शक्ति का दिमाग पर असर – दरजी

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“देखा तूने – अखबार लिखता है – मेरी पोषक मिशेल ओबामा की पोषक से भी बेहतर थी – और तो और ओबामा बोला कितना अच्छा होता अगर मेरे पास भी “मोदी कुरता” होता. भेजेंगे एक उसको भी या मैं ही ले जाऊंगा अपने साथ अगली बार. एक पगड़ी भी ले जायेंगे; अपने विशाल संग्रह से. तुझे पता है मेरी जैकेट को अब कोई “नेहरू जैकेट” नहीं कहता मोदी जैकेट कहा जाता है. और इसका फायदा यह की जहाँ “नेहरू जैकेट” वयोवृद्ध की पौषक हुआ करती थी “मोदी जैकेट” नौजवानों की पौषक बन रही है. यह है अलसी बदलाव – और कौन लाया यह बदलाव – मैं

“जी साब”

लालजीभाई तुलसीभाई पटेल ने खरीदा कुछ ४.३१ करोड़ में. इसको कहते हैं कदरदान. और इसका फायदा सबको हुआ. लालजीभाई की कंपनी का नाम गिनेस बुक मे लिखा गया है – क्योंकि आज तक का सबसे मेहगा सूट जो नीलाम हुआ वो मेरा है. तू बता कौन जनता था लालजीभाई को और मेरा छाया पड़ते ही अमर हो गए. इतिहास में उनका नाम है अब. १० लाख का सूट ४.३१ करोड़ का बिका – क्यों ? क्योंकि उसको मैंने पहना था. हुआ ऐसा कभी ? और मेरी दरियादिली देख मैंने सारा पैसा भेज दिया “गंगा की सफाई” कार्यक्रम के लिए. इसको कहते हैं कर्म योगी

“जी साब”

“और वो १० लाख भी मैंने नहीं खर्चे; सरकारी खजाने को तो मैं हाथ भी नहीं लगाता. यह मेरा पैसा नहीं है यह है जनता का पैसा. मुझे कभी पैसे की जरूरत ही नहीं पड़ी – इंतज़ाम खुद बा खुद होता रहा. मैं जानता हूँ कुछ पिछले प्रधान मंत्रियों को जिन्हे प्रचलन, प्रवृति की समझ नहीं, कल्पना शक्ति नहीं. कौन सा प्रधानमंत्री रहा मेरे से पहले जिसे समझ हो की जब किसी समाधी पर जाओ तो सफ़ेद कपडे और सलेटी शाल मे जाओ; लेकिन ठीक उसके बाद अगर आप यूनाइटेड नेशन की बैठक को सम्बोधित कर रहे हैं तो क्या सफ़ेद मोदी कुरता पहनोगे? उसके लिए तो नीला बंदगला सूट होना चाहिए – बिलकुल यूनाइटेड यूनियन के रंग से मेल खाता. फिर वहां से निकला और पहुंचा नई यॉर्क – शहर के सैर को – क्या पहनता? जमीन का आदमी मैं – खाखी रंग की जैकेट ही तो पहनता और देर शाम जब प्रवासी भारतियों से मिलना था तो केसरिया रंग की जैकेट. यह जरूरी था – लोग समझते हैं जरूरी है इसलिए समर्थन करते हैं – आलोचक  नहीं समझेंगे”

“जी साब”

“एक बात बताऊँ – मुझे रेशम पसंद है – रेशम मे उतनी ही ताकत होती है जितनी इस्पात में. मुझे ताकत पसंद है. और ताकत वाली हर चीज मेरे आस पास होनी चाहिए यह मेरे लोग सुनिश्चित करते है. रेशम का कीड़ा खाता चला जाता है – लगातार और तेज गति से – आस पास की फिक्र किये बिना; अपना आकार और और और बढ़ाता चला जाता है – सुना है ४ हफ़्तों में २५ गुना बढ़ जाता है – बिलकुल मेरे साथी जैसा. तुझे पता है मेरे साथी की कंपनी किस गुणक से बढ़ी है – २५ तो कुछ भी नहीं उसके गुणक के सामने. मै रेशम के कीड़े से भी ज्यादा तेज गति से अपना और अपने साथियों का आकार बढ़ा सकता हूँ

“जी साब”

“क्यों डरता है बे, तू मेरा दरजी है – सम्राट और साधू के सबसे सही मिश्रण का – कर्म योगी का – पारस पत्थर का – जिसने देश के लिए वैराग्य छोड़ वापस लौट आना स्वीकारा. तू खुद को ही देख तू अब कितने “मोदी कुर्ते” बनता है हर साल – पारस पत्थर और सुनहरे स्पर्श की ताकत …….. “अबे यहाँ जी साब नहीं हाँ साब बोलना है. बोल हाँ. इसी को सुनेहरा स्पर्श कहते हैं, ५०,००० से ८०, ००, ००,००० तक का सफर १ साल में. पारस पत्थर हूँ मैं – जिसने छुआ सोना सोना सोना. बचपन की याद ताजा हो गयी, मेरे विद्यालय को मरम्त की जरूरत थी और पैसे नहीं थे – मैंने एक नाटक लिखा, सिर्फ लिखा ही नहीं उसका निर्देशन भी किया, निर्देशन ही नहीं उसका एक मात्र पात्र मैं ही था, एक पात्र और एक ही दृश्य का नाटक – नाम पीले फूल – मैं ही अस्पृश्य औरत जो फूल की तलाश में भटक रही है लेकिन कोई उसे फूल नहीं दे रहा और मैं ही गाओं वाला – यानी शोषित भी मैं और शोषक भी मैं. मुझे देखने के लिए गाओंवाले आये पैसे दिए – भरपूर पैसे दिए. तब से मुझे यकीन है की लोग मुझे देखने के लिए टिकट तक लेंगे. और यही मैंने किया – हैदरबाद में रैली की और रैली में टिकट लगायी – १०० रूपए प्रति व्यक्ति. जानता है लाखों लोग आये. यह है मेरी ताकत, मेरी स्वकृति जनमानस में.

“जी साब”

पता है यह ताकत किस्मे होती है – पारस पत्थर की तातक – सिर्फ उसमे जिसमे देश सेवा की ज्योति हो और मुझे तो बचपन में ही एक साधू ने कहा था चक्रवर्ती सम्राट बाउंगा एक दिन, शंकराचार्य बनूँगा एक दिन – और देख में हूँ कर्म योगी – सम्राट और साधू का सबसे जबरदस्त मिश्रण”

“साब मुझे डर लग रहा है”

“क्यों डरता है बे, तू मेरा दरजी है – सम्राट और साधू के सबसे सही मिश्रण का – कर्म योगी का – पारस पत्थर का – जिसने देश के लिए वैराग्य छोड़ वापस लौट आना स्वीकारा. तू खुद को ही देख तू अब कितने “मोदी कुर्ते” बनता है हर साल – पारस पत्थर और सुनहरे स्पर्श की ताकत……..

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शक्ति का दिमाग पर असर -1

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“मै आश्वस्त हूँ और इससे ज्यादा मुझे क्या चाहिए. मै जानता हूँ की मै यह देश हित में कर रहा हूँ. मैं यह भी जानता हूँ की देश की जनता से जब मैं इसके लिए समर्थन मांगूंगा तो वो मुझे मिलेगा. मेरा विश्वास है की अगर यह कदम उठाया गया तो देश उसी उचाईयों को छूएगा जहाँ अतीत में यह था. मैं आलोचकों की परवाह नहीं करता, कभी नहीं की. उनको यह समझ ही नहीं की मैं जो कर रहा हूँ उसके दूरगामी परिणाम क्या होने वाले हैं. समझेंगे भी कैसे, किसी ने कभी मेरी तरह इस देश से प्यार किया?”

“जी साब”

” एक काम कर, मेरे बालों को सर की बायीं तरफ से गर्दन के पास वाले हिस्से के थोड़े और निखार दे. तुझे तो पता है मै कितने ख़ास लोगों के साथ उठता बैठता हूँ. मेरी आभा की चकाचोंध ही सबसे जरूरी है… ठीक से , रुक एक मिनट, जरा देख लेने दे. जरा शीशे पर कपडा तो मार और पीछे की लाइट जला, लाइटिंग ठीक न हो तो ….”

“जी साब”

“मै कामदार आदमी, बिलकुल तेरे जैसा. बचपन में एक बार कपडे इस्त्री करवाने के लिए पैसे नहीं थे मेरे पास, लेकिन दिमाग तो था न; मैंने एक लोटे मे पानी गरम किया और उससे कपडे इस्त्री कर लिए. पैसे नहीं होने से मैंने काम नहीं रुकने दिया. क्यों?

“जी साब”

“किस्से तो इतने हैं की मैं बोलता जाऊं तू सुनते जाये लेकिन समय कहाँ है मेरे पास. मैं एक नया देश बनाने मे लगा हूँ. कुछ तकलीफ तो सहनी ही पड़ेगी लेकिन इसको तकलीफ कहना गलत है. यह महायज्ञ मे आहुति भर है. मैं तो ऐसा आदमी हूँ भाई जो किसी का दर्द देख भी नहीं सकता. एक बार एक पक्षी पेड़ की झाड़ियों में फँस गया था, मैंने मुहं में एक ब्लेड रखा पेड़ पर चढ़ा पेड़ की टहनियां काटीं और पक्षी को आजाद किया. मुझसे दीन हीन का दर्द नहीं देखा जाता.”

“जी साब”

“तुझे पता है मै इस देश मे पहली बार असली लोकतंत्र को लेकर आया हूँ; नामदारों को बाहर कर कामदारों के हाथ मे सत्ता मेरे से ही शुरू होती है. एक बार और बताता हूँ तुझे इन सब नामदारों पर कभी विश्वास मत करना; यह तुझे बार बार बर्गलाएँगे लेकिन याद रख नामदार और कामदार का फर्क. पीछे उत्तर प्रदेश के एक जिले में भीषण आग लगी कुछ १००-१२५ लोग बुरी तरह जल गए – मै ही वो कामदार था जो भागा उन्हें देखने – अस्पताल के वार्ड मे जाकर उनसे मिला और पता है नामदार क्या बोला, कहता है, जले हुए वार्ड मे बड़ी ऐहतियात से जाना चाहिए रोगी को इन्फेक्शन का डर रहता है. मै सोच रहा हूँ सभी नामदारों को समझाऊँ की कामदार आदमी इन्फेक्शन से नहीं डरता, वो प्यार का भूखा है. क्यों मानता है न ?”

“जी साब”

“तुझे पता है हम सबको मिलकर पश्चाताप करना होगा – माँ भारती से माफ़ी मांगनी ही होगी – जो जुर्म हमसे हुआ – माँ भारती जो दुनिया के माथे का चाँद थी उसकी यह हालत. मेरा एकमात्र उद्देश्य है, उच्चतम उद्देश्य – माँ भारती की सेवा. इस काम मे समय लगेगा लेकिन होगा. मेरा जन्म इसीलिए हुआ है और में इस बात को लेकर आश्वस्त हूँ. बस”

“जी साब”

“मैं पुरानी सरकारों का , प्रधान मंत्रियों का आभारी नहीं हूँ और इसका ढोंग नहीं करता. मैं हर प्रकार के आभार से इंकार करता हूँ. पता है एक बार मैं गंगोत्री गया, माँ गंगा में गोता लगाया तो ऐसा लगा की माँ ने कहा; मेरा सच्चा लाल आया है अब मेरा भी उद्धार होगा. और मैं वचन बद्ध हूँ की माँ का उद्धार मैं करके रहूंगा. तू ही बता की क्या मुश्किल है गंगा की सफाई अगर मैं ठान लूँ. और मैंने ठान लिया है”

“जी साब”

“मैं आश्वस्त हूँ और मेरे साथी मेरी बात का पालन करते हैं; मैं उनका विश्वास जीत चुका हूँ और मेरे साथी मिलकर उन सबकी हेकड़ी निकाल सकते  हैं जो मेरे उच्च उद्देश्य के आड़े आएगा. मुझमे और मेरे साथियों मे कोई फर्क नहीं मैं मेरे साथी और मेरे साथी मैं. और मै लगातार क्रोध में हूँ की जब मैं आश्वस्त हूँ यह देश की लिए ठीक है तो फिर प्रश्न ही क्या है?”

 

“मैं जानता हूँ वो स्वार्थपरता भी भली जो उस उच्च उद्देश्य को हासिल करने में सहायक हो. साधन, मेरे पास कमी नहीं साधन की, प्रेम, गुरु,  समाज, सब निरंतर उपलब्धियों के साधन हैं. पारस्परिक हेरफेर बेहतर बुद्धि वालों के लिए कोई मुश्किल तो नहीं. भावात्मक बुद्धिजीविओं को बरगलाना क्या मुश्किल? भावनात्मक सहानुभूति – यह कमजोरों के लिए है, उनके लिए नहीं जो आश्वस्त हैं की जो वो कर रहे हैं वो सही है उच्चतम है. मैं नोटेबंदी का समर्थन आज भी करता हूँ. १००-१५० की आहुति तो महायज्ञ मांगेगा ही. सहमतता – यह किस चिड़िया का नाम है? क्या इसी सहमतता ने हमें यहाँ नहीं पहुंचा दिया जहाँ हम हैं ?”

“जी साब”

” अबे जी साब नहीं बे. यहाँ हाँ साब बोलना है. सीख ले अब तो – तू मेरा हेयर स्टाइलिस्ट है – जिसको माँ गंगा भी अपना सच्चा सपूत मानती है – पता है सहमतता सिर्फ व्यक्तिगत लालच के चलते सामूहिक मत मान लेना भर है. मुझे कोई डर नहीं, मै तनाव को खा जाता हूँ – वो मेरी खुराक  है, अलोकप्रियता और खतरा सह जाने का अदम्य साहस है मुझमे, आत्मविश्वास मुझसे फूटता है और सच मान मेरे लिए कुछ निषेध नहीं – उच्च उद्देश्य के लिए कुछ भी निषेध नहीं.”

“साब मुझे थोड़ा डर लग रहा है ”

“हा हा हा , सुन विरोध नहीं सहा जा सकता, और चिंता क्यों करता है अगर तू कर्तव्य निष्ठ रहेगा तो चिंता कैसी? चल छोड़ तू तो डर सा गया लगता है – और यह पुष्टि है मेरे वर्चस्व की. सुन जरा फिर से पीछे वाली लाइट जला और शीशा साफ़ कर दे”

“जी साब”

“ठीक काम किया तूने. चल बढ़िया रहा. और ध्यान रख मै आश्वस्त हूँ और इससे ज्यादा मुझे क्या चाहिए”

Pertinent Query – 1

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Why is it that BJP always asks for a balance sheet of congress performance from 1947 onwards – or more accurately of 60 years of congress rule? I think Congress came into being around 1885 and so did Hindu Mahasabha [maybe around 1914-15] or RSS [founded in 1920’s]. Now if congress was founded around 1885 then would not be more meaningful to ask about their performance since inception?

Let’s say if congress decides to present a performance card, as BJP continuously ask, I am sure it will be a sheet comprising of lot of bad things as well as good things. Let’s say if congress decide to present such a balance sheet since inception then I am sure it will be account of lot of good things and some bad things.

I think congress should present this balance sheet and so should BJP. I am also sure that just like for congress, for BJP it will not be a pleasant accounting exercise. But I am interested in knowing which one do you think will find it more unpleasant? Congress or BJP??

लघु कथा : २९

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लघु कथा : २९
पहला : यह झूठ है
दूसरा : अबे यह बैल-बकवास है
तीसरा : बैल बकवास क्या होता है ?
दूसरा : bull shit
तीसरा : और क्या बैल बकवास झूठ से भी बड़ा झूठ होता है ?
पहला : हाँ
दूसरा : क्योंकि झूठ बोलने वाले को पता होता है की सच क्या है
पहला : और बैल बकवास करने वाले को झूठ सच से मतलब नहीं होता – उसको बस बोलने से मतलब होता है
तीसरा : एक उदाहरण से समझाओ तो यारों
पहला : तुझे पता है कल भारत के भूतपूर्व प्रधान मंत्री पाकिस्तान के भूतपूर्व सेना के अधिकारी से मिले और मोदी को हारने के लिए सहायता मांगी
तीसरा : यह सच है या झूठ ?
दूसरा : अबे चूतिये यह बैल बकवास है

लघु कथा २८

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लघु कथा २८
पहला : मोदी को जनता है?
दूसरा : मोदी या मूडी ?
तीसरा : मूडी यार; मोदी को तो जानता ही होगा.. मूडी को जनता है?
दूसरा : हाँ जनता हूँ
पहला : स्टैण्डर्ड को जनता है ?
तीसरा : स्टैण्डर्ड कौन? वोही जो मूडी की तरह रेटिंग देता है?
दूसरा : अब तुम दोनों बताओ क्या तुम ज्योतिषाचार्य दमदमजी के “अपने मुहँ मियां मिट्ठू” तोते को जानते हो
पहला : हैं ?
दूसरा : अबे तोता तो तोता ही होता है यार; मूडी हो, स्टैण्डर्ड हो या “अपने मुहँ मियां मिट्ठू”

लघु कथा २७

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लघु कथा २७


पहला : आज तुम दोनों मेरे घर आना
दूसरा : क्यों ?
पहला : यार मेरे बच्चों को लगता है मैं उनके लिए कुछ कर नहीं रहा
तीसरा : तो हम इसमें क्या करेंगे
पहला : घर आओ; बातचीत करो; बच्चों को भी पता चले की मैं कितना बढ़िया बाप हूँ
दूसरा : अबे तू तो राजनीती कर रहा है
पहला : यार मैं तो देश के प्रधान से सीख रहा हूँ
तीसरा : कैसे
पहला : वो भी तो यही कह रहे हैं; आस पास, पड़ोस की क्या हालत है वो मत देखो; मूडी की रिपोर्ट देखो; साफ़ पता चल जायेगा की हम प्रगति की रह पर हैं
और फिर तीनों हसने लगते हैं

लघु कथा २६

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लघु कथा २६
पहला : तेरा सर्विस प्रोवाइडर कौन है ?
दूसरा : वोडाफोन
पहला : यार उसकी तो सर्विस बेकार है
दूसरा : हाँ यार, पहले एयरटेल था; वो भी बकवास था
पहला : मेरा आईडिया था,कनेक्टिविटी का इशू था, बदल कर एयरसेल लिया, बेकार !!
तीसरा : मेरा सर्विस प्रोवाइडर तो मोदी है
पहला : और उसकी सर्विस कैसी है ?
तीसरा : यार सर्विस छोड़ यार; उससे थोड़ा दिल का रिश्ता बन गया है यार; सर्विस छोड़… वो बढ़िया है
पहला : पर है तो सर्विस प्रोवाइडर ही
दूसरा : और सर्विस प्रोवाइडर से मोहबात ठीक है लेकिन …
तीसरा (बीच में) : मैं मोदी का लॉयल हूँ, और वो सर्विस प्रोवाइडर होकर भी मेरा भगवान् है .. सर्विस छोड़