Poem XII: दिन


रात कि चपेट से भागता हुआ दिन

पहले ठहरता है मेरे अमरुद पर

फिर लगाकर छलांग जमीन पर भागकर चढ़ जाता है

मंदिर की मुंडेर पर, बजाता है मंदिर की घंटियाँ

 

रास्तों गलियों की धूल मिटटी से बचता

जब वापिस लोटता  है मेरे तंग कमरे में

चाय की प्याली बस तभी पहुँचती है दूसरे दरवाजे से

 

फिर ताज रफ़्तार बस में सवार होकर

मेरी ऑफिस की ऊंची बिल्डिंग पर खड़ा हो जाता है

चूमता है कुछ फ़ाइल, कुछ दराजों के जिस्म हिलता, सहलाता

चलता है मेरे साथ कदम से कदम मिलाता कुछ देर

 

फिर जाने किस सख्त चीज से टकराता है

की दूर अस्ताचल क़े उस पार गिर जाता है

रात की चपेट में आ जाता है

Poem XI: “हराम की औलाद”


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बड़ी तलाश के बाद

एक बुत हाथ लगा

उसमे सारी तुक देखी गयी और वही होगा राजा जीत के बाद

यह मुनादी भी करवा दी गयी

मुर्गे ने बांग दी, “सुख का कार्यकाल !!”

बुत ने आवाज बुलंद कि ” हमारे पूर्वज महान, हम महान, तुम महान, हम सब महान”

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किसी ने नहीं छोड़ा मौका

इतिहास को छील छील कर

अपने कद से मिलाया

प्रदेशों के छत्रपों ने शुरू किया कहना

हम हैं प्रदेश पिता या माता

सुनकर जयजयकार नए राष्ट्रपिता की

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ठीक ही तो है

आखिर कब तक कहलाते रहते यह प्रदेश

“हराम की औलाद”

Poem XI: यह उनकी पुराणी आदत रही है


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यार ! यह लोग सेवा का सात्विक साग खाते हैं

कुल्हाड़ियों, कृपाणों से दूर

धर्म, अर्थ, मोक्ष का राग अलापते हैं

यार ने समझाया भी था

यार ! मान मेरी बात

यह सब इसलिए है क्यूंकि सता नहीं हुई कायम

बहरहाल

अब उन्हें चाहिए

मांस मानव का

सुबह, दोपहर और शाम

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नहीं यह कुछ ख़ास नहीं

यह उनकी पुराणी आदत रही है