से पुछा, “और कोई भी जानता है?”

“क्या?” करन बोला

“इन १० दिनों के बारे में?”

“कौन? जैसे की कौन?” करन के प्रश्न मे रोष था

“मुझे नहीं पता….” करन के चेहरे के भाव बदल गए. माँ ने उसका हाथ पकड़कर रोकना चाहा लेकिन करन आगे बढ़ गया

 

दो

प्रस्तावना

वो हाथ में मूंगा पहनती थी. दुश्मनों पर काबू पाने के लिए आवश्यक हिम्मत मिलती थी मूंगे से. और चलते समय अपने दायें हाथ की उँगलियों से बाएं हाथ में पहनी मूंगे की अंगूठी धीरे धीरे हिलाती रहती थी. अपने आलिशान घर की रसोई में शाम के खाने को लेकर अपने नौकरों को हिदायत दे रही थी.

“अधिक आग्रह की आवश्यकता नहीं; संक्षिप्त मे ….. अगर किसी प्रश्न का उत्तर देना भी पड़े, आप उनके परिचित नहीं” नौकर पूरे ध्यान से उसकी हिदायत सुन रहे थे, “मान लो आपसे कुछ गिर जाए, टूट जाये तो चुपचाप निकल जायें, माफ़ी के लिए और साफ़ सफाई के लिए और लोग होंगे वहां. और ध्यान रहे, आप में से, खाने की बैठक में कोई भी किसी तरह का आभूषण पहन कर नहीं आएगा. जो वस्त्र मिले हैं बस उतने”

यह सुनते ही, उससे दूर खड़े एक लड़के ने अपने कान के कुण्डलों को पहले छुआ और फिर अपने बड़े हुए बालों और कोट के कालर से छुपा लिया

“मुझे विश्वास है आप अच्छा काम करेंगे. आपका धन्यवाद” और इतना कहकर वो वहां से चली गयीं

तीन

शाम का खाना शुरू हो चुका था. कितने ही अतिथि – गिनती नहीं. और कितना बड़ा खाने का मेज. एक कोने से दूसरे कोने तक कुछ ५०-५५ कुर्सियां. और हर कुर्सी की सेवा में एक अदद सेवक. और सबमे ऐसा तारतम्य जैसे कोई सैन्य दस्ता मार्च कर रहा हो. अतिथि आपस में बात करने में व्यस्त. और उसकी नज़र सबपर लेकिन किसी पर नहीं.

“रस?” जब प्याले में रास डालने की बारी आयी तो लड़के ने सभी की तरह आगे बढ़कर पुछा

“संतरे का” उनहोंने कहा

उस लड़के ने चुपचाप रस उनके ग्लास मे डाल दिया. रस का स्वाद उनहोंने पहचान लिया; यह उनके शहर मे मिलने वाला रस नहीं था. मुड़कर लड़के को देखा. लड़के के कानों के कुण्डल उसकी दूसरी गलती थे.  लेकिन ये समय नहीं था. लड़के की तस्वीर उनहोंने अपनी आंखों में रख ली.

चार

सबके चले जाने के बाद उनहोंने लड़के को बुलाया, “वो रस दोगे थोड़ा और?”

“लड़के ने चुपचाप उनको एक और प्याला दिया और कोने में खड़ा हो गया”

वो उस लड़के को बहुत देर देखती रहीं; और दोनों को कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं पड़ी. फिर उठकर जाने से पहले उन्होंने इतना कहा, “शहर में कहाँ ठहरे हो?”

“यहीं पास में” लड़के ने कहते हुए एक कागाज का टुकड़ा आगे बढ़ा दिया जिसपर उसके होटल का पता लिखा था

“कल ….”  इतना भर कहकर उन्होंने लड़के को जाने को कहा, लड़का चुपचाप वहां से चला गया

पांच

उनको शहर में कौन नहीं जानता था? अगले दिन जब वो उस लड़के से मिलने पहुंची तो उस होटल की रिसेप्शन पर बैठे कितने ही लोग थे जो उन्हें जानते थे. कितने ही खुद उठकर उनके पास आये. कितनों ने उन्हें अपने पास बैठने का न्योता दिया.

“नहीं एक साक्षात्कार है, वो जो लड़का बैठा है वहाँ, उससे मिलना है.  आज नहीं फिर मिलूंगी आपसे” उन्होंने औपचारिकता निभाए और आगे बढ़ गयीं

लड़के की पास पहुंचकर उन्होंने कहा, “तुम्हारे लिए चाय बोली है मैंने”

लड़का इस शहर का नहीं था. उसकी पौषक से जाहिर था. उसके केश बिखरे थे, शायद उसके गांव मे इस शहर की मुक़ाबले ठड ज्यादा पड़ती थी लेकिन यहाँ उस जैकेट की जरूरत नहीं थी जो वो पहना था. शायद उसको शिष्टाचार के नियम भी नहीं पता थे क्योंकि वो उनके आने पर खड़ा नहीं हुआ. सिर्फ सर उठाकर उनकी तरफ देखा.

“तुम्हे कुछ कुछ और चाहिए?” बैठते हुए उन्होंने लड़के से पूछा

“आप अपना चश्मा उतार सकती हैं?” उसने कहा

चेहरे को पत्थर करना तो उनको आता था, आँखों मे उतरे भाव वो चश्मे से छुपाती थीं. चश्मा उतारते ही लड़के के सामने उनकी कित्रिमता स्पष्ट उभर आयी. लड़का उनकी आँखों में अपराध भाव को पढ़ते ही कटाक्ष से भर मुस्कुराया फिर अपनी जैकेट से एक सिग्रेटे निकाली, सुलगायी.

“मुझे नहीं लगता यहाँ तुम सिग्रेटे जला सकते हो”

“वो देखेंगे लेकिन मुझे रोकेंगे नहीं, खासकर तब तक जब तक आप हैं यहाँ” लड़के ने कहा

“शायद तब तक जब तक कोई शिकायत न करे ”

“हम्म …आप जबतक हैं यहाँ. कोई शिकायत नहीं करेगा ” लड़का ने कहा

उनके शारीरिक हाव भाव में एक कसाव था. सीधे बिलकुल सीधे कमर करके, दोनों टांगो को जोड़े, दाएं हाथ की उँगलियों से बाएं हाथ के मूंगे को अत्यंत धीमे हिला रहीं थीं.  लड़के ने सिग्रेटे पीनी चालू रखी

“मेरे बारे में पता कैसे चला?”

“आपको ढूंढ लेना मुश्किल है क्या?”

“और घर में दाखिल कैसे हुए?”

“आपको बताने से उस व्यक्ति पर आपके प्रतिकार का संशय है मुझे. लेकिन किसी ने तो मदद की ही होगी” लड़के ने उन्हें बात पूरी नहीं करने दी, “मुश्किल नहीं था. आपकी नज़र में आने के लिए अगर हत्या भी करनी पड़ती तो परहेज नहीं था मुझे”

उनका मूंगा घुमाना थम गया; आँखों में लोहा सा उतरता लगा, ठोस होता जाता लोहा; लड़के की ज़ुर्रत पर विश्वास नहीं हुआ उन्हें.

“मैं मजाक नहीं कर रहा” लड़के ने कहकर सबूत दिया की वो जरा भी विचलित नहीं हुआ

 

“सर आप यहाँ सिग्रेटे नहीं पी सकते” चाय रखते हुए वेटर ने कहा

“अच्छा, मैंने तो पूछा था इनसे. इन्होने कहा पी सकते हैं. आप जानते हैं इन्हे?” लड़के ने उनकी तरफ इशारा कर कहा और फिर सिग्रेटे बुझाते हुए उनकी ओर दुष्टता भरी मुस्कराहट से देखा

वो कुछ विचलित सी लगीं; जैसे समझ गयी हों यह लड़का विद्रोही है. वेटर चुप चाप चाय रखकर चला गया

“क्या चाहिए तुम्हे?”

चाय का कप उठाते उसने कहा, “मैं चाहता हूँ की आप मेरे साथ १० दिन बिताएं”

“क्या?”

“आपने सही सुना”

उनको लगा उनका गला सूख रहा है, बोतल से पानी ग्लास मे डालते उनके हाथ कांप रहे थे, लड़के को अच्छा लगा. यही तो वो चाहता था, “यह धमकी नहीं है. आप सोच सकती हैं इस बारे में यदि आप चाहें तो”

“धन्यवाद” पानी पीते हुए उनहोंने कहा अपना पर्स उठाया और वहां से चली, जाते जाते ५०० का नोट टेबल पर रखा, “जो बचे वो टिप के छोड़ देना”

लड़का हंसा, उसकी हंसी में उनके लिए धिक्कार था

 

छह

प्रारम्भ

“कितना?”

“उसको पैसा नहीं चाहिए” उन्हें यकीन था की वो पैसे के लिए नहीं आया था

“उसे क्या चाहिए?”

“वो चाहता है कि मैं उसके साथ १० दिन तक रहूँ” उन्होंने कहा

“उसने धमकी दी?”

“नहीं”

“क्या उम्र होगी उसकी?”

“२५ का या तीस का” कुंती ने कहा और कहते हुए वो कमरे के उस भाग कि ओर चली जहाँ अँधेरा कुछ ज्यादा था; “वो पुत्र है मेरा, मैंने जन्म देते ही छोड़ दिया था; विवाह से पहले कि संतान ….” और वो उसी अँधेरे में कहीं बैठ गयी

“तुम्हे यकीन है कि यह वो ही है ?”

“हाँ”

“कैसे?”

कुंती ने गहरी सांस ली, “उसके कुण्डल पहचानती हूँ मैं”

बाबा ने ज्ञान की तरफ देखा. बाबा ज्ञान को विदुर बुलाते थे. विदुर समझ गया और उसने लड़के को बुलावा भिजवाया

सात

सौदा, समझौता और अनुबंध

उस कमरे में कुल ६ कुर्सियां थी; कुंती ने कई बार अपने बड़े बेटे से कहा था एक-दो और होनी चाहिए; कभी कोई मेहमान ही जाए लेकिन उसके पुत्र को यह सुझाव कभी नहीं जंचा. आज कमरे में सिर्फ तीन लोग थे; वो, बाबा और उनका विश्वस्त सलाहकार ज्ञान.

लड़के को कमरे तक खुद विदुर लेकर आया. लड़का हिचकिचाते हुए कुर्सी पर बैठा. इतने बड़े कमरे में शायद वो पहले बार दाखिल हुआ था

“चाय लोगे”

“नहीं”

“तो फिर सुनिए; हमने आपको बुलाया ताकि कुछ बातें स्पष्ट कि जा सकें. आपकी अजीब सी मांग है” लड़के का ध्यान कुंती कि तरफ था लेकिन कुंती उस लड़के की तरफ नहीं देख रही थी, उनकी नज़र खिड़की से बाहर कि तरफ थी; जैसे भूत के अँधेरे से भविष्य का उजाला ढूंढना चाहती हों.

“आप दीदी के साथ १० दिन बिताना चाहते हैं.” ज्ञान ने आश्चर्य के साथ कहा, “बड़ी अजीब से मांग है आपकी”

“जी”

“तो आप बता सकते हैं कि क्या करने वाले हैं आप इन १० दिनों में?”

“कोई सूची? तो तैयार नहीं की है मैंने ” लड़का हक्का बक्का सा देख रहा था; उसको समझ नहीं आया कि क्या कहे. उसकी बाजुएँ अपने शरीर से इतनी भीचीं सी थी कि मानो वो खुद में सिमटता सा जा रहा हो.

“मेरे कहने का मतलब है कोई कैलेंडर तो होगा आपके पास कि आप क्या करने वाले हैं इन १० दिनों में?”

“नहीं कुछ नहीं है. लेकिन हम कुछ तो करेंगे. शायद बातें”

“हम वही जानना चाहते हैं” फिर क्षण भर ठहरकर, “कोई और रास्ता हो, इससे तेज इस मसले को सुलझाने का, जैसे की वित्तीय भरपाई आपके नुक्सान की?”

लड़के ने फिर एक बार कुंती की और देखा. वो अब भी खिड़की सी बाहर की तरफ देख रही थीं

“पैसे से भरपाई हो सकती है?”

“कोई और तरीका?” विदुर ने खुद को एक अवसर और दिया हालांकि उसको भी पता था की लड़का नहीं मानेगा

लड़का जवाब से उससे पहले बाबा ने पूछा “मैं जानना चाहता हूँ, की इस सब सी तुम्हे क्या मिलेगा?”

अभी तक वो ज्ञान के पीछे दृढ़ता से चुपचाप खड़े थे. कोई भाव नहीं. और इस प्रश्न को भी उन्होंने उसी भीष्म दृढ़ता से पुछा जिसके लिए वो प्रसिद्ध थे, “क्या तुम समझते हो की यह सब हमारे लिए कितना अजीब है? तुम २५-३० साल बाद अचानक से आते हो और आकर सिर्फ यह मांग की कुंती के साथ १० दिन बिताना चाहते हो? अकेले”

“इनसे मिलने के लिए मुझे इनको ढूंढ़ने मे समय लग गया. अगर पहले आ पता तो पहले ही आता”

“और अगर कुंती मना करे तो?” बाबा ने पूछा

“मुझे नहीं पता. मैंने अभी इसके बारे में सोचा नहीं” लड़के ने धीमी लेकिन मजबूत आवाज में कहा

“हमने एक अनुंबध, एक समझौता तैयार किया है, अगर तुम्हे १० दिन मिलते हैं तो भविष्य में ऐसी कोई मांग तुम दोबारा नहीं करोगे. तुम्हे यह रिश्ता छोड़ना होगा” ज्ञान ने समझौते का दस्तावेज आगे बढ़ाते हुए कहा; “यह आसान तरीका है सुनिश्चित करने का की तुम इसके बाद कोई और मांग नहीं करोगे”

लड़के को कुछ अटपटा सा लगा, रिश्ता छोड़ देना क्या होता है? उसने फट से कलम उठाई स्वकृति हस्ताक्षर करने के लिए. लेकिन उस जैसी कलम भी उसने कहाँ देखी थी. किस ओर से और कैसे खुलेगी इसमें उसको २-३ बार कलम को उलटना पड़ा. हस्ताक्षर के बाद लड़के ने पूछा “और कुछ?”

“तुमने पढ़ा भी नहीं. खैर वो तुम्हारी मर्जी. लेकिन एक बात याद रखो, कुंती को हमसे दिन में एक बार बात करने की इज़ाज़त होगी.” बाबा ने कहा

“वो चाहे तो एक से ज्यादा बार भी बात कर सकती हैं. लेकिन आप नहीं कर पाएंगे. मेरे घर पर फ़ोन नहीं. लेकिन २-३ किलोमीटर पर एक पब्लिक बूथ है; वहां तक इनको जाना होगा – पैदल””

 

आठ

पहला दिन

सुबह के निकले शाम तक दोनों सफर करते रहे. कुछ बात नहीं हुई. शुरुवात में कुंती गाडी में पीछे बैठी फिर कहीं बीच सफर आगे भी आयी लेकिन बात का कोई सिलसिला नहीं बना. लड़का चुपचाप गाडी चलाता रहा और बीच बीच में सिग्रेटे पीता रहा. देर शाम उसने एक घर के पास गाडी रोकी और घर का ताला खोलकर अंदर चला गया. कुछ देर बाद बत्ती जली. दो मंजिला घर के बाहर एक छोटा सा बगीचा और बगीचे की सीमा के साथ साथ कांटेदार जाली. इस सीमा के बाहर दूर तक कुछ नहीं, झाड़ – झाड़ियां और एक पगडण्डी. कुंती ने कार का दरवाजा बंद किया और घर में दाखिल हुई.

“कोई रहता है यहाँ?”

“हाँ, मैं. सब बेतरतीब है इसलिए पूछ रही हैं?” लड़के ने पूछा

“नहीं, यह मतलब नहीं था मेरा”

लड़के ने फिर कोई उत्तर नहीं दिया. उनको इशारे से उनका कमरा दिखाया और खुद ऊपर की मंजिल पर अपने कमरे की और चला गया. घंटे भर बाद जब कपडे बदलकर वो कमरे से निकलीं तो लड़का रसोई में था. लड़के ने देखकर पूछा, “आखरी बार खाना कब बनाया था आपने? आता है आपको?”

“दोनों मिलकर बनाते हैं” उन्होंने उत्तर दिया, “अगर तुम चाहो तो?” उनको लगा लड़के का असली सवाल यही है

“नहीं. अभी के लिए अगर हम अपने अपने काम बाँट लें तो बेहतर होगा” लड़के ने अपना काम जारी रखा

“ठीक है” कुंती को यही ठीक लगा, वो अभी कुछ बैचैन सी और कुछ संकोच में थी, शायद शर्मिंदगी उन्हें व्याकुल कर रही थी. चिंतित कुंती नहीं जान पा रही थीं की उनका क्या व्यवहार होना चाहिए.

” कुछ पीने को है?”

“मैं नहीं पीता. मैंने खुद को मना किया हुआ है.” लड़के ने गैस जलाते हुए कहा

“नहीं! मेरा मतलब है कुछ भी हो पीने को.  सफर लम्बा था. कभी कभी पानी से प्यास नहीं बुझती न” कुंती ने बोल तो दिया लेकिन उसको खुद ही अपनी बात अटपटी लगी

“आप एक काम कीजिये, एक बार फ्रिज में देख लीजिये. और चिमनी में कुछ लकड़ी जला लीजिये, ठण्ड काफी है आज, लकड़ी बाहर है. कमरा थोड़ा गरम हो जायेगा”

कुंती बाहर निकली और सबसे पहले उसने अपने फ़ोन पर सिग्नल तलाशे. सिग्नल नहीं थे. लकड़ी लेकर वो जब वापस दाखिल हुईं तो लड़का सब्जी काट रहा था;

“सिग्नल नहीं आएंगे यहाँ. लेकिन लैंडलाइन है वहां. वो चलता है. आप जब चाहें फ़ोन कर सकती हैं”

बात सुनी, और चिमनी जलने के लिए बढ़ गई. लैंडलाइन होने से उसको थोड़ी तस्सली हुई

“आप चाहें तो बाबा को फ़ोन कर सकती हैं. उन्हें अच्छा लगेगा जानकार की आप ठीक हैं. ठीक रहेगा की उनको यकीन आ जाये की मेरा इरादा आपको मारने का नहीं है”

कुंती चुप रही. और लड़का खाना बनाने में व्यस्त हो गया

“आप इतनी प्रसिद्ध कैसे हो गयीं?” लड़के ने जिज्ञासा वश पूछा. “शादी के समय तो शायद आपको शहर में कोई जानता भी नहीं था?”

“हो सकता है इसलिए की मुझे वैसा       परिवेश मिला, जिस परिवार में शादी के बाद पहुंची उसको तो शहर जानता है” कुंती को समझ नहीं आया की यह कैसा अटपटा सवाल है.

“हम्म! और आपको लगा होगा की इतना समय निकल गया है. अब कहाँ …”

“लकड़ी गीली है” कुंती चिमनी से जूझ रही थी, उसने लड़के के प्रश्न के उत्तर में पूछा, “समय निकल गया…क्या?”

“की इतने समय बाद मैं कहाँ याद रख पाऊंगा आपको?” लड़के ने अपना वाक्य पूरा किया

उसके बाद दोनों में बहुत देर तक कुछ बात नहीं हुई. लड़के ने खाना परोसा, दोनों ने खाया. लड़का लगातार सिग्रेटे पीता रहा. कुंती चुपचाप खाना खाती रही.

“आप अपने पति से कैसे मिलीं?” लड़के ने खाने की टेबल पर चुप्पी तोड़ते हुए पुछा

“तुम्हारे बाद, छोड़ने के बाद, मैंने कुछ दिन एक स्कूल में पढ़ाया. वहीँ उनसे मुलाकात हुई थी”

“तो वो अध्यापक थे आपकी तरह?”

“हाँ”

“लेकिन अमीर भी और वो भी खानदानी अमीर?” लड़के ने कहा

“हाँ, उनका परिवार था”

“तो उन्होंने आपको चुना? जैसे अमीर जवान लड़के करते हैं”उसकी बात मे कुंती को धिक्कार की तौंस महसूस हुई.

“नहीं” कुंती ने मजबूत होकर जवाब दिया. “हम दोनों ने एक दुसरे को चुना” ऐसे बोली जैसे सफाई दे रही हो

“और आपके बेटे?”

“पढ़ते हैं. बाहर”

“बाहर क्यों?”

“उन्होंने अपना स्कूल खुद चुना था” कुंती ने जवाब दिया. कुंती को अपने सभी बच्चों पर बड़ा गर्व था. बच्चों के विषय में बात शुरू होते ही वह स्वतःस्फूर्त हो स्वयं ही रूचि दिखाया करती थी. लेकिन लड़के के सामने आज वह हिचकिचा रही थी

उसपर लड़के ने कह दिया ” उन्होंने अपना स्कूल खुद चुना और देश कौन सा हो वो आपने?”

कुंती कुछ नहीं बोली. उन्हें इतने अपमान की आशा थी

“और तुम?” कुंती ने कुछ ठहर के प्रश् किया

“मैं कभी अपनी डिग्री पूरी नहीं कर पाया. किसी भी क्षेत्र में विशेषज्ञ नहीं. कुछ घटिया नौकरियां की कुछ महिलाओं के साथ औसत सम्बन्ध रह; लेकिन कुछ ऐसा नहीं जिसपर आपको गर्व हो ” लड़का मुश्किल से बोल पाया और फिर सिग्रेटे का कश खींचकर जैसे खुद को सँभालते हुए उसने कहा, “आपको शर्मिंदा करने के इरादे से नहीं बोला. सिर्फ इतना की मैं चाहता तो हूँ की मेरे पास भी गर्व करने लायक कुछ हो लेकिन कुछ हैं नहीं “और मुस्कुराने लगा जैसे अपनी लज्जा अपने संशय अपने संकोच को छुपा लेगा.

“हर जीवन की उपलब्धियां इतनी सीधी नहीं होती की उनको गिनाया जा सकता हो. कुछ जीवन मात्र जी पाना भी उपलभ्धि होती है” कुंती ने कहा

“बेहतरीन जवाब, जैसी आशा थी” कहकर लड़के ने कुंती के मरहम की खिल्ली उड़ा दी,” यकीन मानो मैंने क्षण भर को आपके इस तर्क को मान भी लिया था. देखो कैसे सीना गर्व से फूल गया है मेरा” कहते हुए वो फिर हंसने लगा.

कुंती ने कुछ चिढ़कर अपना रोष प्रकट किया, ” तो क्या यह सब ही चलेगा अगले १० दिन.  क्या ऐसे ही चलेगा अगले १० दिन?”

“चिंता मत कीजिये, आज के लिए बस यह बर्तन धोने भर से चल जायेगा” कहकर लड़का हँसता हुआ वहां से उठकर चल दिया

कुंती अपना गुबार लिए बर्तन समेटने लगी; उनके पास लड़के की बदमिजाजी का कोई उत्तर नहीं था.  अनबनऔर बढ़े यह किसी के लिए ठीक नहीं सोचकर वो अपनी नाराजगी भी जाहिर नहीं कर पायीं.

दूसरा दिन

कुंती ने सुबह की चाय बनाकर घर के बगीचे मे एक कुर्सी डाल ली. लड़के को तलाशने मे एक नज़र दौड़ाई लेकिन फिर छोड़ दिया.

हर सुबह वो टहलने निकल जाया करता था. उगते सूरज को देखना उसे बहुत अच्छा लगता था. घर के पीछे एक पहाड़ और उसके पीछे बहती गंगा. सुबह टहलते हुए भी उसकी सिग्रेटे नहीं छूटती थी. जैसे खुद को जला डालने पर आमादा हो. आज गंगा किनारे एक जख्मी मराल दिखा. प्राण उखड नहीं रहे थे, छटपटाता, क्षणिक आवेश में अपने शरीर को ऐंठ लेता और फिर ढीला छोड़ देता – दर्द असहनीय था. लड़का चुपचाप खड़ा उस मराल को जूझते देखता रहा, फिर अपनी जांघों पर रखकर अपने हाथ से उसे सहलाता रहा; और अंततः उसकी गर्दन मरोर दी.

“पीड़ा से मुक्ति का कभी-कभी मृत्यु ही एक मात्र विकल्प होता है.” मराल को मिटटी मे दबाते हुए उसने स्वयं को अपने इस कृत्य के लिए मानो माफ़ किया. अंदर एक प्रश्न ने भी जन्म लिया, मानसिक पीड़ा से मुक्ति का भी क्या यही एकमात्र विकल्प होगा? और वापस लौटते हुए बार बार उसने इसी सवाल पर एक सवाल और रक्खा, और यदि एकमात्र विकल्प मृत्यु ही है तो फिर यह सब प्रपंच क्यों? क्यों न उन्हें लौट जाने को कहूं

कुंती ने चाय पीकर कुछ देर लड़के का इंतज़ार किया फिर वो भी टहलने निकल गयी. पगडण्डी से होतीं हुई सड़क की तरफ बढ़ गयीं, जहाँ से पिछली शाम लड़का गाडी में उसे लाया था. रास्ते में एक गाओंवाले ने उसे रोका; “आप यहीं से हैं क्या?”

कुंती ने मुड़कर देखा, “अगर आप यहाँ के रास्तों से वाकिफ नहीं तो ध्यान रहे – यह सुरक्षित नहीं”

“नहीं बहुत समय बाद आयी हूँ यहाँ” कुंती ने कहा

“फिर आगे मत जाइए” राहगीर ने कहा, “आगे का जंगल सुरक्षित नहीं”

“यह पगडण्डी सड़क तक नहीं जाती क्या?”

“नहीं. वो रास्ता पीछे की और है”

कुंती वापस मुड़ गयी. बगीचेके पास पहुंची तो देखा लड़का आँगन में लगे नल के नीचे अपने बाल धो रहा था. मराल को दफ़नाने में उसके कपड़ों और बालों में मिटटी मानो भर गयी थी उसने आवाज लगायी  “आपकी मदद चाहिए”

“ठीक को तुम?” कुंती उसकी तरफ थोड़े तेज क़दमों से बढ़ी

“हाँ. एक मराल कराह रहा था नदी किनारे. शायद उसकी मुक्ति का प्रबंध मेरे हाथों था. मैंने भी आनाकानी नहीं की. उसको दफ़नाने में यह सब गन्दा हो गया”

कुंती को उसके शब्दों के चुनाव पर आश्चर्य हुआ. इतना कठोर ह्रदय! वो ठिठक गयी, “मराल को तुमने अपने हाथों से मार डाला?” लड़के ने नल के नीचे से अपना सर हटाकर ऊपर उठाया और एक नज़र कुंती को देखा, “और क्या करता? आप मदद करेंगी जरा बाल धोने में?”

“जरा कपडे बदल कर आती हूँ”

“चिंता मत कीजिये. अगर भीग भी गयीं तो सूख जाएँगी. आज मौसम खिला खिला है. भगवान् सूर्य आज सारा दिन आस पास ही रहने वाले हैं” लड़के ने नल में पाइप जोड़ा और दूसरा सिरा  कुंती की तरफ बढ़ाया

कुंती ने पाइप पकड़ा, लड़का कुर्सी पर बैठ गया और अपना सर पीछे की ओर लटकाया, “थोड़ा पानी डालिये.” लड़के ने बोलना जारी रक्खा, “उस मराल को क्या कभी आशा होगी की उसकी कराह से कोई मन उद्वेलित होगा? कोई आएगा उसकी मदद को? कोई उसको इस पीड़ा से मुक्त करेगा?”

कुंती ने उसके माथे के कोने पर अपने हाथ को खड़ा करके रक्खा, हिचकिचाते हुए; पूरा हाथ रखने की हिम्मत नहीं हुई और पाइप से पानी डाला. लड़के ने सहसा अपनी आँख खोली और दोनों की आँखे टकरायीं. लड़के की आँखों में प्रश्न था “क्यों? क्या में पुत्र नहीं?” और कुंती की आँखों में प्रश्न था, “क्या मुझे अधिकार है.इतने वर्षों के बाद भी?”

लड़के ने झटके से अपने बालों में हाथ फेरा और ऐसा करने से पीछे खड़ी कुंती की सफ़ेद साड़ी पर मिट्टी के दाग पड़ गए

“ध्यान से” कुंती हल्का सा पीछे हटी, “मैंने कहा था मैं कपडे बदलकर आती हूँ”

लड़का रुका नहीं. अपने सर से पानी निरंतर झटकता रहा. कुंती फिर बोली “ध्यान से”

“बस भी कीजिये, यह कोई बड़ी बात नहीं. ऐसा तो नहीं की आपकी साडी पर कोई छींट नहीं” लड़के ने कटाक्ष किया, “इतना ही तो हुआ है की अब वो दाग साफ़ साफ़ दिखने लगे हैं”

कुंती ने पीछे से आवाज दी, “क्या ऐसे ही चलेगा अगले १० दिन?”

“क्या?” लड़के ने मुड़कर पूछा

“यही छोटे छोटे खेल, देखने के लिए की मैं सह सकती हूँ या नहीं?”

“आपकी साडी से अगर दाग नहीं गए, तो इस नुकसान  के पैसे मैँ भर दूंगा

“मतलब?”

“महंगी होगी. नहीं? आपकी साडी.कितने की है?”

“मुझे अंदाज़ा नहीं”

“आपको होना चाहिए.कौन कितना और क्या है इसको ध्यान रखकर आपने यहाँ तक का सफर तय किया है; निश्चित ही आपको पता होना चाहिए” कुंती को यह गाली जैसा लगा; आरोप सहना आता है उनको; लड़का उन्हें दोष दे वो सहन कर सकती हैं लेकिन धिक्कारे? उनहोंने अपनी ठोड़ी पर हाथ फेरा. यह उनकी आदत थी; विचलित स्तिथि में यह उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती थी

“आपको कोई सस्ती चीज लेकर दे यह कैसे हो सकता है?”

कुंती और नहीं सह पायी. चुपचाप वहां से चली गयीं

तीसरा दिन

“मैं नीचे सड़क तक जा रही हूँ, कुछ सामान चाहिए मुझे. तुम्हे कुछ चाहिए?” कुंती ने सुबह पुछा

लड़का बागीचे में बैठा था. उसने कोई जवाब नहीं दिया. ऐसे जैसे उसने सुना ही न हो. कुंती क्षण भर इंतज़ार करती रही फिर निकल गयी.

उसने फिर फ़ोन के सिग्नल चेक किये. बाबा को फ़ोन मिलाया. लड़के का जिक्र आते ही बाबा ने पूछा “कुछ समझ में आया? क्या चाहता है वो?”

“वो घर पर ज्यादा समय नहीं रहता. सुबह ही कहीं बहार निकल जाता है, कभी दोपहर में लौटा तो लौटा वर्ना नहीं भी लौटता. काफी खाली समय रहता है मेरे पास” कुंती बोली, “कल सुबह नदी किनारे एक मराल को जख्मी पाया तो उसको मार डाला. लौटकर बोला दर्द से कराह रहा था, कोशिश करने पर भी नहीं बचता इसलिए मैंने उसे मार डाला. कभी कभी अजीब सा हो जाता है.कभी कभी जानबूझकर कुछ बहुत चुभ जाए ऐसी बात कर देता है”

बाबा चुपचाप सुनते रहे. कुंती ने थोड़ा रूककर धीरे से कहा, “बाबा! मैं जानती हूँ की आप मुझे कभी क्षमा नहीं करेंगे इस सब के लिए”

“मैं तुम्हे बहुत पहले क्षमा कर चुका कुंती.” दूसरी तरफ से आवाज आयी. “बहुत बहुत समय पहले”

कुंती अपने दाएं अंगूठे से अपनी तर्जिनी मे पड़े मूंगे को सहला रही थी; स्वतः ही उसमे तेजी आ गयी. जाने कहाँ से हिम्मत लायी पूछने की “कबसे पता है आपको बाबा?”

“सालों से. लेकिन मुझे कभी समझ नहीं आया की इस सन्दर्भ में अगर कुछ बात भी करूँ तो कैसे और क्या. इसलिए चुप रहना ही सही जाना”

कुंती ने फ़ोन काट दिया. चुपचाप धीमे क़दमों से वो वापस घर की ओर बढ़ चली. करण घर पर नहीं था. उसके कमरे मे जब वो घबराहट के साथ दाखिल हुई; तो उसके दिमाग मे एक आतंक पैदा हो रहा था, बैचेन कुंती को लगा कहीं करण के कमरे में दाखिल होकर वो एक और संकट को न्योता तो नहीं दे रही. ये डर उसे खींचकर बाहर ले आना चाहता था और उसकी जिज्ञासा उसे रुकने को बाध्य कर रही थी. कुंती ने करन के टेबल पर पड़ी डायरी की ढेरी में से एक उठाई;

“दिनांक २५ सितम्बर शाम ९ बजे

मानवी रूप में विकट सांपनी, अनैतिक, बेशरम, गन्दी, कुटिल – ऐसी भी किसी की माँ होती है करन? और यह जो मैँ ताड़ना देता हूँ उसको, जो शब्दों की चाबुक से रोज पीटता हूँ उसको, बार बार यूं कसकर कोड़े मारता हूँ; क्या कभी उसका अंतर्मन यूं ही धिक्कारता होगा उसको? ह्रदय के तल में कहीं तो जलन उठती होगी उसको? गली की कुतिया को देखा है करन, कैसे अपने नवजात पिल्लों की सुरक्षा हेतु आजकल आक्रामक हुई घूमती है – क्या मेरी माँ कुतिया सी भी नहीं? कैसे किया होगा अपने पुत्र का परित्याग. यूँ एक नवजात को, निःसहाय को छोड़कर चले जाना ऐसा तो पशु भी नहीं करता”

कुंती ने डायरी पटक दी. उसके नथुने फूल उठे.

“आपको वो नहीं पढ़नी चाहिए” करन कब पीछे आया कुंती को पता नहीं चला

“मुझे लगा तुम बाहर हो” कुंती हड़बड़ा गयी

“सामान मिला?”

“क्या?”

“आप सामान लेने गयी थीं न … मिला जो चाहिए था आपको?” करन ने पुछा

“हाँ”

“ठीक है. कुछ और चाहिए हो तो बता देना. मैँ ले आऊँगा आपके लिए. मैं बाहर जा रहा हूँ. शायद रात देर से लौटूंगा. खाना आपको स्वयं बनाना पड़ेगा”

“कहाँ चले. अभी तो लौटे हो?” कुंती धीमे क़दमों से उसकी तरफ बढ़ी. जैसे रोक लेगी उसको; लेकिन हिचकिचाहट थी उसमे.

“मेरा इंतज़ार मत कीजियेगा” कहते अपनी जैकेट उठाकर करन बाहर निकल गया.

वो क्षण भर भी और रुकता तो कुंती उसे गले से लगा लेती. करन कुंती को ऐसा कोई मौका ही नहीं देना चाहता था, वो तेजी से बहार निकल गया.

बाहर गाडी में बैठकर इंजन स्टार्ट किया लेकिन गाडी आगे बढ़ाई नहीं. एक्सेलरेटर पर पाओं दबाता रहा. खुद से ही कुछ बोला. फिर गाडी का हॉर्न बजाया. ठहरे रहा. कुंती ने ऊपर वाली मंजिल की खिड़की से बाहर झाँका. करन ने गाडी में सर झुकार ऊपर खिड़की की तरफ देखा और फिर हॉर्न बजाया. कुंती फटाफट अपना स्वेटर उठाकर घर से बाहर निकली और तीज क़दमों से चलती गाडी में आकर बैठ गयी. करन ने गाडी चला दी

 

 

 

 

“आपको पता है पापा को मैंने दफना दिया” करन ने गाडी आगे बढ़ाते ही कहा

किंकर्तव्यविमूढ़ कुंती ने उसकी तरफ देखा। उसको समझ ही नहीं आया की वो क्या कहे। करन कुंती की इस हालत पर धीमे से मुस्कुराया। कुंती को विचलित देखकर उसको अच्छा लगा। व्यग्र कुंती प्रतीक्षा में थी की करन कुछ कहेगा

“बिलकुल जहाँ आपको दफनाया था, ठीक उसकी बगल में. यही कोई ४-५ साल पहले. आपको पता है, मेरा एक ईसाई दोस्त है, उसके माँ बाप ४-५ साल पहले चल बसे. पहले माँ और फिर ६-८ महीने बाद पिता. उसने उनको दफनाया. हर हफ्ते वहां जाता है. लगभग हर हफ्ते मैं साथ जाता था उसके. पहले तो यूँ ही सिर्फ साथ भर के लिए चला जाता था. फिर एक दिन मुझे लगा की अगर मैं भी अपने माँ बाप को दफना दूँ तो कितना आसान हो जायेगा. हफ्ते में एक बार आया करूँगा, उनसे जो शिकवा है वो हफ्ते दर हफ्ते सांझा करता रहूंगा. इस रोज-रोज, इस हर समय के चक्कर से तो छूटूँगा. लगा आप दोनों को दफनाकर शायद आगे बढ़ सकूं. कभी-कभी किसी को याद करना; हररोज से तो आसान ही होगा. इसलिए मैंने पापा को दफना दिया.

कुंती स्तब्ध सुन रही थी; “आप चलोगी वहां?” उसने पूछा

“कहाँ?”

“जहाँ पापा और आपको दफनाया है मैंने। शीत के समाप्त होते ही वहाँ सूरजमुखी खिलेंगे। मैं हर साल इस समय वहां सूरजमुखी के कंद बो आता हूँ। बसंत के आते ही आप दोनों की कब्र पर सूरजमुखी खिलने लगते हैं। और सुबह से शाम तक जहाँ जहाँ सूर्य चलता है वहां वहां भागते रहते हैं। जैसे चाहते हों की उनपर भी सूर्य का प्रकाश पड़े; उन्हें भी कोई तो मान्य करे ”

“तुम क्या चाहते हो करन?” कुंती का दिल बैठा जा रहा था; उसके लिए अब यह दंश असहनीय होते जा रहे थे.

“अभी तो कुछ नहीं। अभी तो दिन बाकी हैं। मैं स्वयं भी ढूंढ रहा हूँ की मुझे आपसे आखिर चाहिए क्या । आप मिली हैं कभी उनसे”

“नहीं”

“क्यों? आप मिलना चाहेंगी उनसे?”

“नहीं”

“क्यों? अगर मैं पैदा नहीं होता तो आप मिलती उनसे? मुझे लगता है अगर मैं नहीं होता तो आप मिलतीं। लोग अपने पुराने मित्रों से मिलते हैं। आप भी मिलतीं।लेकिन मेरे होने में शर्मिंदगी है – शायद इसलिए न मिलना ही भला?”

कुंती चुप रहीं, पराजय जनित उद्वेग मे सिर्फ अपने मूंगे को कसकर रगड़ भर पायीं जैसे कह रहीं हूँ यह सहने की शक्ति दो ईश्वर

“हम कहाँ जा रहे हैं?” कुंती ने बात बदलनी चाही

“यहाँ नीचे गांव में एक शादी है; आपका मन बहल जायेगा. प्रेम विवाह है – अविवेकी जिज्ञासा जनित प्रेम और प्रेम विवाह. पहचाना पहचाना सा लगता है न?” करन के कटाक्ष तीखे होते जाते थे

कुंती चुप हो गयी. आंखें मूँद लीं. कुछ देर बाद करन ने गाडी रोकी. दोनों चलने लगे.

 

वापस कहानी की शुरुवात से: तीसरा दिन

“आपने उत्तर नहीं दिया; आप खुश हैं?”

फिर वही, कहीं से भी बात शुरू करो यहीं पहुँचती है; इस बार उसने उत्तर देना सही समझा, “बाबा को पता था; कई सालों से. मेरे पति को भी. शुरू से”

“और आपको आज पता लगा की उन्हें पता था?”

उसने धीमे से स्वीकृति में गर्दन हिलायी, एक मार्मिक उदास मुस्कराहट उसके चेहरे पर तैरी. करन आगे चल पड़ा, और पीछे पीछे माँ. अभी कुछ ही सीढ़ियां चढ़े होंगे की करन ने पीछे मुड़कर कहा

“आपको एक प्रश्न पूछने की छूट देता हूँ. कोई प्रश्न जो आपको पूछना हो? आपको वचन देता हूँ बिना किसी उपालम्भ बिना किसी शिकायत उतर दूंगा”

और माँ ने बिना एक भी क्षण खोये धीमे से पुछा, “और कोई भी जानता है?”

“क्या?” करन बोला

“इन १० दिनों के बारे में?”

“कौन? जैसे की कौन?” करन के प्रश्न मे रोष था

“मुझे नहीं पता….” करन के चेहरे के भाव बदल गए. माँ ने उसका हाथ पकड़कर रोकना चाहा लेकिन करन आगे बढ़ गया

इस घटना के बाद पूरी रात करन पर एक अजीब विद्रोह तारी रहा. अपनी प्रकृति के विपरीत वो किसी अलमस्त हाथी सा पल में उदास, दूसरे पल गुस्सा और घडी भर में अति उत्साही सा हो उठता. उसने शादी में कब पीनी शुरू की यह कुंती को पता ही नहीं चला. कुंती को शुरुवात में करन की इस भावनात्मक अस्थिरता ने कुछ आशा बँधायी की शायद करन बोले वो उसे १० दिन के लिए अपने साथ क्यों लाया है, लेकिन जल्द ही वो समझ गयी की स्थिति काबू से बाहर है.

“मैं तुम्हे तुम्हारी और तुम्हारे प्रेमी की कब्र पर खिले सूरजमुखी भेंट करूंगा। क्या तुम उन फूलों को अपनी आलिशान बैठक की शोभा बनाओगी? बोलो बना पयोगी?” करन कुंती के पास आया और बक बक करके फिर चला गया, कुंती चुपचाप उसकी हरकतें देखती रही. कुंती डर रही थी, यह सोचकर, की अगर करन शांत रूप मे इतनी कड़वाहट से भरा था तो नशे मे वो क्या करेगा. अंतर्मुखी करन के बहिर्मुखी हो जाने की स्थिति में वो क्या करेगी इसका उसके पास कोई उत्तर नहीं था

चौथा दिन

देर रात कुंती को गाडी चलानी पड़ी. उसने करन से पूछा भी था, “तुमने तो कहा था तुम पीते नहीं; फिर?”

“बकवास. कौन हो तुम?” कुंती के कन्धों से अपना हाथ हटाते ही वो धरती पर गिर पड़ा था. कुंती ने जैसे तैसे उसे गाडी में डाला और घर तक ले आयी. रास्ते में करन सो गया था. कोई बात नहीं हुई.

सुबह कुंती जल्दी उठ गयी. बीते दिन नीचे बाज़ार से वो सूरजमुखी के बीज खरीद लायी थी. शीत की ठण्ड कम होने लगी थी और यह सही मौसम था सूरजमुखी बीजने का. कुंती घर के पीछे के बगीचे में उन्ही बीजों को बो रही थी की करन ने पूछा, “सूरजमुखी यूँ ही नहीं उग जाता। आपके जाने के बाद इसको पानी कौन देगा? या आप चाहती हैं यह भी न खिल पाए?” करन की आखें लाल – सुर्ख लाल थी, आवाज भारी। उसके इतनी जल्दी उठ जाने की कुंती को आशा नहीं थी।

कुंती पीछे मुड़ी, “सूरजमुखी हैं, इन्हे पानी की ज्यादा जरूरत नहीं होती। इक बार अंकुरित हो जाने भर की देर है, उसके बाद इनकी जिजीविषा इनको जीवित रखती है। और अभी तो मैं हूँ यहाँ कुछ दिन.

करन कुंती को देखता रहा, अर्थपूर्ण संवाद के लिए कितनी ही बार भाषा की जरूरत नहीं होती. मुड़ते हुए वो खुद से बोलता हुआ चला, “इक बार अंकुरित हो जाने भर की देर है, उसके बाद इनकी जिजीविषा इनको जीवित रखती है” फिर मुड़कर बोला, “आप वापस चली जाएँ। अभी”

कुंती ने खुरपी चलाना रोका, “कहाँ? कहाँ चली जाऊं?”

“अपनी दुनिया में. मुझे नहीं लगता आपकी यहाँ जरूरत है; मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए”

“तो बस यही योजना थी?”

“नहीं, कोई योजना नहीं थी” और तेज चलने लगा. कुंती उसके पीछे तेज क़दमों से बढ़ी, “तो फिर तुम मुझे यहाँ क्यों लाये?”

“मै गलत था, मुझे माफ़ कीजिये”

“मै पिछले ३ दिनों से यहाँ हूँ, और मुझे नहीं पता की में यहाँ क्यों हूँ” कुंती ने एक खीज के साथ उसकी कमीज खींचकर उसे रोक लिया

करन मुड़ा, “मुझे नहीं पता की मुझे क्या कहना है; लेकिन आपने ठीक कहा सूरजमुखी बिना देखभाल अनुकूल मौसम के साथ खिल जाता है और मौसम के प्रतिकूल होने पर मुरझा जाता है. शायद मै यह भूल गया था. मुझे देखकर क्या लगता है आपको? मैं खिला दीखता हूँ आपको या मुरझाया हुआ”

“मुझे कहो की तुम चाहते क्या हो?” कुंती बोली, “या की बस तुम यही चाहते थे मुझे इस तरह…..तुम मुझे माफ़ नहीं करोगे, कभी भी नहीं – यह ही बताना चाहते हो?”

“नहीं, शायद मुझे आपके प्रति कोई असंतोष नहीं; मैं आपको माफ़ कर सकूँ इससे पहले मैं आपको दफना आया।माफ़ कर दूँ? कर चूका हूँ शायद। लेकिन क्या आपको महसूस होता है वैसे जैसा मुझे महसूस होता है? आप सूरजमुखी में करन और करन को सूरजमुखी होते देख पाती हैं? साडी पर लगे दाग को व्यक्तित्व पर लगे दाग जैसा देख पाती हैं? आपको होता है वैसा मानसिक कष्ट जैसा मुझे होता है जब मैं कुतिया को अपने पिल्लों को दुलारते देखता हूँ?”

फिर खुद को समेटकर करन ने कहा “मै चाहता हूँ आप यहाँ से चली जाएँ” करन ने आँख में आँख डालकर कहा और वहां से चला गया

दोपहर तक कुंती करन के लौटने का इंतज़ार करती रही. उसने एक बार फिर उसके कमरे में जाने का सहस जुटाया, उसकी डायरी उठाई और एक पन्ना खोला,

“दिनांक ११ नवंबर २० दोपहर १२ बजे

आज मंदिर में उस कथावाचक ने एक बड़ी आश्चर्यचकित कर देने वाली कहानी सुनाई. कहते हैं गंगा ने अपने ७ पुत्रों को पैदा होते ही स्वयं अपने हाथों से पानी में डुबाकर मार दिया था. और अपने आठवें पुत्र को भी वो यूँ ही डुबाकर मार डालती लेकिन उसके पति शान्तानु ने उसे टोक दिया. भीष्म बच गए.

चाहे वो कथावाचक कोई भी कारण देता रहे मै जानता हूँ चिरयुवति गंगा को अपने यौवन का अभिमान रहा होगा, वह मुग्धा, मोहिनी अपने ही यौवन पर मोहित नहीं समझ पायी होगी माँ होने का सुख. जानते हो करन संभ्रांत, अभिजात वर्ग की युवतियां ऐसी ही होती हैं. विश्वामित्र की पत्नी मेनका ने भी अपनी संतान को यूँ ही घाट पर छोड़ दिया था, हिंसक पशुओं का भोजन हो जाने को. मै अकेला नहीं जिसकी माँ ने नवजात शिशु को निर्दयता से छोड़ दिया हो. और मेरी माँ भी अकेली नहीं जो ऐसे कुकृत्य के बाद भी पूजी जाती हों. समाज शक्तिशाली की रखैल है करन.

कथावाचक कहता था, भीष्म जीवन भर जब भी संशय में हुआ अपनी माँ – गंगा के पास मार्गदर्शन को जाता रहा. सुनने में कितना असामान्य, कितना विचित्र लगता है; जिसने तुम्हारा तिरिस्कार किया तुम उसी के पास लौटे लेकिन क्या मुझे भी एक बार कोशिश करनी चाहिए करन? क्या मै भी जाऊं, मिलूं उससे जो मुझे छोड़कर चली गयी थी? क्यों पालूँ इतना वैमनस्य, इतना असंतोष उसके प्रति जिससे मिला नहीं कभी? कथावाचक कहता था, भीष्म के उसकी माँ गंगा के साथ, मत्स्यगंधी शकुंतला के उसकी माँ मेनका के साथ सम्बन्ध अच्छे रहे। कैसे करन? हो सकता है बच्चों ने ही कोशिश की हो। क्या मुझे एक बार मिलना चाहिए?”

कुंती को सम्भावना की पहली किरण दिखाई दी। डायरी रखकर वो दूसरी मंजिल से नीचे उतरी। करन कब लौटा और उसने कब दोपहर का खाना बनाना शुरू कर दिया उसको पता नहीं चला था। वो चुपचाप चिमनी के पास पड़े एक मुड़े पर बैठ गयी। कुंती को सर झुकाये बैठे देखकर करन ने कहा, “आप कल सुबह वापस चली जाएँ तो अच्छा रहेगा। मेरी डायरी से आपको सिर्फ इतना ही पता चलेगा की मेरा मन आपके बारे में हर दूसरे दिन पलट जाता है। आपके सामने आते ही आपसे जुड़ जाने की इच्छा दम तोड़ देती है। इतना तो मै ४ दिनों में समझ ही गया हूँ। कल शाम की ही बात ले लो। आपको मौका दिया  मुझसे एक प्रश्न पूछने का। और कहा भी की आप जो भी पूछेंगी मै जरूर उत्तर दूंगा. और आपने क्या पूछा।”

करन ने मुड़कर कुंती की तरफ देखकर उसका बीती शाम का प्रश् दोहराया, “और किसको पता है?” क्षण भर रूककर बोला, “धिक्कार है; अपने जीवन के आगे भी देख पाती हैं कभी आप?”

कुंती को सुनने की इच्छा थी। लेकिन करन से आँख मिला पाना संभव नहीं था. उसने आँखे नीची कर लीं

“डायरी के किसी पन्ने पर यह प्रश्न भी मिलेगा की आपको कभी आत्महत्या की चाह हुई होगी? कभी तो स्वप्न में मै आकर खड़ा हुआ हूँगा; बेजान, प्राणहीन। कितनी कठिन, क्रूर, निर्मोही होगी आप जो स्वप्न में अपने ही बच्चे को प्राणहीन देखकर भी अगली सुबह अपने हाथों पर आपको रक्त नहीं दिखा होगा।”

कुंती ने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने मूंगे को अपनी ऊँगली में अंगूठे के दबाव से धंसा दिया।

“आप ही कहो; अब किसको नहीं पता? आप स्वयं ही तो कह रही थीं कल गाडी में की बाबा को पता है, आपके पति को पता है। मुझे लगा अब जब सबको पता ही है तो आप निर्भय हो स्वयं ही कहेंगी; मेरे साथ चलो तुम। ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा की मुझे भी अस्वीकार कर दिया जायेगा। नहीं कर पायी पहले, जब करना चाहिए था, मुझसे अपराध हुआ, देर ही सही पर अब तुम चलो साथ.”

तुमने कल भी प्रश्न किया तो अपने स्वार्थ से प्रेरित; “और किसको पता है? माँ तो नहीं हो सकती तुम। माँ होती तो यह प्रश् नहीं पूछती. तुम कल वापस चली जाओ” करन कहकर कमरे से बाहर चला गया

 

 

 

 

 

 

 

पांचवा दिन

रात भर कुंती असमंजस में रही। सुबह से कुछ पहले उसने उठकर अपने कपडे समेटने भी शुरू किये। कई बार उसको यहाँ से चले जाना ही सबसे उचित लगा। फिर बार-बार उसका मस्तिष्क उसको कहता, चले जाने से क्या होगा। वो फिर लौटा तो वो क्या करेगी? लेकिन यहाँ रूककर भी क्या करेगी? फिर उसने छोड़ दिया। जैसे खुद से कहा हो, जाने न जाने का फैसला वैसे भी उसके हाथ में नहीं। यदि करन चाहेगा तो उसको रुकना ही होगा। ज्ञान का अनुबंध उसे याद आया। फिर खुद से ही कहा, लेकिन करन ने तो अनुबंध पढ़ा भी नहीं था। इस बारे में सोचना बंद करने की कोशिश में जितनी बार वो सर को झटकती थी उतनी बार एक नया विचार, नया प्रश्न अंकुरित हो उठता था.

आखिर बाहर चिड़ियों की चहचआहट और रोशनी उसकी मदद के लिए आयी। रसोई में आकर उसने चाय का पानी रखा, तुलसी के दो पत्ते डाले। करन ने ऊपर से उतरते हुए उसे आवाज़ देकर कहा, “मैं भी पियूँगा। थोड़ा पानी और दाल दीजिये”

उसने बिना कुछ कहे जग से थोड़ा पानी और दाल दिया। चाय दो प्यालों में डालकर कुंती करन के ठीक सामने आकर बैठ गयी। दोनों ने अपनी अपनी प्याली उठाई।

“आपसे कुछ माँगू तो मिलेगा?” करन ने पूछा

कुंती ने सर हिलाकर उत्तर दिया

“मुझे जीवन से कोई आशा नहीं। आपका मुझे छोड़ कर चले जाना मुझे निरंतर कष्ट पहुंचता है। मैंने आपसे १० दिन इस आशा से ही मांगे थे की मैं ही कोशिश करके देखता हूँ। लेकिन अलग अलग छोर पर खड़े हम चाहे जितनी संभावनाएं तलाशें कुछ होगा नहीं। यह तो हम दोनों ही जान चुके हैं?” करन ने प्रश्न के साथ विराम लिया

“सभवतः हाँ। लेकिन अगर तुम कुछ चाहो जिससे तुम्हारा जीवन सरल हो सके तो मैं पीछे नहीं हटूंगी”

“मराल याद है आपको। मुझे मेरी मनोव्यथा, इस कभी न समाप्त होती वेदना से मुक्त करने का भार उठायेंगी आप?” करन ने पूछा

कुंती निशब्द, निस्तब्ध। भीषण कष्ट, अथाह निराशा ने उसे घेर लिया। उसने जीवन में शायद अंतिम बार अपने मूंगे को छुआ, जैसे जीवन भर का सारा बल इस एक क्षण में एकत्र करना चाहती हो। उसने सर उठाकर करन की आँखों में आँखे डालकर देखा और कहा; “तुम यही चाहते हो?”

“हाँ। मेरी मुक्ति का और कोई साधन नहीं। आपके प्रेम और आपके स्वीकार लेने की आशा खो चूका हूँ। मुक्ति का और कोई साधन नहीं मेरे पास। आत्मदाह नहीं कर पाऊंगा, मेरे प्राण मेरा शरीर नहीं छोड़ेंगे। मैं मारल की तरह न जीवित रह पाऊंगा न मर ही पाऊंगा।”

“कब?” कुंती ने पूछा

“आज ही ”

“कैसे?”

करन ने अपनी कोट की जेब से एक छोटी सी शीशी निकलकर कुंती के सामने टेबल पर रख दी।

“अभी तुम्हारे पास ५ दिन बाकी हैँ?” कुंती ने प्रश्न किया

“वो मैं बचा के रखना चाहता हूँ। आपसे जब वहां मिलना होगा तो मुझे आशा है आप माँ बनकर मुझे ह्रदय से लगाने में संकोच नहीं करेंगी”

-समाप्त –

लेखक: सचिन मनन

मुझे कहानियां कहने का शौक है, आपको कहानियाँ पढ़ने का शौक होगा - अगर हाँ तो हम दोस्त हैं; अगर नहीं तो मुझे यकीन है मेरी कहानियां आप में यह शौक पैदा कर देंगी

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