हाँ! लेकिन बात तो हुई


सह-लेखक : अर्चना – उत्सुक पाठक और एक शानदार कवयित्री और निधि मेरी प्यारी पत्नी

मैं सुबह सुबह घर से ऑफिस के लिए निकला. ऑफिस पहुंचा, सारा दिन काम किया

शाम को ऑफिस बैग पकड़कर बहार निकला. सेक्टर १६ के मेट्रो स्टेशन से मेट्रो पकड़ी. ३ दोस्त भी थे साथ. मैं राजिव चौक तक उनके साथ रहा. राजिव चौक पर उतरा, गाडी में नई सवारियां चढ़ी. जो उतरे थे वो तेजी से आगे बढ़ गए.

मुझे तब एहसास हुआ की मैं भूल गया हूँ की मुझे जाना कहाँ है.  जाना तो घर है लेकिन मेरा घर कहाँ है?

मैंने बड़ी हसरत से गाडी की तरफ देखा, अगर गाडी रुक जाती तो जल्दी से दोस्तों से पूछ लेता. मैं भूला इसका मतलब यह थोाड़ा ही है की मेरे दोस्त भी भूल गए होंगे की मेरा घर कहाँ है. लेकिन गाडी निकल गयी.

फ़ोन!.. फ़ोन करता हूँ दोस्त को. यह सोचकर जेब में हाथ डाला. फ़ोन बंद. मुझे याद है बैटरी तो ऑफिस में ही कम थी. घर फ़ोन भी किया था बताने को, बैटरी कम है, परेशां मत होना, सीधा घर ही आ रहा हूँ घंटे भर में.

घर का नंबर याद है. १-२ दोस्तों का भी नंबर याद है.  किसी से फ़ोन लेकर घर फ़ोन कर लेता हूँ. है तो अटपटा लेकिन अब याद नहीं आ रहा तो और चारा क्या है. मैं खासा डरा हुआ था. यह पहले कभी नहीं हुआ था मेरे साथ.

“भाई साहब ! जरा फ़ोन देंगे. मेरा फ़ोन बंद हो गया है एक फ़ोन करना है साहब” मैंने एक हमसफ़र से गुजारिश की

उसने मना नहीं किया, लेकिन यह जरूर कहा, “कहाँ को जा रहे हैं? कश्मीरी गेट की तरफ जाना है तो साथ ही हो लो, रास्ते में मिला लेना. रुकना क्यों है”

वो जल्दी में था और मुझे सही सही नहीं पता था की क्या मुझे कश्मीरी गेट जाना है या नहीं. मैं शायद जवाब ढूढ़ने की कोशिश कर रहा था. मुझे इतना हैरान सा देखकर उसने फ़ोन मेरी तरफ बढ़ाया और कहा, “सब ठीक है न भाईसाहब”

“हैं?.. हाँ हाँ सब ठीक है, आप जल्दी में हैं शायद. लेकिन मुझे बस दो मिनट चाहिए” कहते हुए मैंने फ़ोन का कीपैड खोला.

कीपैड सामने था, फ़ोन नंबर भी याद था मुझे, 999961993  लेकिन कीपैड पर लिखे नंबर नहीं समझ पा रहा था, इनमे से कौन सा क्या है? सहसा मुझे एहसास हुआ की मुझे सख्या ज्ञान ही नहीं है. सुबह तो था, लेकिन शाम को नहीं, दिन में किस समय में सख्या को पहचानना भूल गया मुझे याद नहीं. मेरी घबराहट बहुत ज्यादा बढ़ गयी, दिल की धड़कन का इतना जोर से शोर करना मैंने कभी महसूस नहीं किया था.

“सर एक मदद करेंगे, यह एक नंबर मिला देंगे?” मैंने कहा

“भाईसाहब आप ठीक हैं न?” यक़ीनन वो आदमी भी घबरा गया. किसी को भी मुझे अनाड़ी मानने में बेहद परेशानी होती. कोई और होता तो मेरे व्यवहार को भद्दा मजाक मानता. उसने फिर पुछा, ” तबियत ठीक है न सर?”

“हैं?.. हाँ….हाँ सब ठीक है शायद सर. लेकिन मुझे याद नहीं आ रहा की मेरा घर कहाँ है. और मुझे अपना फ़ोन नंबर तो पता है सर लेकिन यह अक्षर जो हैं आपके फ़ोन पर यह समझ नहीं आ रहे”  मुझे इतना डर लग रहा था की इतनी अटपटी बात बोलने से भी में अब खुद को रोक नहीं पा रहा था. मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था

“भाई साहब आप, आप वहां आराम से बैठो एक मिनट.” मेरी बैचेनी देखकर उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे एक बैंच पर बैठाया. “नंबर दीजिये मुझे सर”

मैंने नंबर दिया तो उसने डायल करते हुए मुझसे पुछा, “किसका नंबर है सर ?”

“मेरी पत्नी का सर. वो क्या लिखा है” मैंने सामने लगे सुचना पट्ट को देखते हुए पूछा

“क्या?” नंबर डायल करते हुए जब  उसने सूचना पट्ट की तरफ देखा तभी फ़ोन से आवाज आयी

“हेलो” दूसरी  तरफ से आवाज आयी

“जी ! मैडम… यह आप बात कीजिये.” कहते हुए उसने अपना फ़ोन मेरी तरफ बढ़ा दिया

मैंने फ़ोन कान पर लगाया लेकिन दूसरी तरफ से क्या बोला जा रहा था मुझे समझ नहीं आया. कुछ आवाज तो आ रही थी दूसरी तरफ से लेकिन उन आवाजों का क्या मतलब था मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. मैंने फ़ोन वापस उस आदमी की तरफ बढ़ाते हुए कुछ कहना चाहा, लेकिन मेरे पास शब्द नहीं थे. मुझे एहसास हुआ की मैं कोई भाषा नहीं जानता. और भाषा के बिना संवाद कैसे हो. मैंने इशारे से कहा, “मुझे समझ नहीं आ रहा की दूसरी और से आती आवाजें क्या कह रही हैं.”

“आपकी पत्नी हैं सर” शायद उस आदमी ने मेरे इशारों से समझा की मैं पूछ रहा हूँ की कौन है. मैंने फिर इशारों से समझने की कोशिश की, ” मुझे समझ नहीं आ रहा की दूसरी और से आती आवाजें क्या कह रही हैं.”

उस आदमी ने सामने से आते जाते लोगों को रोककर कुछ कहा. धीरे धीरे भीड़ बढ़ने लगी. एक आदमी ने कहा

“अरे अगर इनको कुछ याद नहीं तो एक काम करो फ़ोन पर जो हैं उन्हें बता दो की यह साहब राजीव चौक पर खड़े हैं. वो आकर ले जाएँ.

उसके बाद किसने क्या किया मुझे कुछ समझ नहीं आया. मुझे सिर्फ इतना दिखा की एक खाकी वर्दी वाले आदमी ने मुझे एक गाडी में बिठाया और उसकी गाडी में थोड़ी देर बाद मुझे नींद लग गयी. हो सकता है मैं बेहोश हो गया हूँ. लेकिन उसके बाद जब उठा तो बिस्तर पर औंधा पड़ा था

मेरे आस पास घर के ही लोग खड़े थे. मैं सबको पहचानता था. लेकिन समस्या यह थीं की वो क्या बोल रहे थी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. मेरा भाषा ज्ञान, मेरी  संवाद की शक्ति, मेरा अक्षर ज्ञान, सब मुझसे छूट गया था. घबराहट, डर… नहीं घबराहट नहीं व्याकुलता  का अतिरेक… एक आकुलता, और एक  जटिलता. मैंने  बहुत कठनाई के साथ कुछ समझने की कोशिश तो की लेकिन कोई फायदा नहीं. प्रबल उद्योग के बाद मैंने हार मान ली और चुपचाप विष्मित सा इधर उधर देखने लगा

जब यूं ही पड़े पड़े मुझे बेचैनी होने लगी, जब चारों तरफ की आवाजों से में परेशान होने लगा, कोलाहल, सब बोलते ही चले जा रहे थे, डॉक्टर गुप्ता को घरवालों ने बुला लिया था, वो भी बोलते जाते थे, लेकिन मेरे लिए सब ची-पो, शोर के इलावा कुछ नहीं था तो मैं चुपचाप उठा, पहले गुसलखाने गया और फिर सीढ़ियां चढ़कर ऊपर छत पर चला आया. एक स्टूल उठाया और एक कोने में डालकर बैठ गया.

कुछ देर बाद सरला एक कप  चाय और २ ऱस लेकर ऊपर आयी, मेरी ही तरह या शायद मुझ से भी ज्यादा वो परेशान थी. उसने कुछ कहा, मैंने प्रश्नवाचक सा चेहरा बनाकर उसकी तरफ देखा. उसने धीरे से मेरे सर पर हाथ फेरा. थोड़ी देर तक साथ बैठी हाथ फेरती रही. फिर हम दोनों ही घबराहट के चलते  रोने  लगे. वो रोटी जाती थी और कुछ बोलती भी जाती थी.

थोड़ी देर बाद नीचे से एक आवाज आयी. सरला ने ऊपर से ही जवाब दिया, फिर मेरी तरफ देखा, कुछ बोली, खाली कप उठाया और नीचे चली गयी. उसके जाते ही एक आवाज आयी जो मुझे समझ पड़ी:-

“बोलकर गयी है माँ बुला रही है वापस आएगी”

मैंने आश्चर्यचकित होकर इधर उधर देखा. कोई नहीं था. कोई भी नहीं. किसने बोला? कौन बोला?

“तुमको मैं दिखाई नहीं दूंगा. लेकिन तुम मुझे सुन सकते हो; और मैं तुमको समझ सकता हूँ. शर्त सिर्फ एक है, यह सब तुम किसी और को नहीं बताओगे”

“मैं नहीं बताऊंगा. नहीं बताऊंगा. लेकिन तुम रहना साथ मेरे. मुझे हुआ क्या है; तुम जानते हो यह हो क्या रहा है”  मेरी हालत बिलकुल उस कैदी की तरह थी जो सबकुछ मानने को राजी था थोड़ी सी सजा में ढील के बदले.

“मुझे नहीं पता तुमको क्या हुआ है. लेकिन मैं उनको भी सुन समझ सकता हूँ और तुमको भी. बोलो क्या चाहते हो? सुनो सरला आ रही है वापस. तुम यह बोलना बंद करो”

मैंने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और बोलता रहा, “सुनो, सुनो, तुम जाना मत. यहीं रहो प्लीज. एक तुम ही हो जो मेरी बात सुन रहे हो”

सरला छत के दरवाजे पर खड़ी थी; उस समय के मेरे भाव और मेरी हरकतें किसी को भी डरा सकती. थीं. उसको समझ नहीं आ रहा था की वो मेरे पास आये या मुझसे बचकर दूर भागे. एक कदम मेरी तरफ आयी लेकिन हतप्रभ सी फिर पीछे मुड़ी और सीढ़ियों में आकर बोली, “माँ जरा ऊपर आना”

“वो डर रही है तुम्हारी हरकतों से. सुनो तुम चुप रहो. बिलकुल मत बोलो. उसको समझ नहीं आ रहा की वो क्या करे. मैं यही हूँ; कहीं नहीं जा रहा. तुम चुप रहो; वो जाएगी तो बोलना”

मैं बिलकुल चुप हो गया और टिकटिकी लगाए सरला की तरफ देखने लगा. किसी को भी मेरी यह हरकत और डरा देती. वही हुआ; सरला डरते हुए बोली, “आप ठीक हो?” लेकिन आगे नहीं बढ़ी.

मुझे कुछ समझ नहीं आया की वो क्या बोल रही है. स्वतः ही मेरी आँखे चौड़ी हो गयीं, जैसे आमतौर पर किसी चीज पर जरूरत से ज्यादा केंद्र करने पर हो जाती हैं. जैसे ही उसने सीढ़ी की तरफ देखकर माँ को दोबारा आवाज लगायी और उसका ध्यान मेरी और से क्षण भर को हटा मैंने कहा, “क्या कह रही है वो. जल्दी बोलो”

मुझे खुद से ही बड़बड़ाते देखकर सरला अब भयभीत थी. माँ के आते ही रोने लगी. माँ ने मेरी तरफ देखा और वो भी अचंभित, जैसे कोई मुर्ख किसी को देखकर समझने की कोशिश कर रहा हो की आखिर यह सब हो क्या रहा है. माँ के पीछे पीछे डॉक्टर गुप्ता जी भी आये, मेरे पास आकर उनहोंने एक इंजेक्शन मेरी बाजू में लगाया…

वो आवाज मेरे कानों में कहती जाती थी, “घबराओ मत, यह इंजेक्शन तुम्हे सुला देगा. मैं तुम्हारे सपने में आकर तुमसे बात करूंगा. यहाँ बात करना मुमकिन नहीं लगता. तुम्हारे बड़बड़ाने से लोग डर रहे हैं. मुझे डर है कहीं तुम्हे तुम्हारे ही घर वाले पागल न समझने लगें.

(2)

खूब हरियाली. चारों तरफ सरसों फैली हुई. और इस हरयाली से भरे मैदान में सिर्फ एक घर. कच्चा मकान जिसे ईंट गारे से जोड़ा गया था. घर के ऊपर खपरैल और खरपैल पर पशुओं के लिए चारा. घर में सिर्फ एक ही कमरा. कमरे में सिर्फ एक ही खटिया. घर का दरवाजा टुटा हुआ. चौखट के कील निकले शायद बहुत दिन हो गए. दरवाजा खुला हुआ और दरवाजे से अंदर आती ठंडी हवा. अंदर जमीन पर एक आदमी लेटा हुआ. उम्र यही कुछ मुश्किल से ३५- ४० के बीच की. लगातार खांसता और बीच बीच में मुहं से निकलती लार को पास पड़े एक कपडे से पोंछ लेता.  उठने का प्रयत्न करने पर भी उठ नहीं पता था. हारकर उसने पास ही पड़े बेलन को उठाकर जमीन पर दो चार बार खड़काया

बाहर से एक औरत अंदर आयी. यही कुछ ३४-२७ साल की. बालों में अभी सफेदी उतरी ही थी, कहीं कोई एक आधा बाल सफ़ेद. अंदर आते ही समझ गयी आदमी को क्या चाहिए. चुपचाप पानी उठाकर उसे पानी पिलाया. थोड़ी देर उसके पास बैठी उसके सर में हाथ फेरती रही. आदमी में कहीं कोई हिम्मत ही नहीं की कुछ कहे. कोशिश भी करे तो खांसी ही नहीं रूकती. औरत ने मुल्लठी की एक दातुन उसके हाथ में पकड़ा दी और बाहर निकल गयी. वो धीरे धीरे उसे चबाने लगा.

“कैसे हो?” आवाज आयी

“कौन ?”

“कहा नहीं था की तुम्हारे सोते ही सपने में आयूँगा. बोलो कैसे हो?” आवाज ने कहा

“क्या हुआ है मुझे ?” लेटे हुए आदमी ने पुछा

“कहा तो था की मुझे नहीं पता तुम्हे क्या हुआ.  मैं कोई डॉक्टर नहीं हूँ भाई.” आवाज ने जवाब दिया

“तुम हो कौन?”

“देखो ध्यान से सुनो, मैं तुम्हारे सपने में आता रहूँगा – रोजाना. लेकिन शर्त एक ही है. सिर्फ तीन सवालों का जवाब दूंगा. और तीन सवालों के बाद चला जाऊंगा. एक और बात, हर हफ्ते एक बार तुम जो कहोगे वो मैं तुम्हारे लिए करूँगा. लेकिन ध्यान रहे तुम्हे ठीक नहीं कर सकता. तुम्हारी असल जिंदगी में कोई फर्क नहीं ला सकता. सिर्फ इस सपने की जिंदगी में तुम जो बोलो कर दूंगा. इस बीच अगर तुम ठीक हो गए तो तुम्हे वैसे भी ये सब याद नहीं रहेगा. बोलो मंजूर??”

“पता नहीं मंजूर की नहीं…. एक बात बताओ तुम हो कौन?” लेटे हुए आदमी ने पूछा

“एक ही सवाल दो बार पूछोगे तो २ सवाल काउंट होंगे. अब तुमने अपने आज के ३ सवाल पूछ लिए. “तुम हो कौन?” यह तुमने २ बार पूछ डाला और उससे पहले “क्या हुआ है मुझे?” तो ३ का कोटा हो गया पूरा. अब उत्तर सुनो, “मैं वो हूँ जो इस स्थिति में भी तुम्हे सुन सकता हूँ समझ सकता हूँ और जिसे तुम भी सुन सकते हो और समझ सकते हो. ऐसा एक ही आदमी हो सकता है – तुम खुद – तो जान लो मैं और कोई नहीं तुम हूँ. और यह भी जान लो की जब तुम, तुम से ही बातें करते पकडे जाओगे तो लोग तुम्हे सिरफिरा कहेंगे. इसलिए हो सके तो तुम मुझे तब मत बुलाना जब आस पास लोग हों; हो सके तो जागते हुए मुझसे बात ही नहीं करना” तो मैं चलता हूँ.

फिर जाने से पहले वो आवाज़ मुड़ी और बोली “देखो क्योंकि आज पहला दिन है इसलिए एक एक्स्ट्रा बात बताते जा रहा हूँ – जैसे डिस्काउंट होता है न – एक के साथ एक फ्री – यह जो औरत आयी थी न अंदर, जिसने तुम्हे पानी पिलाया था, सर पर हाथ फेरा था – यह सरला थी”

चौंक कर मेरी आँख खुल गयी. उठा तो वही पहली सी स्थिति. जानता हूँ की अपने घर पर हूँ लेकिन न भाषा ज्ञान न संवाद की कोई गुंजाइश. बस एक सन्नाटा. मैं खुद से ही कुछ बुदबुदाया, इस विचार से की जो सुन पा रहा है शायद वो जवाब देगा. लेकिन कोई जवाब नहीं. मुझे याद आया उसने कहा था, “मैं तुम्हारे सपने में आता रहूँगा – रोजाना. लेकिन शर्त एक ही है. सिर्फ तीन सवालों का जवाब दूंगा. और तीन सवालों के बाद चला जाऊंगा…….बोलो मंजूर??”

मैंने झट कहा “मंजूर” और जब कोई पलटकर नहीं बोलै तो फिर कहा, “भाई! सुनो, मंजूर”

लेकिन पलटकर कोई जवाब नहीं आया. मैं सपने में नहीं था और उसने कहा था की वो सपने में मेरे पास आएगा. मैंने फिर आँखे बंद कर लीं. इंजेक्शन की गफलत अभी थी. थोड़ी जद्दोजहद करनी पड़ी लेकिन नींद लग गयी.

 

नींद में फिर वही खपरैल का घर और जमीन पर लेटा वही आदमी. उसके पास ही वो औरत बैठी थी और एक एक कौर उसकी तरफ बढाती. वो इतनी ही हिम्मत कर पता की जब कौर मुहं के नज़दीक पहुँचता तो वो अपना मुहं खोल लेता. कौर मुहं में रखकर धीरे धीरे उसे चबाता जाता. एक एक कौर का यह सिलसिला लगता घंटों चलता ही जा रहा है. बीच-बीच में उस आदमी को कोई हिलता मनो उसे कुछ और करने को कह रहा हो; लेकिन वो आदमी सिर्फ एक बैल की तरह जुगाली ही करता जाता था.

दरअसल वो दूसरा आदमी मैं ही था जो लेटे हुए आदमी को झकझोर रहा था. मैं चाहता था की वो लेटा हुआ आदमी कुछ तो बोले, कुछ तो करे की प्रतिउत्तर में कोई आवाज आये. मेरी रूचि तो उसी प्रतिउत्तर वाले में थी. यह संघर्ष बड़ी देर तक चलता रहा. और अंततः मैं इतना झुंझला गया की उसी झुंझलाहट  में मेरी नींद टूट गयी.

मैं समझ गया की वो आवाज अब आज तो लौटकर नहीं आने वाली. उसने कहा था “मैं तुम्हारे सपने में आता रहूँगा – रोजाना…..”

अब वो कल ही लौटेगा. मेरे लिए बस वो ही सहारा था. बाहर की दुनिया में न मुझे कुछ समझ आ रहा था न ही मुझे कोई समझ पा रहा था. डॉक्टर जब इलाज करेगा तब करेगा; जब आराम आएगा तब आएगा. अभी के लिए बस एक ही सहारा था और वो सहारा अगली रात का आश्वासन देकर जा चुका था.

अगली रात के आने से पहले मैं सोचता रहा की आखिर उससे सवाल क्या पूछने हैं? दिन भर मेरे आस पास घर बाहर के कितने ही लोग आकर बैठे. सभी कभी मुझसे कुछ बोलते तो कभी आपस में बातें करते. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. लेकिन मैं हर आदमी को पहचान रहा था. हर नए आदमी के आने पर मेरे मन में उठता की रात को उस आवाज से यही पूछूंगा की यह आदमी कह क्या रहा था.

(3)

“तो शुरू करें?” आवाज ने कहा

मैं घर के बाहर चारपाई पर बैठा था. सरला कुछ दूर चौका लेप रही थी. मैंने जवाब में कहा “हाँ. शुरू करते हैं”

“पूछो फिर?”

“मैं ऐसे जमीन पर क्यों पड़ा था? खांसता ही जाता था. हुआ क्या है मुझे? अभी भी चारपाई पर अधमरा सा पड़ा हूँ; क्या बीमार हूँ?” मैंने पूछा

“तुम भूल गए दोस्त. तुम अभी सपने में हो. सपना तुम्हारी सच्चाई नहीं दोस्त.क्या तुम सचमुच यही प्रश् पूछना चाहते थे?” और फिर बिना मुझे उत्तर देने का मौका दिए बोला, ” लेकिन अब तुमने सवाल पूछ लिया है तो जवाब सुनो. तुम जमीन पर इसलिए पड़े हो क्योंकि वो औरत – सरला – जो चौका लेप रही है और तुम्हारी देखभाल के लिए बार बार तुम्हारे सिरहाने आती है वह गत ५ वर्षों से तुम्हे धीमे धीमे जहर देती आयी है. और अब आखिरकार उस जहर ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है.” फिर एक तेज हवा का झोंका मेरे पूरे बदन से होकर गुजरा जैसे उस आवाज ने मेरे सर पर हाथ फेरा हो.

“तुम मुझे फंसा रहे हो” मैं उलझन में था, “मुझे पता है की मुझे अपनी असल जिंदगी को लेकर सवाल पूछना चाहिए लेकिन…… कल तुम जाते जाते कह गए थे की यह औरत सरला है. आज फिर सपने में सिर्फ मैं हूँ और वही औरत. मैं समझ नहीं पाया की यह क्या गोरखधन्दा है और गलत सवाल पूछ बैठा” फिर बड़ी विनम्रता से पूछा, “सुनो, तुम ही बताओ ऐसा कैसे हो सकता है की यह सरला हो?”

“मैं भी तुम हूँ, तुम तो तुम हो ही, तुम्हारे जीवन का खूंटा सरला से बंधा है, लौट लौट कर वहीँ तो जाते हो तुम तुम्हारे सपने की यह औरत भी सरला है. तुम अपनी सच्चाई को सपने में जल्दी जल्दी बदल रहे हो. कितनी बार कहा है तुमने; रिटायर होकर दूर कहीं गांव में जाकर रहूँगा.” उसने बोलना जारी रक्खा “तुम बहुत जल्दी उस जहर से मर जाओगे. और तुम्हारे मरने के बाद सरला अपने पिता के पास वापस लौट जाएगी. यह सपना जब अपने निष्कर्ष पर पहुंचेगा तब मैं भी वापस लौट जाऊंगा; वहां जहाँ से मैं आया हूँ. तुम भी शून्य हो जाओगे और मैं भी”

मेरे कंधे पर हाथ रखकर उसने कहा “तुम्हारे पास एक ही रास्ता है दोस्त – अपने सपने में स्वयं को जीवित रखो. अगर तुम मरे तो सपना समाप्त”

“यह क्या घचपच है. कुछ समझ नहीं आ रहा. सपने में जो सरला है वो भी मेरी पत्नी है; बाहर जो सरला है वो भी मेरी पत्नी है. यह सरला मुझे पिछले ५ साल से जहर दे रही है, वो सरला रो रो कर खुद मरने को है. एक सवाल है, तुम बोलो मैं क्या करूँ? ”

“मैं भी तो तुम्हारी ही सोच हूँ. मैं तुम्हारे लिए कैसे सोचूं. मेरे लिए और अपने लिए और सरला के लिए और अपने जीवन के लिए – इन सबके लिए सोचना तुम्हारा दायित्व है” फिर आगे बोला, “मैं गुत्थी सुलझाने में मदद कर सकता हूँ; गुत्थी सुलझाकर परोस नहीं सकता”

“ठीक – ठीक. जरा सोचने दो मुझे.” और फिर कुछ सोचकर मैंने बोला, “यह सरला कुछ बोलती क्यों नहीं? सपने में मैंने इसे कुछ बोलते नहीं देखा कभी”

“तुम चाहते हो यह बोले?”

“हाँ”

“ठीक है, तो इस हफ्ते मैं तुम्हारी यह एक बात मानता हूँ, कल से सरला और तुम बात कर पाओगे”

 

 

(4)

रात का समय. सरला आँखे बंद किये लेटी हुई है – अचेत नहीं, उसको पता है की मैं कमरे में बैठा पिछली रात का बना मुर्गा निपटा रहा हूँ; वो पिछले ५ सालों से ऐसे ही सोती है जैसे भ्रूण माँ की कोख में. अपने घुटने अपने पेट से सटाये. उसकी आंखें असहज सी बंद हैं, दूर से ही पता चलता है की वो सोई नहीं है. मैं खाना निपटा कर उसकी बगल में लेट जाता हूँ. धीरे से अपना हाथ उसकी बाजू के नीचे से निकाल उसके वक्षस्थल पर रखकर उसको खुद से कसता हूँ. वो असहज होकर थोड़ा दूर हो जाती है. कुछ देर उसके पास होने की कोशिश चलती है फिर अपमानित सा मैं दूसरी तरफ पलट कर सो जाता हूँ

अगले दिन सुबह हम दोनों एक पहाड़ी पर चढ़ रहे हैं. उसको पीठ पर इतना बड़ा थैला बांधकर चलने में कठनाई हो रही है तो मैंने उसका थैला भी अपने कंधे पर ले लिया है. देर तक हम चलते रहे. एक चाय की टपरी देखकर उसने कहा;

“कुछ देर ठहर जाएँ?” सरला ने पहली बार सपने में कुछ बोला. मैं जो दूर खड़ा यह सब देख रहा था मन ही मन मुस्कुराया, आवाज़ ने अपना वादा पूरा किया था

मैंने पीछे मुड़कर देखा. वो हांफ रही थी. मैंने बिना कुछ कहे थैला नीचे रख दिया. वो बैठ गयी. चाय के साथ पाव भर प्याज़ भाजी लेकर दोनों बैठे. सरला को प्याज़ भाजी सचमुच पसंद थी. चाय ख़तम हुई तो दोनों यंत्रवत उठे और चलने लगे.

पहाड़ी के पार सरसों के खेतों की कटाई का काम था. दोनों वहां पहुंचकर अपने अपने काम में लग गए और फिर शाम ढले उसी तरह वापस घर लौट आये. सरला ने लौटकर चौका संभाला और मैंने नहा धोकर संध्या आरती. रात दोनों खाने की मेज पर थे की सरला बोली

“दर्द रहता है आजकल. थकावट भी.”

“स्वाभाविक है सरला.” मैंने कहा

“शहह … चुप रहो. तुम बड़बड़ा रहे हो. सरला सुन लेगी” सहसा आवाज आयी

“हैं! कहाँ थे तुम इतनी देर? मैं अकेला था इतनी देर से” मैंने ऐसे कहा जैसे मैं उसका मालिक हूँ और वो आवाज मेरे इशारे पर चलती हो.

“दुनिया में सिर्फ एक तुम ही तो नहीं जिसकी हर रात मैं मदद करता हूँ. और भी हैं. लेकिन सुनो यूँ बड़बड़ाया न करो, सरला तुम्हारे साथ सोती है, और आजकल तो बहुत कच्ची नींद सोती है, तुम्हारे इस तरह बड़बड़ाने को जाने क्या समझेगी”

मैंने धीमे से सर हिलाया. इतनी एहतियात से की कहीं मेरे सर हिलना भी कहीं सरला को उठा न दे

वो हंसा “यह क्या कर रहे हो. हम सपने में हैं; इतना डर क्यों रहे हो. हाँ तो क्या बड़बड़ा रहे थे?” आवाज़ ने पूछा

“सरला जब गर्भ से थी तो उसको भी बहुत थकावट होती थी, यही कह रहा था की स्वाभाविक है”

उसने मेरी बात को अनसुना सा कर दिया और बोला “तुमने नोट किया, आज तुम बीमार नहीं हो सपने में, तुम्हे नहीं लगता की तुम खासे जवान लग रहे हो आज. और सरला भी. देखो उसके बालों में कोई सफ़ेद लकीर नहीं है आज”

मैंने ध्यान से देखा. बेचैनी बढ़ने लगी, परेशानी के साथ मुझे लगा यह आवाज मुझे भ्रमित करने में लगी है- इसका एक मात्र उद्देश्य है मुझे पागल कर देना. “मैं बीमार क्यों नहीं हूँ आज?” सहसा मैंने पूछा.

“इसका उत्तर तो आसान है. तुम कल से सोच रहे हो की सरला तुम्हें जहर क्यों दे रही है पिछले ५ वर्षों से. इसलिए आज तुम्हारा सपना वहां से शुरू हुआ जहाँ सरला और तुम नयी नयी शादी करके आये थे. याद है दोनों काम पर जाया करते थे. फिर एक दिन तुमने सरला से कहा था, तुम थक जाती हो सरला; तुम जॉब छोड़ दो मैं मैनेज कर लूँगा.”

“और उसने मेरी बात मान भी ली थी.” मैंने जवाब दिया, “एक बात कहूं; तुम गलती कर रहे हो. सोचो तुम कल सपने मैं आओ और देखो की तुम यहाँ मरे पड़े हो तो फिर क्या करोगे. तुम इस खेल के रूल सीखने में देर लगा रहे हो दोस्त. सब चुटकी में ख़तम. मैं लौटकर नहीं आऊँगा दोस्त. तुम्हे ठीक से और जल्दी से सीखना होगा.”

“तुम मेरा एक काम करोगे?”

“क्या?”

“मैं सोच रहा हूँ की मैं अभी कुछ बड़बड़ाऊँगा. देर तक. निश्चित ही सरला सुनेगी. निश्चित ही वो सुबह इस बारे में बात करेगी. क्या तुम जब कल लौटोगे तो मुझे बताओगे की वो क्या बात कर रही थी?”

“तुम्हारे लिए यह भी सही. पहला हफ्ता है तुम्हारा. कायदा तो कहता है की एक हफ्ते में मैं तुम्हारा एक ही काम करूँ; लेकिन कोई बात नहीं – मान रहा हूँ. कल बताऊंगा. कोई और सवाल पूछना है तुम्हे?”

“नहीं अभी नहीं. लेकिन तुम रुके रहो, मैं सरला से बात करने की कोशिश करता हूँ” और इतना कहकर मैंने दोबारा उन दोनों की तरफ देखना शुरू किया.

सरला घर के बाहर खड़ी थी. दूर कहीं सूरज निकलने को बेताब था. उसी तरफ टिकटिकी लगाए सरला देखती जा रही थी. तेज हवा उसकी कनपटी में अटके बालों को उड़ाती, वो फिर उन्हें कनपटी पर उलझाती और हवा फिर उड़ा देती. देर तक यह सिलसिला चलता रहा. इस तरह केंद्रीभूत सरला की आँखों से पहले एक आँसूं टपका और फिर अचानक वो सिसकने लगी. उसने पहले अपने होठों को दबाया की कहीं वो फूट न पड़े लेकिन फिर नहीं रोक पायी. मैं कमरे से बाहर निकला और उसकी तरफ दौड़ा. उसके पास पहुंचा तो देखा उसके पैरों की पास की जमीन पर खून के छींटे पड़े हुए हैं. उसकी सलवार के पोछें पर नज़र पड़ी और फिर ऊपर की तरफ उठती चली गयी. मैंने उसे कसकर पीछे से पकड़ लिया और रोने लगा, सरला, छोड़ दे सरला, सबकुछ, मैं देख लूँगा

“सरला वो मेरी गलती नहीं थी, मुझे नहीं पता था, तुम्हे भी कहाँ पता था. सरला मैं शर्मिंदा हूँ. लेकिन हमने उसको नहीं मारा सरला. हमको पता ही नहीं चला” मैं बड़बड़ाने लगा.

उस आवाज़ ने सही कहा था, सपने में मैं और सरला ही थी. सरला का वो गर्भपात भी इतना ही दुखदायी था. “सरला इस दुःख से बाहर तो आना ही होगा हमको. सरला उसकी मौत के लिए क्या तुम मुझे जिम्मेदार मानती हो? छोड़ दो सरला; मैं देख लूँगा” मैं बड़बड़ाता रहा और फिर मेरी नींद खुल गयी.

सरला सन्न मुझे देख रही थी. फिर कुछ बोली; मुझे कसकर गले से लगाकर रोने लगी. उठते ही मेरी स्तिथि बहरहाल वैसी ही थी थी; न भाषा का ज्ञान न संवाद की गुंजाईश. सरला को मैं निस्सहाय रोते बिलखते देख रहा था. उसने माँ को बुलाया और बोली;

“शायद मेरे मिसकैरिज को याद करके कुछ बड़बड़ा रहे थे. बार बार कहते थे छोड़ दो सरला मैं देख लूँगा.” बोलते बोलते रोती जाती थी. “शायद मेरी जॉब छोड़ने की बात याद कर रहे थे, मिसकैरिज के बाद हमने जॉब छोड़ देने का फैसला किया था न – शायद वही सपने में आया होगा”

(5)

दिन की किसी भी घटना की बात करना बेकार होगा. उसका इस कहानी से अब कोई वास्ता ही नहीं. मेरी स्तिथि वास्तविक जीवन में ठीक होगी नहीं होगी मुझे नहीं पता. अब जो होगा सपने में ही होगा. मैं रात का इंतज़ार करने लगा. मुझे अब सिरफिरा कहा जा सकता था. वास्तविकता से मेरा नाता टूटता जा रहा था. अभी दिन में बैठे बैठे मैं खुद से ही बोलता रहूं वो स्थिति तो नहीं आयी थी लेकिन दिन भर मैं रात होने का इंतज़ार करता रहता था. दिन में कई बार सोने की कोशिश भी करता लेकिन दिन में नींद आने पर भी सपना नहीं आता था

सरला मुझे छोड़ कर जा चुकी है. बिलकुल वैसे जैसे आवाज़ ने कहा था. “जब मैं मर जाऊँगा तो सरला अपने पिता के घर वापस चली जाएगी”.शायद वो मेरे मरने तक के लिए भी नहीं रुकी. मैं अकेला चारपाई पर बैठा सांस बड़ी कठिनाई से तेज तेज खींच रहा था. सांस लेने में इससे पहले मुझे कभी इतनी दिक्कत नहीं हुई. कुछ देर बैठा रहा, फिर जब नहीं बैठा गया तो अंदर आकर चारपाई पर लेट गया. रात में अकेले होने का डर अभी से सताने लगा था. क्या पता रात तक सांस खींच भी पाऊं या नहीं? दूर खड़ा मैं जब खुद को ऐसी हालत में देख रहा था तो एक ही ख़याल चल रहा था, अगर मैं आज रात सपने में मर गया तो क्या होगा?

“कुछ नहीं होगा? डरो मत.  तुम आज के सपने में नहीं मरने वाले. घबराओ नहीं. “आवाज ने कहा

“क्या कहती थी सरला? तुमने सुना? क्या कहती थी वो.” मैंने सपने को अपने पर इस बार भारी नहीं होने दिया. जो सोचकर आया था वही प्रश् पूछा

“उसे लगा तुम उसके मिसकैरिज के बारे में बड़बड़ा रहे थे.”

“और?”

“कहती थी की उसने तो कभी इस बारे में कुछ नहीं कहा.कोई शिकायत नहीं की. तुमपर कभी दोष नहीं दिया. कहती थी वो तो कब का उस वाकिये को भूल जीवन में आगे बढ़ चुकी है. लेकिन शायद तुम्हे अभी भी वो सब कचोटता है; अभी तक मन में है.  शायद इसीलिए यूँ नींद में बड़बड़ा रहे थे”

“तुमने देखा नहीं था कल क्या हुआ? सरला मैदान में खड़ी दूर सूर्योदय को एक टक देख रही थी. और रोती जाती थी. हमारा बच्चा वो सूर्योदय था जो हमने नहीं देखा” मैंने कल के सपने को इंगित कर कहा

“बस दिन भर इसी बात के इर्द गिर्द ही बातें होती रहीं. कई बार सरला बोली; अगर एक बार यह मेरी सुनें तो मैं इन्हे बताऊँ की मुझे कोई शिकवा नहीं” आवाज़ ने कहा और फिर यकायक बोला, “तुम्हे पता है सरला अपने पिता के पास चली गयी”

“कौन?” मैंने अचम्भे से पूछा

“अरे! देखते नहीं तुम अकेले पड़े हो. सरला अपने पिता के पास चली गयी” आवाज़ ने कहा

“हाँ ऐसा ही लगता है. मैं अकेला पड़ा हूँ. लेकिन तुमने तो कहा था की वो मेरे मरने पर जाएगी. अभी क्यों चली गयी?”

“मुझे नहीं पता. हो सकता है तुम्हे लगता हो की वो तुमसे इतना प्यार करती है की तुम्हे मरता नहीं देख सकती इसलिए तुमने अपने सपने में परिवर्तन कर दिया हो. या हो सकता है तुम्हे लगता हो वो तुम्हे न मरने देगी न जीने इसलिए तुमने उसे जीवन से निकल फैकना ठीक समझा हो”

मैंने ठान रखा था की आज मैं भ्रमित नहीं होऊंगा. उसकी बात को अनसुना कर मैंने कहा “अच्छा सुनो; क्या सरला कहती थी की अगर एक बार मैं उसकी सुन लूँ तो तो वो मुझे बताये की उसे कोई शिकवा नहीं”

“हाँ कहती तो थी.” आवाज़ ने कहा

“तो क्या हम उसको भी इस सपने में ला सकते हैं. क्यों न हम कुछ ऐसा करें की सरला को भी सपने में ले आए. सपने में तो हम बात कर सकते हैं न”

“सरला है तो सपने में”

“कहाँ है?”

“आज नहीं है; क्या पता कल फिर आ जाये. सपना तो तुम्हारा है. मैं भी तुम हो और तुम भी तुम. सपने का क्या है. कहीं और से शुरू करना कल. एक बात ध्यान रखना. मैं सिर्फ सिरफिरों से बात कर सकता हूँ” इतना कहकर वो क्षण भर को ठिठका. शायद मुझे सिरफिरा कहना उसे अच्छा नहीं लगा. फिर बोला, “एक बात सोचो अगर तुम सरला को सपने में ले भी आये तो वो असली सरला थोड़ा ही होगी”

सरला जा चुकी थी. आदमी कभी बैचैन होकर उठ बैठता, कभी फिर लेट जाता. दिन ढलने लगा तो उसको भूख भी लगने लगी. उसने उठकर जो पिछले दिन का बना पड़ा था वही टटोला; एक थाली में डाला और बैठकर खाने लगा. सरला की बात याद आयी; कुछ बनाना सीख लोगे तो आसानी होगी. मैं कभी कहीं चली गयी तो भूखे मर जाओगे. खाकर उसने बर्तन चौके के पास रखे, वहीँ पास ही में लकड़ी का बना एक पालना पड़ा था. उसको याद आया, सरला के गर्भपात के बाद वर्षों तक वो सरला को समझाता रहा था की उन दोनों को फिर से कोशिश करनी चाहिए. पालने पर उन दोनों ने मिलकर एक नाम गोदा था, “पल”. उस नाम पर वो बड़ी देर तक हाथ फेरता रहा. पल भर में कैसे सब बदल गया था. सरला उसके बाद इतनी डर गयी थी की वो फिर कभी नहीं मानी.

“तुम झूठ बोलती हो सरला. तुम नहीं भूली. इतने साल बाद भी तुम हर बार कहती हो, तुमसे नहीं हो पायेगा.  तुम नहीं भूली.” मैं बड़बड़ाता रहा, “तुम्हे हमेशा लगता रहा की फिर वही होगा. तुमने कभी भविष्य की कल्पना में, हमारे बच्चे को   स्थान ही नहीं दिया. एक जोड़ी उज्ज्वल आँखे और पांच जोड़ी छोटी उँगलियों के लिए हम तरसते रहे सरला”

“तुम क्या कर रहे हो? वो रो रही है. प्लीज चुप हो जाओ” आवाज़ ने कहा

मेरी नींद खुल गयी. सरला सामने बैठी रोती जाती थी. मुझसे गले लगकर रोती जाती थी और जाने क्या बोलती जाती थी.

(6)

मैं और सरला एक रेलवे स्टेशन पर खड़े हैं. मैं पिलर नंबर १८ और वो पिलर नंबर २२ के पास. गाडी आने में अभी समय है. कोई लोकल स्टेशन है, घनी रात में स्टेशन की लाइट इतनी कम है की अकेले आदमी को अँधेरे से डर लगे. पूरे प्लेटफार्म पर सिर्फ मैं और सरला ही हैं. मैं धीरे धीरे उसकी तरफ बढ़ता हूँ.

“तुम यहाँ क्या कर रही हो? कहीं जाना है?”

“हाँ, मैं पिताजी के घर लौट रही हूँ”

“हमारी इस बारे में कोई बात तो हुई नहीं. मुझे छोड़ रही हो”

वो चुप रहती है. हवा तेज है, उसके कान के पास के बालों को फिर-फिर उड़ा देती है. वो मेरी तरफ नहीं देख रही. कहीं सामने किसी बिंदु पर नज़र अटकाए है, जैसे उसे पता हो की मेरी तरफ देखगी तो लिपटकर रोने लगेगी

“क्यों जा रही हो सरला?

“मैं फिर कोशिश नहीं करुँगी. कभी नहीं. हम फिर कोशिश नहीं करेंगे. कभी नहीं” सरला ने कहा, “मुझे लगता है हमने सब कुछ ठीक किया था, और जो भी किया जा सकता था वो किया जा चुका है”

“मैंने कभी इस बारे में जबरदस्ती की है?” मैंने पूछा

“पिछली तीन रातों से तुम इसी बारे में बोलते रहते हो. क्या तुम्हे लगता है दोबारा कभी कोशिश न करना तुम्हे ज़हर देने जैसा है. तुम्हे धीरे धीरे मारने जैसा” सरला ने मुड़कर मेरी तरफ देखा, “तुम्हे लगता है बच्चा न होना मेरी ज़िद्द है, किसी तरह का प्रतिशोध?”

चुप बिलकुल चुप रहने की बारी मेरी थी. मुझमें साहस ही नहीं था की बोलूं, मुझे बच्चा चाहिए सरला. मैं तुम्हारे अंदर के डर के चलते नहीं कह पाता लेकिन मैं चाहता हूँ की तुम कोशिश तो करो. मुझे बच्चा चाहिए.

“तो सरला को ले ही आये तुम सपने में” आवाज़ ने पीछे से कहा

मैंने मुड़कर उसकी तरफ देखा, “तुम बीच में मत आओ. उसको नहीं पता की हम सपने में हैं. मुझे बात करने दो उससे. यही एक तरीका है इस मसले को ख़तम करने का. बात किये बिना यह नहीं सुलझने वाला.”

“तुम्हारे यहाँ बात करने का कोई फायदा नहीं. यह सरला भी तो तुम्हारी कृति भर है. गांव की जगह इस स्टेशन पर खड़े होने से कुछ बदला नहीं है दोस्त. देख तो तुम सपना ही रहे हो. बड़बड़ा तो तुम खुद से ही रहे हो.” उसने फिर कहा, “अगर तुम बात कर ही सकते तो शायद तुम्हारी यह स्तिथि ही न होती. संवाद ही तो नहीं हुआ इस विषय पर कभी”

“नहीं तूम चुप रहो. मैं स्तिथि बदलने की कोशिश ही कर रहा हूँ. देखते नहीं ५ वर्षों में पहली बार मैं और सरला इस विषय पर बात कर रहे हैं – सपने में ही सही” मैं शायद स्वयं को ही तर्क दे रहा था, यह जानते हुए भी की मेरे तर्क की कोई जमीन नहीं

“तुम्हारा भ्रम है, यह बात उस तक नहीं पहुंचेगी”

“पहुंचेगी, मैं जानता हूँ कैसे अपनी बात उस तक पहुंचानी  है”

“कैसे?”

“एक बार सपने में ही सही मैं यह बात कर डालना चाहता हूँ. अंदर दबी निराशा, कुंठा ही मुझे पराजित कर रही है. मैं इस आशाहीनता के चलते बीमार हूँ की इस विषय पर बात करके मैं सरला को विक्षिप्त ही न कर दूँ. वह पागल न हो जाये, बीमार न हो जाये इस डर से मैं यह विषय नहीं उठाता. लेकिन इससे मैं भी तो दीवाना होता जा रहा हूँ”

आवाज़ ने उत्तर नहीं दिया. वो चुप रही. शायद यह पहली बार था की मैंने अपने अंतर्मन से तारतम्य बैठाया था. मुझे बात करनी ही चाहिए यह मैं और मेरे अंतर्मन दोनों एक सुर में बोले थे. मैंने सरला की और मुड़कर कहा, “गाडी आने में समय है सरला. आओ वहां बेंच पर बैठते हैं.”

सरला चुपचाप बेंच तक मेरे साथ चली और हम दोनों बेंच पर बैठे. मैंने धीरे से कहा, “तुम्हे किस बात का डर है?”

“अगर फिर वही हुआ तो? मैं वो दुःख नहीं सहना चाहती. तुम कहो मैंने कब तुम्हारा कहा नहीं माना? कभी हुआ की मैंने समझने की कोशिश न की हो. तुम्हारे साथ न दिया हो?” सरला की आंखों में यकायक आंसूं भर आये, “पहले सपना देखो, एक साथ सपना जीना शुरू करो और फिर एकाएक खून के थक्के से निकलने लगें. यह मैं नहीं देख पाऊँगी”

“लेकिन ….”

“इस बार तुम मान जाओ. प्लीज. मुझे शरीर की दुर्गति की चिंता नहीं लेकिन मन की दुर्गति नहीं सह सकती. बच्चे को सोचती हूँ तो लगता है मेरे अंदर से फिर कोई मशीन एक मांस का लोथड़ा निकल कर मेरे सामने रख देगी.”

“पर ऐसा होगा ही क्यों? हम क्या इस दुनिया में अकेले हैं जिसके साथ ऐसा हुआ है.”

सरला ने शायद मुझे सुना नहीं. वो कहती जाती थी “पहले खून के थक्के निकलेंगे, फिर उसके बाद पेट के निचले हिस्से में दर्द होगा, दर्द धीरे धीरे दिन – दिन फैलता पेल्विक हिस्से और कमर के निचले हिस्से तक पहुंचेगा. घर के सब बड़े कहेंगे, कुछ ख़ास नहीं इस स्तिथि में होता है. फिर वही होगा जो पहले हुआ था, बार बार पेशाब जाना होगा; सब यही कहेंगे होता है; लेकिन जब वजन में गिरावट आने लगेगी, ब्रैस्ट कड़ी और कड़ी होने लगेगी तो सब डरने लगेंगे. सब कहेंगे कम्पलीट बेड रेस्ट लेकिन फिर कुछ नहीं होगा. और एक दिन एक मशीन कहीं अंदर से एक मांस का लोथड़ा निकाल कर टेबल पर रख देगी. पिछली बार मैं बहुत रोई थी. मुझे यकीं है इस बार तो मुझे रोना भी नहीं आएगा. उस बात पर कौन रोयेगा जो पता है अवश्यम्भावी सत्य है. मुझे उम्मीद ही नहीं है. तुम ज़बरदस्ती करोगे और निराशा हाथ लगेगी. तुम शायद रोओगे भी. लेकिन मुझे तो सिर्फ आश्चर्य होगा की तुम रो क्यों रहे हो. ऐसा क्या हुआ है जो हमें पता नहीं था. इसलिए मुझे लगता है की मेरे चला जाना ही ठीक है. तुम्हे लगता है मैं जिद्द करके तुम्हारे साथ अन्याय कर रही हूँ; तुम्हे ज़हर दे रही हूँ और मुझे लगता है की तुम जिद्द करके, मुझसे बच्चे की चाह रखके मेरे साथ अन्याय कर रहे हो. इसलिए मेरे चला जाना ही हितकर है”

“अब तुम कुछ नहीं कह पयोगे” आवाज ने धीरे से मेरे कान में कहा

“हाँ! लेकिन बात तो हुई.” इतना कहकर मैं सरला की तरफ मुड़ा और बोलै, “चलो घर चलते हैं.” उसने मेरी तरफ देखा और हम चुपचाप वापस घर लौट आये. दोनों बिस्तर की अपनी अपनी साइड लेटकर सो गए.  सरला ने खिड़की से परदे हटाए तो मेरी नींद खुली. उसपर नज़र पड़ते ही मैंने कहा, “सरला ! चलो बात हुई और बात ख़तम हुई”

उसको क्या समझ आना था. बस मुझे कुछ बोलते देखकर वो अचंभित किसी मुर्ख की तरह बार बार जोर से आवाज़ लगाती रही, “माँ …. माँ … ऊपर आओ … माँ .. माँ “

लेखक: सचिन मनन

मुझे कहानियां कहने का शौक है, आपको कहानियाँ पढ़ने का शौक होगा - अगर हाँ तो हम दोस्त हैं; अगर नहीं तो मुझे यकीन है मेरी कहानियां आप में यह शौक पैदा कर देंगी

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