Poem III : चाँद बेबाकी से


चाँद बेबाकी से आज सुबह सूरज कि खिल्ली उडाता बहुत देर खड़ा रहा

बोला

अब तो तुमपर भी दाग पड़ने लगे हैं

पहले जो अधर्म रात के अन्धेरे मैं हुआ करते थे

वो सेंध अब दिन दहाड़े पड़ जाती है

चाँद बेबाकी से आज सुबह सूरज कि खिल्ली उडाता बहुत देर खड़ा रहा

Poem IV : एकलव्य का आंगूठा काटना पड़ता है


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बचपन में पापा ने साफ़ साफ़ कहा था

आदर्श जीवनियां कहानियाँ हैं

और उनकी सार्थकता

नक़ल कर या रट कर

परीक्षा पास करना

 

ठाट बाट से जीने के लिए बेटा

रना प्रताप नहीं मान सिंह बनाना पड़ता है

 

जान लो

यह ईमानदारी के किस्से

यह तोता रट बातें

व्यर्थ कि शिक्षा

नकली परीक्षा

चलती रहेगी देर तक

पर सर्वश्रेष्ठ होने के लिए

एकलव्य का आंगूठा काटना पड़ता है

 

सोचता हूँ तब तो समझ नहीं आया था यह ज्ञान

और अब क्या करूं ?

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रामलाल का नज़रयिा : कविता होती क्या है ? :


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वो जो उतार देना चाहते हैं कविताओं मं अपने व्यक्तिगत दुःख

हस्पताल मैं भर्ती हो जायें और डाक्टर को अपने कष्ट सुनायें

कविताएँ दर्द निवारक गोलियां नहीं, जिन्हे खाया जाए दर्द मिटाया जाये

किन्तु हाँ, वो बन सकती  हैं गोलियां जो दागी जायें उनपर

जो कष्ट के कारण हुआ करते हैं