फणीश्वरनाथ रेणु की श्रेष्ठ कहानियाँ


fanishwar nath

जन्म: 4 मार्च 1921, औराही हिंगना, अररिया, बिहार

सीधा किताब से ………..

पहलवान की ढोलक :

लुट्टन सिंह पहलवान !
यों तो वह कहा करता था-लुट्टन सिंह पहलवान को होल इंडिया भर के लोग जानते हैं, किंतु उसके ‘होल इंडिया’ की सीमा शायद एक जिले की सीमा के बराबर ही हो। जिले भर के लोग उसके नाम से अवश्य परिचित थे।
लुट्टन के माता-पिता उसे नौ वर्ष की उम्र में ही अनाथ बनाकर चल बसे थे। सौभाग्यवश शादी हो चुकी थी, वरना वह भी मां-बाप का अनुसरण करता। विधवा सास ने पाल पोस कर बड़ा किया। बचपन में वह गाय चराता, धारोष्ण दूधपीता और कसरत किया करता था। गांव के लोग उसकी सास को तरह-तरह की तकलीफ दिया करते थे, लुट्टन के सिर पर कसरत की धुन लोगों से बदला लेने के लिए ही सवार हुई थी। नियमित कसरत ने किशोरावस्था में ही उसके सीने और बांहों को सुडौल तथा मांसल बना दिया था। जवानी, में कदम रखते ही वह गांव में सबसे अच्छ पहलवान समझा जाने लगा। लोग उससे डरने लगे और वह दोनों हाथों को दोनों ओर 45 डिग्री की दूरी पर फैलाकर, पहलवानों की भांति चलने लगा। वह कुश्ती भी लड़ता था।

रसप्रिया :

‘रसपिरिया की बात किसने बताई तुमसे? …बोलो बेटा!’
दस-बारह साल का मोहना भी जानता है, पँचकौड़ी अधपगला है। …कौन इससे पार पाए! उसने दूर मैदान में चरते हुए अपने बैलों की ओर देखा।

मिरदंगिया कमलपुर के बाबू लोगों के यहाँ जा रहा था। कमलपुर के नंदूबाबू के घराने में भी मिरदंगिया को चार मीठी बातें सुनने को मिल जाती हैं। एक-दो जून भोजन तो बँधा हुआ ही है, कभी-कभी रसचरचा भी यहीं आ कर सुनता है वह। दो साल के बाद वह इस इलाके में आया है। दुनिया बहुत जल्दी-जल्दी बदल रही है। …आज सुबह शोभा मिसर के छोटे लड़के ने तो साफ-साफ कह दिया – ‘तुम जी रहे हो या थेथरई कर रहे हो मिरदंगिया?