Entrepreneur and Entrepreneurship – Question no. 1: Why Ramlal’s mentor is an Entrepreneur?

Image

“A pressing need would need to be mostly satisfied before someone would give their attention to the next highest need”. Ramlal was introduced to this Hierarchy of Needs by his mentor about 2-3 years back. & this introduction of Maslow was further used to explain why Ramlal’s mentor is an entrepreneur by arguing that, “person’s effectiveness is a function of matching man’s opportunity with his appropriate position of hierarchy of needs.”

Ramlal struggled for some time to figure out what hierarchy of needs is. It is only after some research he figured out that human needs can be arranged in a particular order from the lower to higher. At the lowest level is the basis physiological need. The needs that are taken as the starting point for motivation theory. These needs include things like food, clothing, shelter, air, water and other necessities of life. As soon as the physiological needs are met people want assurance of a given economic level. This comes under safety and security needs; job security, personal bodily security, security of source of income, provision for old age and insurance against risks.

Maslow proposed that the needs have a definite sequence of dominance. Next in the order comes social needs; as man is a social being, he is interested in conversation, sociability, exchange of feelings, companionship, recognition, belongingness.

Once this order is achieved starts needs classified as esteem and status needs. Need also known as egoistic needs. Needs concerned with prestige and status of the individual.

The final step under the need priority model is the need for self fulfillment or the need to fulfill what a person considers to be his mission in life. It involves realizing one’s potentialities for continued self development and for being creative in the broadest sense of the world. After his other needs are fulfilled a man has the desire for personal achievement. He wants to do something which is challenging and since this challenge gives him enough dash and initiative to work, it is beneficial to him in particular and to the society in general. These senses of achievement give him psychological satisfaction

According to Maslow second needs does not dominate until first need is reasonably satisfied and third need does not dominate until first two needs have been reasonably satisfied and so on. The other side of the need hierarchy is that man is wanting animal, he continues to want something or the other. He is never fully satisfied. If one need is satisfied the other need arises. Man lives for bread alone as long as it is not available. But once a need or a certain order of needs is satisfied it ceases to be a motivating force.

It is through this theory that Ramlal’s mentor concluded why he is an entrepreneur. His mentor argued that the once the first four levels are achieved then you feel content. And right after contentment come the highest level which calls for creativity, spontaneity, problem solving and entrepreneurship.

Ramlal then asked his mentor, “Sir, but what are the factors for entrepreneurial motivation?

Image

Poem XX: स्मृतियाँ

Image

बंद दरवाजे के भीतर

पुरानी स्मृतियाँ

सरसराहट पैदा करती हैं

 

मनो पुराने फैसले पर

कहकहे लगा रही हों

और कह रही हों

‘हम पहले से न कहती थीं?’

Poem XVIII: बहुत समय हुआ अब कलयुग भोगते

Image

समय यदि गोलाकार पथ पर परिक्रमा करता है

तो

मैं चाहूंगा कि आज के दिन उसकी परिक्रमा पूर्ण हो

 

फिर कल से वह जब अपनी नयी परिक्रमा प्रारभ करेगा

तो पुनः सतयुग का प्रारभ होगा

बहुत समय हुआ अब कलयुग भोगते

Image

Poem XVII: ‘वो भी होगा यहाँ!’

Image

जब वो पहले यहाँ आती थी

आते ही कहती थी

अरे ! वो भी है यहाँ

अब

वो यहाँ से निकलती है

तो अन्दर नहीं आती

न आने का कारण वो बतलाती है

‘वो भी होगा यहाँ!’

Poem XVI: चाहो तो गिरा दो चाहो तो अपना लो

Image

बाप ने भेजा है एक विशेष गुप्तचर

पता लगवाने हेतु

कि आखिर उस गुप्प अँधेरे में कौन है?

 

खबर आयी है

अवांछित है

सास ने सुझाया है

चाहो तो गिरा दो चाहो तो अपना लो

 

माँ जानती है उस अवांछित की नियति

बाप की चाहत पर निर्भर है

चाहो तो गिरा दो चाहो तो अपना लो

Image

Poem XV: चुनाव का मौसम आया (लम्बी कविता)

For part I of the poem : http://sachinmanan.wordpress.com/2014/03/21/poem-xiv

For part II of the poem : http://sachinmanan.wordpress.com/2014/03/20/poem-xii

सैलाब के समय में

इन्द्रसभा में एक मामला आया था

मंगल पर जीवन अंकुर फूटना चाहिए या नहीं?

किन्तु

नए कार्यालयों को कार्यान्विन्त करने के चकार में

यह मामला बीच में ही अटक गया

 

धरती वासी विस्मित न हो

‘अटकना’

यह कला इन्द्रसभा ने हम से ही सीखी है

 

 

कार्यालय तो तब से अब तक कई खुले हैं

समस्या कि विकटता और पांच साल के भीतर निवारण से

पार्टी पार्टीकोश को क्या फायदा होगा

यह सबसे बड़ी कसोटी होती है

सब जानते हैं इस विषय पर बहस फज़ूल होती है

 

मसीहा अवतार पैगम्बर कार्यालय के अंतर्गत

एक नया कार्यालय पिछली ही सदी में खुला है

यह कार्यालय परिस्थितियों को ध्यान रखकर

कार्यसूची तैयार करता है, फिर पाठयक्रम में तब्दील कर

प्रोढ़ अवतार मसीहा को पढ़ाया भी जाता है

आश्चर्य

पाठ के अंत में बार बार

ॐ शांति का पाठ दोहराया जाता है

 

धरती वासी विस्मित हों, पूछें मुझसे

“अचरज  कैसा?”

मैं कहूंगा

शांति का पाठ पढ़ाया गया क्रांतिकरियों को

शांति और क्रांति के बीच

यह लटकते नहीं रह जायेंगे

कभी दायें

कभी बायें

कभी दायें

कभी बायें

तो कभी कहीं नहीं

यह ही न करते रह जायेंगे

 

इलाज है इसका भी तर्कशक्ति के पास

आप महाराणा कि संतान है

यकीन जानिए शुद्ध फौलाद हैं

अच्छा नहीं तो बुरा भी न कहिये

जाइये संकट मोचन का पाठ करिये

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर

जय कपिश …..

Poem XIV: चुनाव का मौसम आया (लम्बी कविता)

For First part of the poem please check

http://sachinmanan.wordpress.com/2014/03/20/poem-xii

पिछले दस सालों में इन्द्रसभा में कई नए कार्यालय खुले हैं

राजकोष रिक्त होने के कारन यही कार्यालय बने हैं

Image

व्यवस्था वैसे तब भी थी

जब यह कार्यालय नहीं थे

तब सीधा साधा काम था

“सैलाब”

आया करता था

अत्याचारियों, भ्रष्टचारियों  का विनाश कर

“लोह” जैसे धर्मी मानवों को

सुरक्षित कर जाया करता था

हो सकता है “लोह” ने कभी अपनी कार्यकुशलता की एवज में

इंद्रा से माँगा हो

“भगवन ! अब सैलाब वाला सिस्टम बंद कीजिए”

और इंद्र ने “ठीक है” कह दिया हो

धरती वासी विस्मित न हो

नेता और खुदा में  अंतर समझें

नेता को शर्म नहीं आती

और

ईश्वर के सन्दर्भ में यह बात विपरीत हो जाती है