सपना ४१


सपना ४१
अच्छा एक बात बताओ अगर किसी ने स्वतंत्रा दिवस पर तिरंगा बर्फी या तिरंगा आइसक्रीम खायी हो तो उसको क्या करना चाहिए… उलटी करूंगा तो कहेंगे “झंडे का अपमान”, कहीं खाया पचा लिया तो सुबह बोलेंगे “अपमान किया” और अगर कहीं किसी ने देख लिया की अभी भी फ्रिज में कुछ बर्फी पड़ी है तो पुलिस गिरफ्तार कर लेगी … करना क्या है – यह भी तो बताओ – एक काम करते हैं …. जहाँ हरा सफ़ेद और भगवा दिखे वहां जाना ही बंद कर दें????

सपना ४०


“लेकिन यह तो नंगा है भाई !” मुझे नहीं पता की मैं क्यों चिल्ला रहा हूँ “लेकिन यह तो नंगा है भाई ! कहाँ पहना है कुछ ” … मुझे यह भी नहीं पता की क्यों मेरे आस पास खड़े लोग मेरा मुहं बंद करने में लगे है – “चुप हो जा भाई – मरवाएगा यार” — तभी देखता हूँ आसपास “The emperor new clothes ” कहानी की बहुत सी फोटोकॉपी बिखरी पड़ी हैं…. कहानी सचमुच दिलचस्प है – राजा नंगा घूम रहा है लेकिन मंत्री कह रहे हैं – मालिक कमाल के नए कपडे हैं वाह वाह… मंत्री ही नहीं प्रजा भी बोल रही है वाह वाह अद्भुत लगते हो मालिक …. फिर एक बच्चा बोलता है “लेकिन यह तो नंगा है भाई !!”
पर हम सब जानते हैं बच्चे तो बच्चे होते हैं – इनको कहाँ समझ आती है बड़ी बड़ी बातें

लघु कथा ५


“लेकिन एक बात बताओ यह जो आप कहते हो की GST के बाद, टैक्स कम होने से २०% ज्यादा कार बिकी हैं – यह २०% कार खरीदी किसने? जिसके पास पहले से कार थी या उन्होने जिनके पास कार थी ही नहीं?” एक ने कहा

“हैं? यह क्या बात हुई ?” दूसरे ने पुछा

“क्यों यह जानना क्यों जरूरी है? भाई टैक्स कम हुआ न” तीसरे बोला

और किस्सा अभी आगे बढ़ता इससे पहले ही टीवी पर खबर चल निकली, “कश्मीरी अलगाववादी करोड़पति कैसे बने? क्या है इसके पीछे सच”

“लेकिन एक बात बताओ क्या कश्मीरियों को दिखता नहीं इन अलगाववादियों का सच?” पहले ने पुछा

“हैं? यह क्या बात हुई ?” दूसरे ने पुछा

और तीसरा कुछ बोलता उससे पहले दूसरे ने टीवी का चैनल बदल दिया – कबर भी बदल गयी – भारत ६२२ रन बनाकर पहली पारी मे मजबूत स्तिथि में

सपना ३९


अपने स्टोर रूम में बैठा हूँ – बीवी पूछती है “क्या कर रहे हो?” – “अरे यार वो एक ट्रैन थी न जो बच्ची के लिए खरीदी थी, वो ढूंढ रहा हूँ ”
देखता हूँ ट्रैन लेकर नयी दिल्ली पहुँच जाता हूँ, सुरेश प्रभु खड़े हैं – “यह खिलौना क्यों लाये हो”… मै बोलता हूँ “साहब आपने कहा खाना घर से लाओ, चादर घर से लाओ, मैंने सोचा एक काम करता हूँ ट्रैन भी घर से ले आता हूँ”
“अबे चूतिये इसमें बैठेगा कैसे – यह तो खिलौना है”
“नहीं साहब – हम भी आपके हाथों के खिलोने हैं – आप एक बार बोलो “गिली गिली छु…” हम अभी सूक्ष्म रूप धर कर इस ट्रैन में घुस जायेंगे”
“गिली गिली छु …” मंत्री जी बोलते हैं
और फिर जोर से दोनों हाथों के बीच हमको मसल देते हैं…. बस किस्सा ख़तम

सपना ३८


“एक काम कर दारू ले आ – क्यों मिश्राजी?” किसी ने मुझसे कहा, पता नहीं कैसे लेकिन मैं बैरा हूँ किसी होटल में. जवाब में मैं कहता हूँ, “सर वो तो मना किया है हमको देने से – सॉरी सर – और सर प्लीज आप स्विमिंग पूल मे मत जाना – मना है, वैसे सर wifi नहीं मिलेगा आपको और टीवी मे सिर्फ ४ फिल्म हैं – एक गाँधी की, एक नेहरू की, एक इंद्रा की और एक राजीव की. सर खाने पर कोई रेस्ट्रिक्शन नहीं है – नॉन- वेज मिलेगा… सर फ़ोन से कॉल नहीं कर पाएंगे आप – लेकिन अगर कुछ और रखते हैं आप फ़ोन में तो इस्तेमाल कीजिये.
देखता हूँ कोई मंत्री है जो उठता है और बाथरूम की तरफ चलने लगता है की तभी दूसरा बोलता है – “मिश्राजी रुको, कमरा आपका ही है – मैं अपने मे चलता हूँ – आराम से लेटिए और …..” फिर मेरी तरफ देखकर कहता है चल भाई तू निकल ….
मैं हँसता हुआ जाग जाता हूँ

लघुकथा ४ : दारू, दोस्त और शाम


लघुकथा ४ :
“देखो भाई जब अर्थव्यवस्था प्रगति पर होती है तो कमोबेश सभी आदमी दुबली पतली औरतों को पसंद करने लगते हैं; लेकिन जब अर्थव्यवस्था बुरे समय से गुजर रही हो तो कमोबेश सभी आदमी ” size doesnt matter ” के सिद्धांत का पालन करने लगते हैं” एक ने कहा

“सही बात भाई, देखो ६०-७० के दशक की फिल्मों को; सभी हेरोइने माशाल्लाह खाते पीते घर की लगती थीं… और हमारी अर्थव्यवस्था लचर स्थिति में थी , और फिर ९० के बाद से अर्थव्यवस्था सुधरी हीरोइन भी” दूसरा बोला

“भाई ऐसा है जब आदमी भूखा हो और चारों तरफ भुकमरी तो वापस ” original food ” पर लौट आता है” तीसरा बोला

“अच्छा तुम्हे पता है अफ्रीका में माना जाता है की औरत “extra energy ” को अपने नितम्भों मे स्टोर कर लेती है; यार बात तो सही है ६०-७० की हीरोइन के ही ले लो ” चौथा बोला

“अबे सुनो असली थ्योरी – अर्थव्यवस्था सही है तो औरत फैशनेबुल और पतली होती है और जब अर्थव्यवस्था लचर होती है तो कुछ औरतें मोटी हो जाती हैं क्योंकि उनके लिए यही तरीका होता है बताने का की उनके पास खाने की कमी नहीं है” पांचवा बोला

सही है, यह सही है, इस तर्क में जान है कहते हुए पाँचों ने शाम का चौथा पेग उठाया …..

सपना ३७


रात कमाल हो गया, देखता हूँ हिन्दू और मुसलमान दोनों भारी संख्या में खड़े हैं और किसी की कब्र खोद रहे हैं… ध्यान से देखता हूँ लेकिन नाम नहीं पढ़ने मे आता – नाम तो ईसाई लिखा करते हैं कब्र पर; फिर हिन्दू मुस्लमान क्यों हैं यहाँ , बैकग्राउंड में कुछ बज रहा है – शायद कबीर का भजन – तभी साथ ही में एक दोस्त आकर खड़ा होता है और कहता है – “फूल निकलेंगे दोस्त; कब्र में से फूल निकलेंगे; कबीर के साथ भी यही हुआ था – दोनों गुट लड़ते रहे और जब चादर उठाई तो फूल निकले” ……..”कब्र किसकी है ?” “कलाम की भाई” दोस्त ने कहा… “अगर फूल निकले तो इस बार हिस्से कितने होंगे? २ या २ से ज्यादा?”
दोस्त मुस्कुराया, “बंदरबांट है भाई – हो सकता है एक ही गुट सारा उठा ले जाये”….

किताब पर धूल


काम करने जो आती है

वो किताब झाड़कर, सलीके से नहीं रखती

फेंकती है;

अगर कभी समझ जाय की फैंकने से ही सारी परेशानी शुरू होती है

न दिमाग पर और न किरदार पर कभी धूल बैठे

कहानी २ : सब उलझा हुआ है : भाग १


कहानी : सब उलझा हुआ है : भाग १

(१)

ऑफिस में यह खबर आग की तरह फ़ै ल गयी – राजेश मल्लया को वोडाफोन  वालों ने अपने ऑफिस में बुलाया हैऔर एक ईमेल भी आयी हैकी वोडाफोन अपना धंधा  ‘कंपनी’ से उठा लेगा. पिछले  ५ सालों से कंपनी वोडाफोन का कॉल सेण्टर का धंधा चला रही थी; और कंपनी में काम करने वालों को हमेशा इस बात का गर्व था की बाकि चाहे कुछ हो, वोडाफोन ने कभी कंपनी की ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठाया. ‘कंपनी’ की ही तरह और भी कुछ  कंपनियां थी जो कॉल सेण्टर का काम किया करती थी और वहां चलने वाले गोरखधंधे की ख़बरें अफवाहों की सरूत ‘कंपनी’ पहुंचा भी करती थीं…. नॉएडा की एक कंपनी के कॉल सेण्टर मे कस्टमर के क्रेडिट कार्ड पर फ्रॉड हो गया; लाखों की जालसाज़ी के चलते कॉल सेण्टर मालिक गिरफ्तार हो गया. गुड़गावं का इंटरनेशनल कॉल सेण्टर अमरीकियों  के फ़ोन नंबर अवैध रूप से जाली कंपनियों को बेचा करता था; अमरीकी कंपनी ने धंधा वापस ले लिया ……..इन सब ख़बरों की आदत थी सबको, और यह यकीन भी की ‘कंपनी’ बाकि कंपनियों से अलग है

अभी कुछ महीने पहले ‘कंपनी’ में एक नया मैनेजर आया था. यह जो राजेश मल्लया को आज तलब किया गया है सब नए मैनेजर की बदौलत हो रहा है – ऐसी अफवाह सबुह से ही दबी जबान में चल रही थी.

आरती ने हिम्मत से काम लिया, अपने केबिन से निकलकर  तेज क़दमों से कांफ्रें स रूम मे दाखिल हुई. बाकि मैनेजर कांफ्रें स रूम मे पहले से ही थे. “राजेश मल्लया सर को तलब किया गया हैऔर ईमेल भी आयी है की धंधा वापस जा सकता है” – यह बात सनु कर सभी घबरा गए “लेकिन  आखिर  हुआ क्या है? कहीं वोडाफोन को ३० दिसंबर वाली बात पता तो नहीं चल गयी? साला करे कोई और भरे कोई.” किसी ने फुसफुसाया

(२)

आरती अपने सभी मैनेजर के साथ मीटिंग में है, यह खबर ह्यमून रिसोर्स (मानव संसाधन) हेड कालरा तक पहुंची. राजेश मल्लया को वोडाफोनने तलब किया है यह वो पहले से ही जनता था; “इस बार आरती और उसके डिपार्टमेंट का मजा निकलेगा. जरूर नए मैनेजर के साथ मिलकर कुछ किया होगा. वार्ना ऐन ३० दिसम्बर को वो भी छुट्टी पर, नया मैनेजर भी छुट्टी पर…… सब सांठ गाँठ कर रखी होगी. अगर कहीं नौकरी से हाथ धोना पड़ जाए तो कोई बड़ी बात नहीं” कालरा को वैसे भी अपने जूनियर्स के साथ महफ़िल लगाने का चस्का था. रोज दोपहर के खाने के बाद ४०-४५ मिनट तो यूं ही “चाय पर चर्चा ” पर निकलते थे. और फिर आज तो मसाला चाय का मजा था. “हमपर तो कोई बात नहीं आएगी न सर?” एक जूनियर्स ने पुछा. “हमको तो आखरी में हुकुम बजाना होगा भाई…. भाई देखो राजेश आज जो पेशी है उसमें क्या बोलेगा? यक़ीनन यही की निकाल फैकूंगा उसको जिसने यह सब किया है. ईमानदारी सर्वोपरि है ‘कंपनी’ के लिए. और अगर वोडाफोन इतने में मान गया तो फिर उसके बाद हमको सिर्फ आदेश का पालन करना है…… ननकालने की फॉर्मेलिटी तो हम ही करेंगे!” कालरा परेशान नहीं था. “सर अगर यह सब नए मैनेजर का किया धरा है; भगवान् न करे; और कहीं वोडाफोन ज्यादा ही बिदक गया; भगवान् न करे; तो हमसे भी तो पुछा  जायेगा की नए मैनेजर को रखने से पहले पूरी छान-बीन, बैकग्राउंड चेक करवाया गया था या नहीं. तब क्या करेंगे सर?” एक डरपोक जूनियर ने कालरा का मजा ख़राब कर दिया. कालरा ने चाय का कप वापस तश्तरी मे सरकाया और  कुछ गंभीर हो गया.

(३)

 कंपनी के ऑडिट डिपार्टमेंट ने खबर सनुते ही – राजेश मल्लया को वोडाफोनने तलब किया है; नए मैनेजर को तलब किया ; बुलाया क्या यूं  समझो की अपने कमरे मे गिरफ्तार करके बैठा लिया . बस इतनी ही कसर थी की रस्सी से नहीं बंधवाया वैसे कमरे के दरवाजे पर जूनियर ऑडिटर खड़ा कर दिया, जैसे नया मैनेजर कहीं भाग जाता! आरती के बाद सबसे सीनियर  नया मैनेजर ही था. और आरती पर बहुत सी और भी जिम्मेदारियां थीं, इसलिए नए मैनेजर को ही वोडाफोनयनूनट का सर्वेसर्वा माना जाता था. अब जो हुआ था उसका ठीकरा किसी  के सर तो फूटना था… सीनियर ऑडिटर ने धीरे से कहा, “पहले ही कहा था की ये एक दिन पूरी कंपनी को मरवाएगा” नया मैनेजर चुप रहा. उसके चेहरे के भाव किसी  को समझ नहीं आ रहे थे; न तो वो हतप्रभ ही नजर आ रहा था – जो सबकी उम्मीद से अलग था; और न ही उसके चेहरे पर अपराधबोध का भाव था! डरा होता तो भी कुछ लोग उसके डर को अपराधबोध से जोड़कर गुत्थी सलुझा लेते – सुगबुगाहट तो ये ही थी की वो ही है जिसने सब किया या करवाया है – वो बड़े ध्यान से सब सनु रहा था, बोल कुछ नहीं रहा था और न ही उसके चेहरे के भाव बदल रहे थे

(४)

आरती ने स्टाफ के साथ शायद १०-१५ मिनट बात की – ३० दिसंबर के बारे में कोई बात न करे; बिना सर-पैर की अफवाह न फैलाये – बस कुछ ऐसा ही कहा और फिर तेज क़दमों से बेसमेंट की और चली जहाँ ऑडिट डिपार्टमेंट के केबिन थे, ” गुप्ता सर, एक मिनट बात करनी है आपसे.” आरती के साथ गुप्ता जी अपने कमरे से निकलकर  बाजूवाले खाली कमरे मे दाखिल ही हुए की साथ वाले कमरे से नए मैनेजर की आवाज आयी, “आज जनवरी के भी २० दिन निकल गए हैं. तुम्हारी ऑडिट टीम कर क्या रही थी इतने दिन? ३० दिसंबर को क्या हुआ यह तमु को क्लाइंट बता रहा है; वो भी २० दिन बाद. तुम्हारा काम क्या है फिर? तुम्हे तो पहले ही पता चल जाना चाहिए था. नहीं?” गुप्ता जी सनुते ही परेशान हो गए. आरती ने क्या कहा, उसपर उनका ध्यान ही नहीं रहा.

(५)

 कौन परेशान नहीं था? आरती की यूनिट मे घटना घटी थी; कालरा को पता था की नए मैनेजर पर बात आयी तो उससे भी पुछा जायेगा की नए मैनेजर का बैकग्राउंड चेक हुआ भी था या नहीं और गुप्ता की ऑडडट टीम जिसका काम ही विसंगतियों को पकड़ना था आखिर उसकी टीम क्या कर रही थी; ठीक है की ऑडडट टीम ३० दिसंबर का वाकया रोक नहीं सकती थी लेकिन  यह क्या की उसको आज तक पता ही नहीं लगा – वोडाफोन ऑडडट टीम ने २० दिन बाद जो पकड़ लिया वो गुप्ता की टीम को बहुत पहले पकड़ लेना चाहिए था

 

…………………………………………………………. To be continued…………………………..