लॉक- डाउन – दिन 4 – कहानी 4 – पार्ट १


बंद रास्तों से निकलकर

रात भर तेज़ बारिश होती रही थी. ऊपर वाले फ्लोर पर रहने के कारण छत पर पड़ रही तेज बूंदे टपा टप करती और इस शोर से उसको नींद नहीं आती. सुधा चुपचाप सो रही थी. उसकी नींद वैसे भी मेरी तरह  हलकी नहीं थी. मेरा तो यह हिसाब था की हलकी सी खटपट से टूट जाती थी. किसी ने लाइट  ऑन ऑफ की, किसी ने थोड़ी आवाज कर दी, कमरे से अटैच बाथरूम का नलका चला और मेरे नींद टूट गई.

आज सुबह तो मैं ५  के आसपास ही उठ गया. कल रात को पनीर सैंडविच ने शायद काम ख़राब कर दिया था. हो सकता है इसी वजह से नींद नहीं आयी हो. मुझे खुद पर खीज सी आ रही थी. सोच रहा था कि सुधा आज क्यों नहीं जगी अबतक। रोज़ पांच बजे के अलार्म से वो उठ जाती थी; लगभग हर रोज उसके उठने के साथ ही मुझे भी उठना पड़ता था. अगर उठकर बाहर न भी जाऊं तो भी बिस्तर पर पड़ा पड़ा करवट बदलता रहता था. आज उसके अलार्म से पहले मैं उठा और उसका अलार्म बजने से पहले ही बंद कर दिया. वो सोती रही.

बच्चों के कमरे मे गया, दोनों बहने सो रही थीं. कितना समय बीत गया कितनी जल्दी। बच्चे कब इतने बड़े हो गए. बिना आवाज़ किये बाहर चला आया. ब्रश करते हुए पूरे घर में घूमता रहा. फिर किचन में पहुँचकर चाय बनाने लगा. सुधा को चाय से नफरत जितना प्यार था. मैं चाय लेकर ऊपर गया, कमरे में बैठा, फ़ोन पर मैसेज चेक करने लगा तो उसने करवट लेते हुए कहा, “मुहं धोया या पहले चाय बनाकर लाये हो?”

“सिर्फ दूध में पत्ती डाली है. चाय नहीं है” यह मेरा स्टैण्डर्ड जवाब हुआ करता था

“हुम्म्म… ” और यह सुधा की स्टैण्डर्ड प्रतिक्रिया

“सुनो, सुरभि को कल कहानी भेजी थी ”

“कौन सी ?” सुधा ने

“जो कल तुम्हे सुनाई थी. उसका जवाब आया है”

“फिर?”

मुझे लगा शायद समय ठीक नहीं है. वैसे भी सुरभि का जिक्र आते ही मुझ में असहजता आ जाया करती थी. घबराहट, अधीरता और कुबलाहट का एक अनोखा सा भाव. सुरभि को मैं २० -२२ साल से जानता था एक समय था जब सुरभि पृथाश्री और आकाश तिवारी के किस्सों की गूँज पूरे मोहल्ले में थी

पढ़ाकू बंगाली सुरभि और एक नंबर का तिकड़मबाज आकाश.  मुँहफट आकाश और सौम्य सुरभि  शिउली के फूल जैसी सुन्दर थी सुरभि.

हम दोनों की जोड़ी हमारे मोहल्ले में तो बहुत बाद में चर्चा का विषय बनी उससे बहुत पहले कॉलेज के सर्किल में चर्चा मे आयी. सुरभि मुझसे एक साल सीनियर थी. और क्योंकि पढाई मे मुझे काफी बेहतर भी उसने दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिन्दू कॉलेज मे एडमिशन लिया था. मेरे अगले साल जो नंबर आये उसके चलते दयाल सिंह मे एडमिशन मिला. मुझे पहली बार वो एक डीटीसी बस में मिली थी और पहली ही बार मे मैंने उसे क्लास बंक करने के लिए राजी कर लिया था. उसके दिन के बाद शायद हमने उस पूरे महीने फिर क्लास अटेंड ही नहीं की. दिल्ली के सभी चर्चित पार्कों के हर पुराने गुम्बद की दीवार पर हमने दिल खींचकर अपने नाम लिखे.

उसी दौरान मुझे मच्छी की वैरायटी से लेकर हर मच्छी का अलग अलग स्वाद है, अलग अलग बनाने का तरीका – इस सब का ज्ञान मिला.

“ईलिश माछ तो बांग्लादेशी कहते हैं; वो कहाँ के असली बंगाली. हम बंगाली तो रोहू, रुई, पॉम्फ्रेट के दीवाने हैं. एक दिन तुम्हारे लिए चिंगरी लाऊंगी” बंगाली खाने पर बात में उसकी बहुत रूचि थी

आगे के २-४ महीनों मे मैंने बकर-बकर करते शायद पूरा थीसिस लिख डाला था और उसका शीर्षक था ‘बंगालन इतनी हॉट क्यों होती हैं?’- ललित कलाओं में उनकी रूचि, आजाद ख्याल मे उनका कोई सानी नहीं, पढाई लिखाई मे हमारी नार्थ इंडियन लड़कियों से यकीनन आगे, खुले विचारों वाली, बहुभाषी – हिंदी उनको आती; अंग्रेजी पिक्चर दिखा लो; बंगाली तो हैं ही. फिर मैंने कोई बंगाली लड़की नहीं देखी जिसका विवाह पूर्व एक घनिष्ट पुरुष मित्र न रहा हो- और लगभग सबकुछ मान्य. ऐसा भी नहीं की यहाँ रिश्ते की शुरुवात हुई और ६ महीने में पूछने लगें – शादी कब करोगे. शादी की तो कोई जल्दी ही नहीं. नहीं तो न सही और करनी है तो अभी नहीं.

सुरभि ही एक मात्र बंगाली लड़की थी जिसे मैं जानता था, इसलिए हो सकता है मेरी थीसिस सर्वमान्य न हो लेकिन मेरा जो अनुभव था वो ही मैं बघारा करता था.

कॉलेज मे हर कोई हमें रश्क़ से देखता था। कॉलेज के दोस्तों में यह बात थी की दोनों हम दोनों शादी करेंगे. सुरभि ने अपने पापा को थोड़ा-बहुत बता भी रखा था.

देखते देखते उसका आखिरी सेमेस्टर आ गया और प्लेसमेंट के शोर-शराबे में ये बातें दब गयीं. मुझे अभी साल भर बाकि था. उसको ग्रेजुएशन के बाद किसी अच्छी यूनिवर्सिटी मे रिसर्च का भूत सवार था. वो पता करने मे लग गयी. उसके पिता डॉक्टर थे, वो चाहते थे सुरभि पहले पीएचडी कर ले उसके बाद नौकरी करे।

मेरे पैरेंट्स को मुझसे उतनी ही उम्मीद थी जितनी एवरेज स्टूडेंट के माँ-बाबूजी  को होनी चाहिए. यह कंप्यूटर कोर्सेज का दौर था. ग्रेजुएशन के पहले साल में मेरे पेरेंट्स ने मुझे कंप्यूटर कोर्स में डाल दिया था. उनको बस इतना चाहिए था की लड़का ग्रेजुएशन करे, और हो सके तो US चला जाये.

 

 

माँ को जब मैंने पहली बार बताया था सुरभि के बारे में तो उनका टिपिकल नार्थ इंडियन जवाब था, “रंग थोड़ा दबा दबा सा नहीं है बेटा.” फिर अगले १०-१५ दिन तक अलग अलग मौके पर बोलती रही थी और सब बातों का निचोड़ इतना ही था, ” सुरभि हमारे परिवार और रिश्ते-नातों में रच-बस पायेगी क्या?”

महीने भर उन्होंने कहना शुरू कर दिया था, “और सब तो मैं सह लूंगी लेकिन मांस-मच्छी खाना तो इस घर में नहीं चलेगा”

“कोई बात नहीं,  किचन अलग कर देना” यह जवाब मै २०-२१ साल की उम्र में दे रहा था.

आखिरकार वही हुआ जो होना था. सुरभि को अमरीका की यूनिवर्सिटी में अच्छी स्कॉलर्शिप मिल गयी और वो मास्टर्स के लिए वहां चली गयी. जाते हुए उसने मुझसे पुछा था, तुम्हारा क्या प्लान है? मेरा कोई प्लान नहीं था. इसलिए मैंने तीन चार प्लान बता दिए. उनमे से एक था, मै सोच रहा हूँ ग्रेजुएशन के साथ साथ कंप्यूटर कोर्स ख़तम हो जायेगा. किसी मल्टीनेशनल में अप्लाई करूंगा और फिर में भी अमरीका.

उसके जाने के बाद पांच सात महीने तक हमारी बात चीत होती रही. वो ऑरकुट और ईमेल का ज़माना था. उसके बाद मेरा लास्ट सेमेस्टर शुरू हो गया. और आखिरकार मुझे अच्छी कम्पनी में प्लेसमेंट मिल गयी. लेकिन अमरीका वाला प्लान कभी नहीं बना.

“बोल यार क्या लिखा है उसने?” सुधा ने बेड से उठते हुए कहा.

“तुम्हारी कहानियों में कुछ होता ही नहीं. कुछ पैदा भी तो किया करो. क्या कहते हो तुम अपनी कहानियों को – न प्रेम है, न घृणा, न कोई शोकपूर्ण घटना, न पुनर्जम  और न ही तुम्हारे पात्र रंक से राजा या फिर राजा से रंक बनते हैं, न बाहरी खोज न अंतर की खोज. तुम्हारे पात्र कहीं की यात्रा भी नहीं करते. आखिर तुम्हारी कहानियों को तुम किस श्रेणी में रखते हो ?” मैंने ज्यों का त्यों उसका मैसेज पढ़ कर सुना दिया

“तो तुमने क्या जवाब दिया ?” सुधा से मुझे प्रश्न की आशा नहीं थी. मुझे था की वो कहे, सुरभि बकवास कर रही है, उसको क्या पता कहानी क्या होती है.

“मैंने इतना लिखा की मेरी कहानियां मेरे अंदर के जटिल विचारों को अपने कंधे से उतार कर रखने की प्रक्रिया का नाम है”

“तुम दोनों इसीलिए बात करते हो न क्योंकि तुम दोनों को लगता है की तुम अलग लेवल पर कनेक्ट करते हो” सुधा हमेशा यही कहती थी.

“मतलब?” मैंने पूछा

“तुम ही तो कहते हो, सुधा तुम पत्नी हो; तुमसे कुछ चुप नहीं सकता. तुम मुझे जानती हो. लेकिन मेरे अंतर में पिता, पति, पुत्र के अतिरिक्त जो बैठा है उसको किसी ऐसे साथी की तलाश रहती है जो उसे जज न करे. वो पत्नी के साथ नहीं हो सकता क्योंकि पत्नी से कुछ छुपता नहीं” सुधा से यह बात मै कई बार कर चूका था

“हाँ यह तो सही है.”

“तो सुरभि तुम्हे नहीं जानती या जानती है?”

“सुरभि मुझे जानती है लेकिन नहीं जानती. मतलब उसको पता है आकाश कौन है लेकिन क्योंकि वो मेरे साथ नहीं रहती, इसलिए हमारे बीच सिर्फ उतना ही साझा है जितना हम साझा करने को राजी हों. ऐसे में कई बार सुरभि और आकाश बात तो करते हैं लेकिन उस समय वो सुरभि और आकाश नहीं होते. मुझे कुछ अलग बनकर और उसे कुछ अलग बनकर बात करने का मौका मिलता है” मैंने कहा

“मुझे कभी सुधा के आलावा कुछ और बनने की चाह नहीं होती.” उसने बोला और फिर खुद ही शायद सोचने लगी. ब्रश करते हुए उसने इशारे से कहा, “फिर उसने जवाब दिया?”

नहीं अभी अमरीका में तो रात होगी. मैंने अभी अभी जवाब लिखा है. शायद शाम को जवाब देगी. खैर….

“और भी किसी को भेजी थी?”

“हाँ. ऑफिस में कुछ लोगों को, कुछ लोगों ने जवाब दिया है. वही नार्मल टाइप – अच्छी है, बहुत बढ़िया टाइप” मैंने कहा

“और किसे भेजी ?” सुधा जानती थी मैंने राधा को भी भेजी होगी

लॉक- डाउन – दिन ३ – कहानी ३ – पार्ट १


बातें

((महानगरीय जीवन और छुट्टियों से प्रभावित)

पंकज को लगता है उसका  दिमाग एक छलनी की तरह काम करता है; कभी कभी उसकी छलनी बड़े बड़े छेदों वाली हो जाती है जिसमे से पुरानी यादें थप करके गिरती हैं और वो उन यादों की मिठास खटास में खुद को घोल लेता है. फिर कभी ऐसा भी होता है की छलनी इतनी महीन छेदों वाली होती है की याद आती तो है की कुछ हुआ था लेकिन पूरा किस्सा याद नहीं आता. ऐसे समय में वो खुद से सघर्ष करने लगता है.

“राजे, वो याद है एक बार हम गए थे … अ…. याद नहीं आ रहा ” उसने अपनी पत्नी की तरफ देखकर पुछा. शिवांगी को वो राजे बुलाता था

“कहाँ?”

“यार याद नहीं आ रहा. वो था न एक… याद नहीं आ रहा… यार वो बात हुई थी न … की कुछ दिनों के लिए उसको जीवित कर लेना जिसके बारे में जानते हैं वापस लौटने के बाद उसकी हर इच्छा का गला घोटना पड़ेगा बहुत अच्छा लगता है” उसने शिवांगी की मदद मांगते हुए कहा

“हैं? किसको जिन्दा कर लेना” शिवांगी ने रसोई में चलती चिमनी को एक बार बंद किया की ध्यान से पंकज की बात सुन पाए, “फिर से बोलो क्या बोल रहे थे, चिमनी की आवाज में कुछ सुनाई नहीं दिया”

“यार ध्यान है हम गए थे कहीं… जहाँ हमने यह बात की थी. शाम को हमने एप्पल सूप पिया था और होटल लौटते हुए पूरे सेंटी टाइप हो गए थे…. वहीँ तो हुई थी यह बात … ध्यान है न… कहा नहीं था की कुछ दिनों के लिए ही सही लेकिन यह छुट्टियां हमे “मैं” होने का चांस देती हैं…. वो जगह कौन सी थी यार…. याद है? ” पंकज दिमाग के साथ जद्दोजहद में लगा था, की कहीं से एक छेद भर बड़ा हो जाये और छलनी से वो जगह टपक आये

“यह तो हम हर छुट्टी पर कहते हैं. कहाँ वक़्त है रोज की दौड़ में खुद से मिलने का, छुट्टियां ही तो होती हैं जब अपने से मिलते हैं …..कहीं कूर्ग की बात तो नहीं कर रहे” शिवांगी ने कढ़छी चलाते हुए कहा

पंकज की माँ शिवांगी के साथ ही किचन में लगी थी, धीरे से उनहोंने कहा, “वैसे कूर्ग का ट्रिप बड़ा अच्छा रहा था. नहीं?”

“अभी २-३ दिन पहले मेरे फेसबुक पर फोटो आयी थी उस ट्रिप की. वो होता है न फेसबुक का फीचर पुरानी फोटो फिर दिखाने का. दोनों बच्चे ऐसे लग रहे थे जैसे कितने छोटे हों”

“तीन साल पहले की ही तो बात है” माँ ने कहा

“नहीं माँ, पांच साल हो गए. तीन साल पहले तो उदयपुर गए थे.”

“कैसे टाइम निकल जाता है, नहीं ” माँ और शिवांगी बात करते जाती थीं और अपने अपने हिस्से का काम भी निकल रहा था

“एक और निकल गया. टोटल १२ हो गए” दूसरे कमरे से शंकरनाथ जी बोले, “यह बढ़ेगा अभी, पूरी दुनिया को लेकर जायेगा”

“हैं राजे, याद आया?” पंकज लगातार याद करने की कोशिश कर रहा था

दोनों महिलाएं एक साथ बोलीं, दोनों अपने अपने पति को उनके हिस्से का जवाब दे रही थीं

“तुम यही देखते रहो. सुबह से लगे हो इसीमे. डिप्रेशन ही हो जाये बन्दे को”  माँ ने कहा और ठीक उसी समय शिवांगी बोली “यार नहीं याद आ रहा. अभी आराम से बैठेंगे तो बात करते हैं, यह काम के बीच में तुम नयी कहानी मत शुरू करो.”

“ले मैं तो सिर्फ बता रहा हूँ की यह फैलता जा रहा है. सही किया मोदी ने जो देश बंद कर दिया. यह तो सन ४७ वाली हालत होती जा रही है” शंकरनाथ बोले

“हैं? क्यों दंगे हो गए ?” माँ ने किचन से ही जवाब दिया

“दंगे ही होंगे अगर ऐसे ही चलता रहा तो. लोग मान ही नहीं रहे. मेरे दादाजी बताते थे ४७ में भी किसी को कुछ पता ही नहीं चला. सब सोचते रहे कुछ नहीं होगा; लोग एक दूसरे के दुश्मन थोड़ा ही हो जायेंगे, और फिर सरकार भी तो है….”शंकरनाथ अपनी बात कर रहे थे और शायद सिर्फ माँ सुन रही थीं. पंकज कमरे से उठकर शिवांगी के पास किचन में आ गया था. उनकी अगल से बातें चल रही थीं

“यार नहीं आ रही याद मुझे … क्यों पूछ रहा है अभी .. क्या करना है ?” शिवांगी के पास फुर्सत नहीं थीं

“नहीं मुझे याद है उस ट्रिप में हमने यह बात बार बार की थीं. होगा तो हाल फिलहाल का ही ट्रिप. शादी के पहले कुछ सालों में तो यह ख़याल नहीं आता था हमें. यह तो जब से हम दोनों थोड़े ज्यादा बिजी हुए हैं तभी से समय की कमी लगने लगी है”

“हम्म …”

“लो हर की पौड़ी भी बंद कर दी. वहां स्नान पर पाबंदी लगा दी सरकार ने” शकरनाथ वैसे भी घर के ब्रेकिंग न्यूज़ जैसे थे. टीवी की नयी खबर से लेकर, ब्लॉक के हर घर की खबर शाम सवेरे वही मौज ले लेकर बताया सुना करते थे

शिवांगी और माँ ने फिर एक साथ बोला; एक ने शंकरनाथ को, “वैसे भी कौन जा रहा है ऐसे समय में हर की पौड़ी?”

“यार पंकज खाली होकर बात करते हैं, अभी बहुत काम है … एक काम कर ऊपर मशीन से कपडे निकल कर जरा छत पर डाल आ. सूख जायेंगे ”  शिवांगी को पंकज की बात में फिलहाल कोई दिलचस्बी नहीं थी

पंकज उसी उधेड़बुन में सीढ़ियों से ऊपर आया, मशीन से कपडे निकले और छत पर सुखाने के लिए ले गया

“ये पूछ क्या रहा है?” नीचे माँ शिवांगी से पूछ रही थीं

“खाली है, बैठे बैठे कुछ आ गया होगा दिमाग में. मेरा सर खाये इससे अच्छा मैंने कपडे सुखाने भेज दिया” शिवांगी काम मे व्यस्त थी

पंकज कपडे रस्सी पर डालता जाता था और सोचता जाता था की सारे दुखों की शुरुवात वहीं से होती है जहाँ से छुट्टियों के वो दिन ख़तम होते हैं. छुट्टियों के फ़ौरन बाद हम दोनों ही अपनी रसहीन जिंदगी दोहराने लगते हैं. हम जीवित तो रहते हैं लेकिन वो जीवन रसहीन होता है.हम जीवित तो रहते हैं लेकिन वो जीवन अपना जीवन होता ही नहीं. कई बार तो इसलिए छुट्टी लेनी पड़ती है की कहीं हमारा रिश्ता ही बेमानी न हो जाये.

पंकज को एकदम से वो किस्सा याद आया. एक बार तो हद ही हो गयी थी. राजे ने उसके सिरहाने के पास पड़ी किताब उठाई और बोली, यह क्या पढ़ रहे हो?

“कोठागोई – प्रभात रंजन की किताब है ”

“जिस्म्फ़रोशी के किस्सों वाली किताब ?”

“क्या बकवास कर रही हो ? ”

“तुमने ही तो कहा कोई कोठा वोठा वाली किताब है. एक बात बताओ, क्या तुम बदल रहे हो?”

“नहीं ”

“क्या तुम्हारी जिंदगी में कोई लड़की है ?”

“नहीं ”

“आ भी गयी है तो कोई परेशानी नहीं है. एन्जॉय करो, बल्कि मैं तो कहती हूँ … ”

“मान लो कोई आ गयी तो ?”

“तो क्या… तुम्हारा जीवन, अपने जीवन पर इतना बोझ क्यों ढोते हो? … ”

“तुम एक्सेप्ट कर लोगी?”

“यह सोचकर किसी को चाहोगे की मैं एक्सेप्ट कर लूंगी या नहीं ?”

पंकज को याद आया की उसने जल्दी से कहा था “नहीं कोई नहीं है …” लेकिन उसको यह भी याद आया की उस समय वो सोच रहा था की कैसे हो गए हैं शिवांगी और वो. तभी छलनी में से एक और पूर्व घटना टपकी… शायद उसी रात की थी. पंकज ने कहा था

“कभी कभी कुछ ज्यादा ही मांग होती है ”

“सेक्स की?”

“हुम्म्म !!” उसने बेहद धीरे से कहा था

शिवांगी ने धीरे से उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा था, “स्वाभाविक है पंकज. हमारी व्यस्तता हमको एक दुसरे के लिए समय नहीं दे रही. हमको कुछ दिन की छुट्टी लेनी चाहिए”

उसके बाद ही तो कूर्ग का प्लान बना था. और वो ट्रिप भी उन दोनों के लिए एकांत नहीं लाया था. माँ – पापा से उन दोनों ने पुछा की वो चलना चाहेंगे तो वो फट से राजी हो गए. पूरे परिवार के साथ छुट्टी का अपना मजा था – इसमें कोई शक नहीं – लेकिन पति पत्नी का एकांत नहीं था

पंकज कपडे डालकर नीचे वापस आया तो शंकरनाथ और माँ के बीच टीवी पर चल रही ख़बरों की ही बात चल रही थी. शिवांगी अपने हाथ पौंछ रही थी, तौलिया वापस हैंडल में टांगते हुए उसने पंकज से कहा,

“हम क्या बोल रहे थे तुम? अब बताओ”

“यार एक एक बार हम कहीं गए थे. मैं और तुम; शायद बच्चे भी नहीं थे ….”

“बच्चों के बिना हम तभी गए थे जब बच्चे नहीं थे” और शिवांगी मुस्कुरायी

“नहीं यार, शायद एक बार कहीं गए थे. हो सकता है फिर की बच्चे होटल रूम में ही हों और हम बाहर निकल गए हों ….”

“सिर्फ एक बार नैनीताल में ऐसा हुआ था. हम बाहर निकले थे बच्चों को रूम में छोड़कर. दोनों डिनर के लिए निकले थे; लेकिन फिर मन नहीं हुआ तो सिर्फ एप्पल सूप पी कर वापस आ गए थे” शिवांगी को जैसे सब ठीक ठीक याद था. सिर्फ छलनी का खेल है; कभी कभी जो आपकी छलनी से नहीं छनता वो आपका साथी यूं ही क्षण भर में बता देता है

“यार हम क्यों गए थे नैनीताल; कुछ याद है ?” पंकज का सवाल बड़ा अटपटा था

“क्यों गए थे? मतलब. बच्चों की छुट्टियां थीं, तो सोचा होगा कहीं घूम आते हैं. इसीलिए गए होंगे”

“नहीं यार, कोई और भी कारण था”

लॉक- डाउन – दिन २ – लधु कथा २ ((पार्ट one) )


(अपने छत की बगिया से प्रभावित)

मैं सुबह सुबह घर से ऑफिस के लिए निकला. ऑफिस पहुंचा, सारा दिन काम करा.

शाम को ऑफिस बैग पकड़कर बहार निकला. सेक्टर १६ के मेट्रो स्टेशन से मेट्रो पकड़ी. ३ दोस्त भी थे साथ. मैं राजिव चौक तक उनके साथ रहा. राजिव चौक पर उतरा, गाडी में नई सवारियां चढ़ी. जो उतरे थे वो तेजी से आगे बढ़ गए.

मुझे तब एहसास हुआ की मैं भूल गया हूँ की मुझे जाना कहाँ है.  जाना तो घर है लेकिन मेरा घर कहाँ है? मैंने बड़ी हसरत से गाडी की तरफ देखा, अगर गाडी रुक जाती तो जल्दी से दोस्तों से पूछ लेता. मैं भूला इसका मतलब यह थोाड़ा ही है की मेरे दोस्त भी भूल गए होंगे की मेरा घर कहाँ है. लेकिन गाडी निकल गयी.

फ़ोन!… फ़ोन करता हूँ दोस्त को. यह सोचकर जेब में हाथ डाला. फ़ोन बंद. मुझे याद है बैटरी तो ऑफिस में ही कम थी. घर फ़ोन भी किया था बताने को, बैटरी कम है, परेशां मत होना, सीधा घर ही आ रहा हूँ घंटे भर में.

घर का नंबर याद है. १-२ दोस्तों का भी नंबर याद है.  किसी से फ़ोन लेकर घर फ़ोन कर लेता हूँ. है तो अटपटा लेकिन अब याद नहीं आ रहा तो और चारा क्या है. मैं खासा डरा हुआ था. यह पहले कभी नहीं हुआ था मेरे साथ.

“भाई साहब ! जरा फ़ोन देंगे. मेरा फ़ोन बंद हो गया है एक फ़ोन करना है साहब” मैंने एक हमसफ़र से गुजारिश की

उसने मना नहीं किया, लेकिन यह जरूर कहा, “कहाँ को जा रहे हैं? कश्मीरी गेट की तरफ जाना है तो साथ ही हो लो, रास्ते में मिला लेना. रुकना क्यों है”

वो जल्दी में था और मुझे सही सही नहीं पता था की क्या मुझे कश्मीरी गेट जाना है या नहीं. मैं शायद जवाब ढूढ़ने की कोशिश कर रहा था. मुझे इतना हैरान सा देखकर उसने फ़ोन मेरी तरफ बढ़ाया और कहा, “सब ठीक है न भाईसाहब”

“हैं?.. हाँ हाँ सब ठीक है, आप जल्दी में हैं शायद. लेकिन मुझे बस दो मिनट चाहिए” कहते हुए मैंने फ़ोन का कीपैड खोला.

कीपैड सामने था, फ़ोन नंबर भी याद था मुझे, 999961993  लेकिन कीपैड पर लिखे नंबर नहीं समझ पा रहा था, इनमे से कौन सा क्या है? सहसा मुझे एहसास हुआ की मुझे सख्या ज्ञान ही नहीं है. सुबह तो था, लेकिन शाम को नहीं, दिन में किस समय में सख्या को पहचानना भूल गया मुझे याद नहीं. मेरी घबराहट बहुत ज्यादा बढ़ गयी, दिल की धड़कन का इतना जोर से शोर करना मैंने कभी महसूस नहीं किया था.

“सर एक मदद करेंगे, यह एक नंबर मिला देंगे?” मैंने कहा

“भाईसाहब आप ठीक हैं न?” यक़ीनन वो आदमी भी घबरा गया. किसी को भी मुझे अनाड़ी मानने में बेहद परेशानी होती. कोई और होता तो मेरे व्यवहार को भद्दा मजाक मानता. उसने फिर पुछा, ” तबियत ठीक है न सर?”

“हैं?.. हाँ….हाँ सब ठीक है शायद सर. लेकिन मुझे याद नहीं आ रहा की मेरा घर कहाँ है. और मुझे अपना फ़ोन नंबर तो पता है सर लेकिन यह अक्षर जो हैं आपके फ़ोन पर यह समझ नहीं आ रहे”  मुझे इतना डर लग रहा था की इतनी अटपटी बात बोलने से भी में अब खुद को रोक नहीं पा रहा था. मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था

“भाई साहब आप, आप वहां आराम से बैठो एक मिनट.” मेरी बैचेनी देखकर उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे एक बैंच पर बैठाया. “नंबर दीजिये मुझे सर”

मैंने नंबर दिया तो उसने डायल करते हुए मुझसे पुछा, “किसका नंबर है सर ?”

“मेरी पत्नी का सर. वो क्या लिखा है” मैंने सामने लगे सुचना पट्ट को देखते हुए पूछा

“क्या?” नंबर डायल करते हुए जब  उसने सूचना पट्ट की तरफ देखा तभी फ़ोन से आवाज आयी

“हेलो” दूसरी  तरफ से आवाज आयी

“जी ! मैडम… यह आप बात कीजिये.” कहते हुए उसने अपना फ़ोन मेरी तरफ बढ़ा दिया

मैंने फ़ोन कान पर लगाया लेकिन दूसरी तरफ से क्या बोला जा रहा था मुझे समझ नहीं आया. कुछ आवाज तो आ रही थी दूसरी तरफ से लेकिन उन आवाजों का क्या मतलब था मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. मैंने फ़ोन वापस उस आदमी की तरफ बढ़ाते हुए कुछ कहना चाहा, लेकिन मेरे पास शब्द नहीं थे. मुझे एहसास हुआ की मैं कोई भाषा नहीं जानता. और भाषा के बिना संवाद कैसे हो. मैंने इशारे से कहा, “मुझे समझ नहीं आ रहा की दूसरी और से आती आवाजें क्या कह रही हैं.”

“आपकी पत्नी हैं सर” शायद उस आदमी ने मेरे इशारों से समझा की मैं पूछ रहा हूँ की कौन है. मैंने फिर इशारों से समझने की कोशिश की, ” मुझे समझ नहीं आ रहा की दूसरी और से आती आवाजें क्या कह रही हैं.”

उस आदमी ने सामने से आते जाते लोगों को रोककर कुछ कहा. धीरे धीरे भीड़ बढ़ने लगी. एक आदमी ने कहा

“अरे अगर इनको कुछ याद नहीं तो एक काम करो फ़ोन पर जो हैं उन्हें बता दो की यह साहब राजीव चौक पर खड़े हैं. वो आकर ले जाएँ.

 

उसके बाद किसने क्या किया मुझे कुछ समझ नहीं आया. मुझे सिर्फ इतना दिखा की एक खाकी वर्दी वाले आदमी ने मुझे एक गाडी में बिठाया और उसकी गाडी में थोड़ी देर बाद मुझे नींद लग गयी. हो सकता है मैं बेहोश हो गया हूँ. लेकिन उसके बाद जब उठा तो बिस्तर पर औंधा पड़ा था

 

मेरे आस पास घर के ही लोग खड़े थे. मैं सबको पहचानता था. लेकिन समस्या यह थीं की वो क्या बोल रहे थी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. मेरा भाषा ज्ञान, मेरी  संवाद की शक्ति, मेरा अक्षर ज्ञान, सब मुझसे छूट गया था. घबराहट, डर… नहीं घबराहट नहीं व्याकुलता  का अतिरेक… एक आकुलता, और एक  जटिलता. मैंने  बहुत कठनाई के साथ कुछ समझने की कोशिश तो की लेकिन कोई फायदा नहीं. प्रबल उद्योग के बाद मैंने हार मान ली और चुपचाप विष्मित सा इधर उधर देखने लगा

जब यूं ही पड़े पड़े मुझे बेचैनी होने लगी, जब चारों तरफ की आवाजों से में परेशान होने लगा, कोलाहल, सब बोलते ही चले जा रहे थे, डॉक्टर गुप्ता को घरवालों ने बुला लिया था, वो भी बोलते जाते थे, लेकिन मेरे लिए सब ची-पो, शोर के इलावा कुछ नहीं था तो मैं चुपचाप उठा, पहले गुसलखाने गया और फिर सीढ़ियां चढ़कर ऊपर छत पर चला आया. एक स्टूल उठाया और एक कोने में डालकर बैठ गया.

 

कुछ देर बाद सरला एक कप  चाय और २ ऱस लेकर ऊपर आयी, मेरी ही तरह या शायद मुझ से भी ज्यादा वो परेशान थी. उसने कुछ कहा, मैंने प्रश्नवाचक सा चेहरा बनाकर उसकी तरफ देखा. उसने धीरे से मेरे सर पर हाथ फेरा. थोड़ी देर तक साथ बैठी हाथ फेरती रही. फिर हम दोनों ही घबराहट के चलते  रोने  लगे. वो रोटी जाती थी और कुछ बोलती भी जाती थी.

 

थोड़ी देर बाद नीचे से एक आवाज आयी. सरला ने ऊपर से ही जवाब दिया, फिर मेरी तरफ देखा, कुछ बोली, खाली कप उठाया और नीचे चली गयी. उसके जाते ही एक आवाज आयी जो मुझे समझ पड़ी :-

 

“बोलकर गयी है माँ बुला रही है वापस आएगी”

 

मैंने आश्चर्यचकित होकर इधर उधर देखा. कोई नहीं था. कोई भी नहीं. किसने बोला? कौन बोला? कौन बोला

दो बहनें – पार्ट १


जिंदगी ने आखरी बोली लगायी. मौत ने इंकार कर दिया. जिंदगी ने फिर एक बार पूछा, “चार दिन के क्या दाम हैं .” जिंदगी यकीनन कुछ भी दाम देने को तैयार हो जाती लेकिन मौत ने कटाक्ष भरी तरेर के साथ इंकार कर दिया. कुछ बोली नहीं.

जिंदगी ने हार नहीं मानी, उसने पैतरा बदलकर कहा, “मैं हर उस शह में हूँ जो तू देखती है. इस मुगालते में तो नहीं की हर शह से निकाल फैक सकती है मुझे?”

मौत को कहाँ फुर्सत थी. उसका कारोबार इस कदर था गल्ले गल्ले भरे जाते थे, खरीदारों की कतार यह लम्बी, वो अपनी कमाई गिनती जाती थी. उसने फिर अपनी तख्ती उठाई और नाम पुकार, “चंद्रप्रका…. अर्दली जाओ ले आओ उसे, ख़तम करो उसका दुःख, अर्जी लगाए चौदह दिन से भी दो दिन ऊपर हो चले हैं. क्यूँ देर कर रहे हो?” उसने अपने अर्दली को कहा.

अर्दली “मालिक, मैंने सोचा १-२ दिन में उसकी माँ का और फिर अगले सोमवार उसकी पड़ोस वाली का भी नंबर है… साथ ही ले आता. आने जाने का खर्च भी तो है”

तभी जिंदगी ने जोर देकर कहा, “उसकी माँ नहीं खरीद पाओगे तुम. वो बहुत जुझारू है. माना तीसरे दिन उसने भी गुहार लगाई थी की बस कर ईश्वर, उठा ले लेकिन अब तो ग्यारवाह दिन है. मैं हारने नहीं दूँगी उसे. जो बस २-३ दिन और साथ दे दे तो मेरा हाथ में हाथ होगा उसका. उसको नहीं हारने दूँगी”

मौत ने अपना काम जारी रखा, “चंद्रप्रकाश की अर्जी मंजूर हुई. जाओ उसका कष्ट समाप्त करो. अर्दली तुम्हे ख्याल होना चाहिए हम मौत का कारोबार करते हैं. किसी का कष्ट हमारे लिए कोई खुराक नहीं. यह सब जिंदगी के टंटे हैं, दुःख, कष्ट, विलाप, भाग्य का रोना, विपत्ति, चिंता, खेद, कलेश, पीड़ा, तकलीफ, दुर्गति इससे हमारा कोई लेना देना नहीं. मौत तो इन सबसे कन्नी काटकर निकल जाने का नाम है. एक बार जिसकी अर्जी मंजूर की उसको बस ले आओ. क्या फायदा की अर्जी भी मान ली और जिंदगी के साथ छोड़ दिया उसे रुलने को.

हमारे कायदे बिलकुल सटीक हैं और तुम्हारा काम इन कायदों का ठीक से अनुसरण करना.

और जो नहीं कर सकते तो जिंदगी की टीम में शामिल हो जाओ. उसको जरूरत है तुम जैसे लोगों की. बेकार में रगड़ते रहो हरेक जून को….

जिंदगी ने बीच में ही चीखते हुए कहा, “जिजीविषा कहते हैं इसको…

मौत ने पहली बार उसकी तरफ देखा, तख्ती नीचे रखने का उसकी पास समय नहीं था, पन्ना पलटते हुई बोली “लोग बाज़ार मौत ने पहली बार उसकी तरफ देखा, तख्ती नीचे रखने का उसकी पास समय नहीं था, पन्ना पलटते हुई बोली “लोग बाज़ार मे मरते हैं …. रामशरण गुप्ता, घर में मरते है… सुधाधीर गोविल, शयामा, …” फिर झुझलाकर अर्दली की तरफ तख्ती करते हुए “पढ़ इसमें से और जल्दी से निपटाता जा”… फिर जिंदगी की तरफ देख, “हाँ तो क्या कह रही थी मैं, लोग बाज़ार मे मर रहे हैं, घर में मर रहे हैं. जानती हो क्या क्यों? क्योंकि तुम्हारा अंतिम ध्येय है लोगों को जीवित रखे रखना. तुम किसी को छूटने नहीं देती. कुंडली डाले बैठी हो लोगों के ह्रदय में, उनके मस्तिक्ष में, यह सब हाहाकार तुम्हारे कारण है….

जिंदगी ने फिर दोहराया, “जिजीविषा कहते हैं इसको. जीवन की जिजीविषा.” फिर थोड़ा खुद पर नियंत्रण किया. उसे लगा यही मौका है, पहली बार मौत ने गल्ले पर बैठे अपनी तख्ती नीचे रही है. यही मौका है उसको कुछ उलझाने का.

 

उसने अति स्नेही भाव से कहा, “इतना भर लेन-देन तो दोनों में हमेशा से रहा है. ऐसी बेरुखी आखरी बार कब हुई थी हम दोनों के रिश्तों में…. मुझे तो याद भी नहीं… कितने ही तरीके से लोग बाग़ हमारे रिश्ते को परिभाषित किया करते हैं… कहने वाले तो जिंदगी को असली मौत और मौत के बाद  ही असली जिंदगी – तक कह देते हैं. क्या फर्क है हममे फिर? और क्यों मुझे कोसती है, क्या मांगती हूँ मैं – सिर्फ इतना ही तो की जिस किसी में मेरी उम्मीद भर है उसको २-२ दिन और दे दे. तेरे गल्ले में कौन कमी होती है?”

“तेरी चालाकी नहीं जाती. धूर्त, कपटी, छली. कैसे मार लेती है अपने अंतर को इतना. बस एक दिन और, एक और घडी, चल एक सांस ही और सही.” मौत ने अर्दली से फिर तख्ती खींची “तू क्या करता है, यह बहुत छली है भाई, इसकी बातों में आ गया तो सब चौपट. इसको तो सुन भी मत. बस लगा रह. चाशनी घोलती है यह अपनी जुबान में, लोग तड़पेंगे लेकिन फिर चाहेंगे जिंदगी मिल जाये” पन्ना पलटकर “चंदप्रकाश आ गया या नहीं?”

अर्दली “बारिश है दीदी, पिण्डा जलता नहीं उसका.”

मौत ने उसकी तरफ देखकर कहा, “चलो कोई नहीं, आता रहेगा. कम से कम अपने दर्द से तो निजात पा गया”

जिंदगी ने फिर चुटकी ली, “और जो पीछे पूरा घर छोड़ आया है ?”

मौत, “मैं तेरी तरह चीजों को ज्यादा उलझाती नहीं….. इसका क्या हुआ रे – रामशरण गुप्ता…..

अर्दली, “घरवालों ने जमीन पर लिटाया हुआ है लेकिन प्राण नहीं छूटते”

जिंदगी, “नहीं आएगा वो. उसको बच्चे दिखते हैं अपने और दिखता है पूरा कुनबा. बस जो एक दिन और खींच ले तो मेरा हाथ उसके हाथ तक पहुँच जाये”

“थोड़ा खुद ही आगे बढ़कर थाम क्यों नहीं लेती ?…. सुधाधिर गोविल” मौत ने पूछा

अर्दली ने अगले नाम पर कहा, “इसने अपनी अर्जी वापस ले ली दीदी.”

मौत ” ठीक है फिर आगे चल… अगला नाम ?”

जिंदगी “इतनी तुछ्ता? इतना निरादर? जानना भी नहीं चाहती की अर्जी क्यों आयी और अर्जी क्यों वापस हुई ?”

मौत “तुम जानती हो यह मेरा काम नहीं. मैं लगाव नहीं रखती; जीवन की उत्पत्ति के प्रथम दिन जब मेरा जन्म हुआ तब से मुझे निर्देश है निर्मोही भाव रखने का. मेरा काम है जो अर्जी लिखे उसके सर के पास जाकर खड़े हो जाना…”

 

जिंदगी ने बीच में बात काटकर कहा, “लेकिन अगर मैं उसका मुँह ही न खुलने दूँ तो फिर क्या करोगी? कैसे डालोगी उसकी मुँह मैं मृत्यु का अमृत?”

“तुम क्यों दुःख देना चाहती हो लोगों को ? कैसे होती हो इतनी निष्ठुर? वो तड़प रहा है प्रिये, उसको मृत्यु का आलिंगन क्यों नहीं करने देती तुम ?” मौत ने तख्ती पर से क्षण भर को नज़र हटाई

बस यही समय है, इसने अपनी नज़र क्षण भर को ही सही लेकिन तख्ती से हटाई है. मौत ने सोचते हुए कहा, “जाने दे अब. अनंत से यही बहस करते आये हैं, न तेरा चरित्र बदल सकता है और न मैं अपना मोहपाश ढीला करने वाली. सुन एक और तरीका भी तो है…. ” जिंदगी ने फिर अपनी आखरी बोली लगायी

लॉक- डाउन – दिन १ – लधु कथा १


(टीवी समाचारों से प्रभावित )

सुबह सूरज ने दस्तक नहीं दी थी जब वो घर से निकल पड़ा था. उसका मानना था की अभी पुलिस वाले बीट पर नहीं पहुंचे होंगे, एक बार शहर से बाहर निकल गया तो कोई न कोई जुगाड़ बन ही जायेगा. यह सब शहर का ही टंटा है, एक बार इसकी सरहद  से बाहर निकल गया तो कोई चिंता नहीं

सर पर जो बक्सा उठाये था उसपर एक रस्सी बंधी थी. बीच बीच में उसी रस्सी को पेट से बांधकर बक्से को घसीटने लगता.जिस रास्ते से उसने शहर से बाहर निकलना तय किया था उसपर कहीं कहीं एक हाथ धस्ता बालू था तो कहीं कहीं घरों से निकला हुआ गन्दा पानी गड्ढों में भरा पड़ा था. एक आध बार तो उसके पैरों में कोई पत्थर कंकड़ भी धंसा.

उसके रूम से शहर की सीमा कुछ १० -१२ किलोमीटर दूर थी. इससे दुगना वो रोज चल लिया करता था. लेकिन एक तो जो रास्ता उसने चुना था और दूसरा पुलिस को जो दर था उसने इस रास्ते को कष्टदायी बना दिया था. मार्च का मौसम कोई गरम मौसम भी नहीं लेकिन उसपर सुबह का समय लेकिन उसके बदन से पसीना चुहचुहा रहा था. चलते चलते जब वो थोड़ा थक सा जाता या सांस ज्यादा ही तेज हो जाती तो कुछ मिनट आस पास कहीं बैठ जाता

जेब में एक बीड़ी का बण्डल था. हर बार बैठता तो एक बीड़ी सुलगा लेता. दो चार दम भरता, सांस वापस नीचे उतरती तो यह ख्याल जोर पकड़ता कहीं पिछले दिन की तरह कोई पुलिस वाला मिल गया तो शहर से जाने नहीं देगा – वापस रूम में जाने को कहेगा. उठता और चल देता

चलते चलते एक सोच उसको बार बार कसोट रही थी, अभी चार दिन पहले तक पूरा शहर इस बात पर बहस रहा था की कौन इस  शहर में रह सकता है, कौन इस  शहर का बाशिंदा है, कौन इस शहर की कमाई खा सकता है. जब इन बातों पर बहस थी तो वो बार बार बाबू लोगों से पूछता था, “मेरा क्या होगा साहब?”

“कागज हैं तेरे पास?”

“राशन कार्ड है बाबू.”

“मुश्किल है, कहते हैं जो इस शहर का नहीं होगा उसको  तो भेनचोद कालापानी भेज देंगे. या तो वापस अपने गाओं अपने देश जाओ वर्ना भेनचोद कालापानी” यह लम्बी लम्बी बहस. और वो हर बार सोचता था क्या जुगाड़ करूँ की इस शहर से दाना पानी न उठे. किस बाबू से बात करूँ की बात बन जाए. और कोई बाबू कुछ ले देकर भी मदद को तैयार नहीं था. और अब चार दिन बाद, कहते हैं इस शहर में महामारी फ़ैल रही है. वो निकल जाना चाहता है. जल्दी से जल्दी इस शहर से बाहर. उसको मालुम है यह सब शहर का ही टंटा है, एक बार इसकी सरहद  से बाहर निकल गया तो कोई चिंता नहीं – अपने गाओं अपने देश पहुँच ही जायेगा.

लेकिन अब यहाँ की पुलिस वाले उसको जाने नहीं देते. रूम में वापस जा भेनचोद वर्ना दूंगा डंडा.